कायमगंज, फर्रूखाबाद से ताल्लुक रखने वाले राज्यसभा सांसद रहे रशीउद्दीन खान के बेटे कबीर खान ने हिंदी सिनेमा में काबुल एक्सप्रेस, न्यूयॉर्क, एक था टाइगर, बजरंगी भाईजान, फैंटम और ट्यूबलाइट जैसी फिल्में निर्देशित कर बड़ा नाम कमाया है। फिल्में बनाने से पहले उन्होंने आजाद हिंद फौज के सिपाहियों पर लंबा शोध किया, इस शोध की तासीर अब वेब सीरीज द फॉरगॉटेन आर्मी की शक्ल में सामने आई है। अमर उजाला के लिए कबीर खान से ये खास मुलाकात की रोहिताश सिंह परमार ने।
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20 साल तक एक कहानी सीने में दबाए कमर्शियल सिनेमा बनाते रहना बहुत मुश्किल रहा होगा, कितना बदल गई ये कहानी तब से अब तक?
20 साल में लोग बदल जाते हैं और किसी चीज को देखने का नजरिया भी बदल जाता है। तब जो मैंने पटकथा लिखी थी वह सिर्फ इस कहानी को ध्यान में रखकर लिखी थी। इसी बीच मैंने कई फिल्में भी बनाईं। इसके बाद इसी कहानी पर मैंने एक निर्माता की तरह सोचना शुरू कर दिया। मैंने सोचा कि जरूरी नहीं कि जो कहानी जैसी बीती उसे वैसा ही दिखाएं बल्कि जरूरी यह है कि कहानी की जो तासीर है वह साफ होनी चाहिए इसलिए मैंने इसे फिर से लिखा। अब जो कहानी वेब सीरीज के तौर पर फॉरगॉटेन आर्मी के नाम से बनी है, उसमें ड्रामा बहुत है। हमारे मुल्क के लिए लड़ते हुए 27 हजार सैनिक शहीद हो गए और हमें इसकी कोई जानकारी ही नहीं है। आजादी का ये इतिहास जानना जरूरी है।
कहा जा सकता है कि इसी कहानी की वजह से आप निर्देशक बने?
हां, इस कहानी पर मैंने एक वृत्त चित्र (डॉक्यूमेंट्री) बनाई थी तभी से ये कहानी मेरे दिमाग में फंसी रही है। फिल्मों की तरफ मेरे रुझान का श्रेय भी इसी कहानी को जाता है। मैंने अपनी जिंदगी की पहली पटकथा इसी पर लिखी लेकिन मैं जानता था कि इतनी महत्वाकांक्षी परियोजना में मेरा साथ इतनी जल्दी तो कोई नहीं देने वाला इसलिए मैंने 'काबुल एक्सप्रेस' बनाई। हर कहानी के बाद मुझे इस कहानी की याद आती थी। ऐसे ही सिलसिला चलता रहा।
क्या फीचर फिल्मों की तरह ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर भी बंदिशें हैं?
नहीं, फीचर फिल्मों की तरह यहां कोई सेंसर बोर्ड नहीं है इसलिए हमें कोई गाइडलाइंस नहीं दी गई पर हमें खुद जिम्मेदार होना चाहिए। कोई आपको बताए कि आपको क्या करना है, उससे अच्छा है कि आप खुद ही जिम्मेदार बनिए। कला एक स्वतः विकसित होने वाली प्रक्रिया है इसलिए देखने वाले और दिखाने को खुद निर्णय लेना चाहिए कि हमें क्या करना है। सेंसर बोर्ड को भी बस आयु सीमा तय करनी चाहिए कि किस फिल्म को कितनी उम्र के लोग देख सकते हैं। उसका काम ये बताना बिल्कुल नहीं होना चाहिए कि फिल्म में क्या हो और क्या नहीं।
निर्देशकों के काम में सुपरसितारों के हस्तक्षेप के बढ़ते चलन पर आप क्या कहेंगे?
कोई भी अभिनेता कहानी सुनने के दौरान या शूटिंग के दौरान अपने निर्देशक को कुछ बता रहा है तो यह निर्देशक के ऊपर है कि वह उसे कैसे लेता है। वह इसे नकारात्मक लेता है तो हस्तक्षेप हो गया और अगर इसे सकारात्मक तरीके से लिया गया तो ये फीडबैक हो गया। निर्देशक को खुद में मजबूत और आत्मविश्वास से भरा हुआ चाहिए। तानाशाही करना तो बेवकूफी ही होगी। आपको हमेशा दूसरों के विचारों के लिए खुला रहना चाहिए।
आपने सलमान खान के साथ दो बड़ी फिल्में एक था टाइगर और बजरंगी भाईजान कीं। तो ट्यूबलाइट के साथ क्या गलती हुई?
गलती कुछ नहीं थी बस दर्शकों को पसंद नहीं आई। हर फिल्म को हर फिल्मकार अपने नजरिए से बनाता है। न्याय तो दर्शक ही करते हैं कि फिल्म अच्छी है या बुरी। हम तो पूरी शिद्दत के साथ अपना काम करते रहेंगे। उसका फैसला जनता ही करेगी। ये हमारी यात्रा का हिस्सा है।