81 साल की लंबी उम्र जीने के बाद निर्माता निर्देशक राकेश कुमार शुक्रवार को दुनिया छोड़ गए। हिंदी सिनेमा का चलन कुछ ऐसा है कि यहां चढ़ते सूरज को ही सलाम है। यही वजह है कि दुनिया को राकेश कुमार के जाने की खबर भी उनकी प्रार्थना सभा की सूचना के साथ मिली। राकेश कुमार दिग्गज फिल्म निर्देशक रहे हैं और उनकी बनाई फिल्म ‘याराना’ हिंदी सिनेमा में फिल्म मेकिंग का एक ऐसा प्रयोग है जिसे दोहराने की हिम्मत इसके बाद से आज तक कोई नहीं कर पाया। ये उन दिनों की बात है जब अमिताभ बच्चन अपने नाम के मुताबिक शोहरत के आसमान पर सूरज की तरह चमक रहे थे। उनके दफ्तर में निर्माताओं की लाइन लगी रहती थी किसी तरह उनको अपनी फिल्म में ले लेने के लिए। लंबे समय तक निर्देशक प्रकाश मेहरा के सहायक रहे राकेश कुमार को वैसे तो फिल्म ‘खून पसीना’ में ही निर्देशक बनने का मौका दे दिया था। इसके बाद राकेश ने अमिताभ बच्चन के साथ ‘मिस्टर नटवरलाल’, ‘दो और दो पांच’ और ‘याराना’ जैसी चर्चित फिल्में भी बनाईं।
Rakesh Kumar: अमिताभ का घंटा घंटा चुराकर बनाई फिल्म ‘याराना’, रेखा से पहली बार कराई इस हीरोइन की डबिंग
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उस्ताद की सलाह ने दिखाई राह
राकेश कुमार का फिल्मी करियर के बी लाल और चांद श्रीवास्तव जैसे निर्देशकों के सहायक के रूप में शुरू हुआ। चांद श्रीवास्तव अपने जमाने के बी और सी ग्रेड फिल्मों के बड़े निर्देशक हुआ करते थे। इसी दौरान बोहरा ब्रदर्स ने राकेश कुमार को एक फिल्म ऑफर कर दी, जिसका निर्देशन करने को उनसे कहा गया। राकेश ने यहां जो समझदारी दिखाई, वही उनके करियर का टर्निंग प्वाइंट बनने में आगे चलकर मददगार हुई। बोहरा ब्रदर्स का ऑफर कोई दूसरा असिस्टेंट होता तो लपककर स्वीकार कर लेता। लेकिन, राकेश ने अपने उस्ताद के साथ ये बात साझा की तो चांद श्रीवास्तव ने भी अपने शागिर्द को सौ टके की सलाह मुफ्त में दे डाली। उन्होंने राकेश को समझाया कि अगर अभी वह निर्देशक बन गए तो जीवन भर इन स्टंट फिल्मों के ही निर्देशक बने रह जाएंगे। राकेश को सलाह भा गई। उन्होंने चांद श्रीवास्तव की ये सलाह भी मान ली कि फिल्म निर्देशन में उतरने के लिए उन्हें थोड़ा इंतजार और करना चाहिए।
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प्रकाश मेहरा ने दिया पहला मौका
राकेश कुमार ने प्रकाश मेहरा की तमाम फिल्मों में उनके सहायक निर्देशक के तौर पर काम किया और यश चोपड़ा से पहले प्रकाश मेहरा ही ऐसे निर्देशक रहे जिन्होंने अपने तमाम सहायकों को स्वतंत्र फिल्म निर्देशक बनने में उनकी पूरी मदद की। राकेश कुमार की दोस्ती इसी दौरान अमिताभ बच्चन से काफी अच्छी हो गई। ‘याराना’ से पहले दोनों तीन फिल्में साथ में कर चुके थे और जब ‘याराना’ बनाने के लिए इसके निर्माता एम ए नाडियाडवाला ने उनके संपर्क किया तो राकेश के जेहन में पहला नाम अमिताभ बच्चन का ही आया। अमिताभ बच्चन की तब तक ‘शोले’ समेत तमाम फिल्मों में अमजद खान बहुत ही क्रूर और खूंखार विलेन का रोल कर चुके थे। राकेश कुमार ने ‘याराना’ में अमजद खान को पहली बार एक दोस्त में और भले इंसान के रूप में पेश करने का फैसला किया। बाद में अमिताभ बच्चन और अमजद खान क रिश्ते भले खराब हो गए हों, लेकिन इस फिल्म का आइडिया अमिताभ बच्चन को तब बहुत पसंद आया था। पर अमिताभ बच्चन चाहकर भी इस फिल्म के लिए राकेश कुमार को तारीखें नहीं दे सकते थे।
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साथियों पर हमेशा भरोसा कायम रखा
फिल्म ‘याराना’ की राइटिंग टीम अपना काम शुरू कर चुकी थी। राजेश खन्ना की फिल्म ‘आविष्कार’ से शुरू करके अनिल कपूर की फिल्म ‘बेटा’ तक करीब 20 फिल्में लिखने वाले राइटर ज्ञानदेव अग्निहोत्री ने फिल्म ‘याराना’ की कहानी लिखी। अभिनेता अपूर्व अग्निहोत्री इनके ही बेटे हैं। राकेश कुमार की बतौर निर्देशक पहली फिल्म ‘खून पसीना’ में उनके मुख्य सहायक रहे विजय कौल तब तक प्रकाश मेहरा की हिट फिल्मों ‘हेराफेरी’ और ‘मुकद्दर का सिकंदर’ की पटकथा लिख चुके थे। राकेश ने अपने इस दोस्त को फिल्म ‘याराना’ में फिर साथ लिया। सबने मिलकर एक ठीक ठाक सी कहानी और पटकथा लिख ली। कादर खान भी तब तक अमिताभ बच्चन को अमित कहकर ही बुलाते थे और अमिताभ बच्चन की फिल्मों में संवाद लेखक के तौर पर नियमित काम करते रहते थे। फिल्म ‘याराना’ में एक खास किरदार निभाने के साथ साथ कादर खान ने ‘याराना’ के संवाद भी लिखे।
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घंटे घंटे के जुगाड़ से बनी फिल्म ‘याराना’
अब जब कहानी वगैरह सब तैयार हो गई और हीरोइन के तौर पर नीतू सिह भी आ गई तो मामला अमिताभ बच्चन की तारीखों पर अटक गया। राकेश कुमार की अमिताभ बच्चन से दोस्ती इतनी गहरी थी कि वह उनकी तमाम निजी चीजें भी देख लिया करते थे। ऐसे में ही एक दिन राकेश कुमार उनके दफ्तर में बैठे बैठे डेट डायरी देखने लगे। उन्होंने नोट किया अमिताभ शिफ्ट में काम कर रहे हैं और लगातार काम कर रहे हैं। फिल्मों की शूटिंग की पहली शिफ्ट तब भी और अब भी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में सुबह सात बजे शुरू होती है। तो राकेश कुमार ने अमिताभ से रीक्वेस्ट की कि अगर वह अपनी फिल्मों की शूटिंग के लिए तैयार होकर निकलने के बाद अपनी लोकेशन पर पहुंचने से पहले एक एक घंटा भी रोज उनको देते रहें तो वह फिल्म बना सकते हैं। बीच में जो ब्रेक अमिताभ को मिलते थे, उनका इस्तेमाल भी फिल्म ‘याराना’ को बनाने में किया गया। तारीखों के बीच तारीख निकालने का ये प्रयोग हिंदी सिनेमा में अपनी तरह का बिरला है।
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