बंगाली सिनेमा का बड़ा नाम रहे निर्देशक श्रीजीत मुखर्जी पांच राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीत चुके हैं। उनकी फिल्मों को भी मिलाकर गिनें तो यह संख्या 10 तक पहुंच जाती है। वह मानते हैं कि हिंदी सिनेमा में प्रवेश की उनकी पहली कोशिश फिल्म ‘बेगम जान’ में उनसे गलतियां हुईं। लेकिन, वह हिंदी सिनेमा को राष्ट्रीय सिनेमा भी नहीं मानते। श्रीजीत ने नेटफ्लिक्स की फिल्मावली ‘रे’ की दो कहानियां निर्देशित की है। क्रिकेटर मिताली राज की बायोपिक भी वह निर्देशित करने जा रहे हैं। श्रीजीत से ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल की एक एक्सक्लूसिव बातचीत।
EXCLUSIVE: ‘अमर उजाला’ से बोले निर्देशक श्रीजीत मुखर्जी, ‘हिंदी सिनेमा राष्ट्रीय सिनेमा नहीं है’
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आप फिल्मों में जब आए तो आपने सत्यजीत रे का अनुसरण किया। सत्यजीत रे की दो लघु कथाएं आपने फिल्मावली ‘रे’ के लिए चुनी हैं तो इन्हीं दो कहानियों को चुनने की कोई वजह?
ये जो कहानियां हैं वह हू ब हू वैसी ही नहीं है जैसी सत्यजीत रे ने 60 के दशक में लिखी थीं। पहली बात तो उनमें कोई महिला किरदार नहीं थे। वे कहानियां खासतौर से यंग एडल्ट्स के लिए लिखी गईं थी। उनमें उतनी हिंसा नहीं थी। हम इनको थोड़ा और डार्कर स्पेस में ले गए। ये जो दो कहानियां हैं ‘बिपिन चौधरी स्मृतिभ्रम’ और ‘बहुरूपी’, वे रूपांतरण के लिए एकदम दुरुस्त हैं। हमने इन कहानियों की रूह वही रखी है।
और, आपकी फिल्ममेकिंग पर कितना असर है सत्यजीत रे का?
मैं बंगाल से हूं। छह साल की उम्र से टीवी खोलने पर या लोगों से बात करने पर मैंने उन्हें ही देखा सुना। वह एक किंवदंती बन चुके हैं। असर अगर आप देखोगे तो वह लेखन में है। संवादों में हैं। संवादों में वह बहुत किफायत बरतते थे। और, एक असर हास्य में भी है। शूटिंग के फ्रेम में भी आपको ये दिखेगा। बंगाल से होने की वजह से ये असर आ ही जाते हैं।
जिन्होंने ‘बेगम जान’ और इसकी मूल फिल्म ‘राज कहिनी दोनों देखी हैं, उनको बहुत बड़ा एक अंतर लगता है दोनों की कहानी कहने में, ये अंतर क्या इसलिए था कि महेश भट्ट ‘बेगम जान’ के निर्माता थे?
नहीं, नहीं, भट्ट साब कभी शूट पर नहीं आए और कभी एडिट पर भी नहीं आए। किसी ने कोई भी हस्तक्षेप नहीं किया। जो अंतर है वो इसलिए है कि हमने कहानी की पृष्ठभूमि बदलने की कोशिश की। बंटवारे की एक कहानी हम पूर्वी सीमा से उठाकर पश्चिमी सीमा पर ले गए। और जो लड़किया थीं, वह जो चकलाघर था ‘राजकहिनी’ का, उसको हमने एक अखिल भारतीय पहचान देने की कोशिश की, जिसकी शायद कोई जरूरत नहीं थी। ये करने में कहानी में बनावट आ गई। दरअसल कहानी को एक राष्ट्रीय पहचान देने के चक्कर में वह थोड़ा नकली हो गई। जब भी कोई कहानी नकली हो जाती है ना तो कहीं पर जाकर उसकी रिदम कट जाती है।
आपकी फिल्मों में एक राजनीतिक अंतर्धारा भी चलती है। ‘बेगम जान’ में ये दिखा। आपकी पिछली फिल्म ‘गुमनामी’ में भी ये दिखा। किसी क्षेत्रविशेष की अंतर्धारा को जब राष्ट्रीय पहचान मिलती है तो वह तारीफ कितनी संतुष्टि देती है?
देखिए, मैं सच सच आपको बताऊं। बंगाली तालियां, मारवाड़ी तालियां या फिर यूपी तालियों में कोई फर्क नहीं है मेरे लिए। तालियां जब पड़ती हैं जिस क्षेत्र से भी पड़ती हैं, वे तालियां ही होती हैं और अच्छा ही लगता है। लेकिन, मैं थिएटर का बंदा हूं। मैं फिल्मों में इसलिए आया क्योंकि मुझे लालच है दर्शकों की बड़ी तादाद का। एक बड़े दर्शक वर्ग को मुझे अपनी कहानियां दिखानी हैं।