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Vishal Bhardwaj Interview Part 2: हिंदी मीडियम में न पढ़ पाने का आसमान को क्यों है दुख, और क्रिकेट छूटा तो...

Mon, 02 Oct 2023 01:42 PM IST
Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Mon, 02 Oct 2023 01:42 PM IST
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Director Vishal Bhardwaj speaks to Pankaj Shukla about khufiya aasmaan ali fazal Najibabad shikarpur cricket
विशाल भारद्वाज और आसमान भारद्वाज - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

संगीतकार, लेखक, निर्देशक और निर्माता विशाल भारद्वाज के पिता गन्ना निरीक्षक थे। 12वीं तक वह हिंदी मीडियम में पढ़े और लंबे समय तक अंग्रेजी ठीक से न बोल पाने के अपराध बोध से ग्रसित रहे। लेकिन, जो बातें उन्हें शुरू में उन्हें अपनी कमजोरी लगती थीं, वही अब उनकी ताकत हैं। ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल से एक लंबी बातचीत के पहले हिस्से में आपने उनकी लंबे समय से तब्बू के साथ चली आ रही साझेदारी, पंजाबी सिनेमा से आईं अभिनेत्री वामिका गब्बी की खासियत और उनकी नई कृतियों ‘चार्ली चोपड़ा एंड द मिस्ट्री ऑफ सोलांग वैली’ व ‘खुफिया’ के बारे में पढ़ा। अब आगे...



यहां विशाल भारद्वाज के इंटरव्यू का पहला भाग पढ़ सकते हैं..
इरफान नहीं रहे तो ‘खुफिया’ में दूसरे हीरो को लिया ही नहीं, विशाल भारद्वाज का खुलासा

Director Vishal Bhardwaj speaks to Pankaj Shukla about khufiya aasmaan ali fazal Najibabad shikarpur cricket
खुफिया में अली फजल - फोटो : सोशल मीडिया

आपकी आने वाली फिल्म खुफिया में अली फजल का जो किरदार है उसी के ऊपर पूरा उपन्यास लिखा गया है एस्केप टू टू नोव्हेयर। इस किरदार के लिए अली फजल को ही लेने की क्या वजह रही?
अली का काम मैंने ‘मिर्जापुर’ में देखा। फिर अली ने एक फिल्म महामारी के दौरान की थी जो अभी रिलीज नहीं हुई है। वह दो लोगों की फिल्म थी जो एक घर के अंदर शूट हुई है। उसने और हुसैन दलाल ने काम किया था। उसमें मुझे अली का काम बहुत अच्छा लगा। दंगों के समय की फिल्म है कि एक कमरे में दो लोग फंसे हुए हैं। एक हिंदू है। एक मुसलमान है। बहुत खूबसूरत काम किया है अली ने इस फिल्म में। ‘मिर्जापुर’ में बबलू का किरदार तो हम देख ही चुके हैं, लेकिन इस फिल्म को देखकर मुझे लगा कि अली के अंदर तो कमाल की विविधता और गहराई है, उनके अभिनय में। थोड़ा सा मुझे चाहिए भी था ऐसा जैसा किरदार कि उसे शौक है महंगी घड़ियां पहनने का। विदेशी शराब पीने का। और, अली ने बहुत अच्छा काम किया है इस किरदार के लिए फिल्म ‘खुफिया’ में।

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विशाल भारद्वाज और आसमान भारद्वाज - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

जब पिता-पुत्र एक ही पेशे में हों और एक ही कला भी अपना रहे हों तो घर में दोनों का नजरिया कितना टकराता है आपस में क्योंकि अब वह भी निर्दशक हैं, आप तो हैं ही निर्देशक पहले से?
अरे, बहुत टकराता है। पहली बात तो इसी पर टकराता है कि आज फिल्म कौन सी देखेंगे। वह कहेंगे मुझे ये फिल्म देखनी। मैं कहूंगा नहीं तो मुझे ये नहीं, मुझे वह वाली देखनी है। मुझे ये जॉनर चाहिए ही नहीं। मैं इस विषय पर काम कर रहा हूं। तो हमारा बहुत होता है। बहस भी होती हैं और बहुत सी हम चर्चा भी करते हैं अलग अलग किरदारों को लेकर। इसमें मजा भी है क्योंकि ये जिंदगी है ही ऐसी।

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आसमान भारद्वाज ग्रैजुएशन सेरेमनी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

किसी हुनरमंद पिता का बच्चा अगर अपने पिता की ही कला को अपना रहा है, तो एक पिता को अपने बेटे की परवरिश किस तरह करनी चाहिए, अपने बेटे का हुनर निखारने के लिए?
बड़ा मुश्किल काम है, लेकिन हां आप अपने बच्चे को उस दुनिया के सामने ला सकते हैं कि देखो, ये दुनिया है। इसमें तुम खुद कितनी डुबकी लगाओगे। जितना गहरे जाओगे, उतना ऊपर निकलकर आओगे। जब आप उसे दुनिया के सामने उतार देते हैं तो कभी उसको पहले ही समझ आ जाएगा, कभी बाद में समझ आएगा। कभी, कभी भी समझ में नहीं आता। आप उसको हर चीज मुहैया करा सकते हैं, आप उसको जिंदगी का कल्चर दे सकते हैं कि ये हमारी संस्कृति है, हम यहां से आते हैं। हर इंसान अपनी एक अलग बनावट लेकर पैदा होता है। कुछ है हमारी परंपरा में। वह अब भी हमारे साथ रहना चाहता है। वह खुद अपने पैरों पर खड़ा हो चुका है। उसकी गर्लफ्रेंड है, फिर भी वह हमारे साथ वक्त बिताना चाहता है। एक बाप सिर्फ इतना काम कर सकता है कि वह अपने बेटे को उन चीजों के समक्ष खोल दे। अगर फिर भी नहीं कर रहा है तो किसी तरह उसे धक्का दे उसके अंदर। बाप को कभी दोस्त बनना पड़ता है, कभी दुश्मन बनना पड़ता है।

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विशाल भारद्वाज - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

आपके पिताजी आपकी संगीत यात्रा की पहली सीढ़ी बने थे। फिर जो आपकी पत्नी बनीं, उन्हें भी संगीत में रुचि है। आप खुद भी संगीत का ध्यान करते हैं। इस जीवन यात्रा के शुरू में जो आपने सुर लगाए थे, वे अब भी कितने संतुलित बचे हुए हैं?
मुझे लगता है कि संतुलन अच्छे से बना हुआ है क्योंकि एक तो संगीत मेरी जिंदगी थी और अब भी मेरे लिए मेरा पहला प्यार संगीत ही है। फिल्म निर्देशक बना भी मैं इसलिए कि जैसा संगीत मैं सिनेमा में चाहता हूं वैसा कर सकूं नहीं तो कौन मुझे मेरी पसंद का संगीत अपनी फिल्म में करना देना चाहेगा। दूसरा संतुलन जो परिवार के साथ जीवन में होना चाहिए, वह भी बनना बहुत जरूरी है। अभी तक तो सब संतुलन में है।

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