निर्माताः यशराज फिल्म्स
आप सलमान खान के फैन हैं और ईद पर उन्होंने ट्यूबलाइट में निराश किया था तो साल खत्म होत-होते वह भूल सुधार के साथ लौटे हैं। ट्यूबलाइट भूल जाइए। टाइगर से मिलिए। फिल्म सलमान के फैन्स के लिए उनकी इच्छानुसार डिजाइन की गई है। सलमान का कैसा ऐक्शन और कैसा रोमांस फैन्स को पसंद है, निर्देशक अली अब्बास जफर ने पूरा ध्यान रखा है, इसलिए फिल्म देखने जाएं तो कहानी मत ढूंढिएगा क्योंकि दो घंटे चासील मिनट में वह बमुश्किल चार मिनट की है! बाकी सब उसके इर्द-गिर्द रचा गया संसार है।
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Film Review: धमाकेदार एक्शन, दमदार डायलॉग, सलमान ने दिखा दिया 'टाइगर जिंदा है'
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यह फिल्म 2014 में इराक में एक आतंकी संगठन द्वारा भारतीय नर्सों के अपहरण की सच्ची घटना से प्रेरित है। फिल्म में आतंकी संगठन आईसीई चलाने वाला सरगना अबु उस्मान (सज्जाद दिलअफरोज) इराकी फौज के हमले में घायल होता है। वह 25 भारतीयों और 15 पाकिस्तानी नर्सों से भरी बस का अपहरण करके अस्पताल में पहुंचता है।
अस्पताल को खाली करा के अबु का ठिकाना बनाया जाता है। भारत सरकार के सामने चुनौती है अपनी नर्सों को छुड़ाने की। रॉ के चीफ बने गिरीश कर्नाड कहते हैं कि यह काम सिर्फ टाइगर (सलमान खान) कर सकता है, जो मालूम नहीं कहां है?
अलग-अलग रास्तों से टाइगर और जोया अपनी टीमों के साथ एक जगह पहुंचते हैं। तय होता है कि रॉ और आईएसआई मिलकर मिशन को अंजाम दें। तय है कि आतंकी अब बच नहीं सकते। उन्हें अंततः खत्म होना है।
टाइगर जिंदा है शुरू से अंत तक एक्शन दृश्यों पर निर्भर है। आतंकी फौज, तीन सहायक, दो पाकिस्तानी कमांडरों के बीच सलमान ने अपने अकेले कंधे पर एक्शन में जान फूंकी है। बाकी लोग कभी-कभार एक्शन में दिखते हैं। कैटरीना के हिस्से में भी कुछ मार-धाड़ और मशीनगन वाले दृश्य हैं। देशभक्ति के साथ यहां ऐसे भारत-पाकिस्तान की बातें हैं जो दोस्त हो जाएं तो क्या न कर दें। फिल्म में स्क्रिप्ट की जरूरत नहीं दिखती क्योंकि एक के बाद दूसरे दृश्य में भी गोलियां ही चलती नजर आती है।
रोचक बात यह कि आतंकियों की फौज धराशायी होती रहती है लेकिन मिशन पर निकले लोग लगभग सलामत रहते हैं। पूरे घटनाक्रम में अमेरिका की भी पोल खोली गई है कि उसने विश्व में युद्ध का बाजार तैयार कर दिया है। वह दुनिया के तेल की कुओं का अपने लिए इस्तेमाल चाहता है। वह आतंकी संगठनों को पालता-पोसता और सबको डरा कर रखता है।
फिल्म में सलमान-कैटरीना के अलावा जो किरदार उभरता है, वह है तोबान बने परेश रावल। वह ऐसे रॉ एजेंट हैं जिसने आतंकियों के बिजनेस में गहरी पैठ बना ली है। वह उनसे दोस्ती रखता है। परेश ने बढ़िया ढंग से अपना रोल निभाया। अबु उस्मान के रोल में ईरानी ऐक्टर सज्जाद दिलअफरोज भी जमे हैं। फिल्म में गीत-संगीत की गुंजाइश नहीं है। यहां दो ठीक-ठाक गाने हैं। फिल्म का कैमरावर्क, एक्शन डायरेक्शन और वीएफएक्स बेहतरीन क्वालिटी का है।
कुल मिलाकर टाइगर जिंदा है का मैसेज हैः सलमान में अभी दमखम है। हॉलीवुड के रैम्बो वाले अंदाज में अपनी मजबूत बाजुओं से वह फिल्म खींचते हैं। अली अब्बास जफर की फिल्म पर मजबूत पकड़ है।