दिल्ली के रीगल सिनेमा में माधुरी दीक्षित की फिल्में देखते समय गजराज राव इस मोहक, मादक सुंदरी के सपने देखा करते थे। किस्मत का खेल देखिए फिल्म ‘मजा मा’ में वह माधुरी दीक्षित के ही हीरो बन गए। चार्ली चैपलिन और अमिताभ बच्चन की फिल्में देखकर उनमें अभिनय के प्रति दिलचस्पी जागी और फिर एक दिन मौका मिला दिल्ली के ही मंडी हाउस में एक नाटक देखने का। पहली बार गजराज को लगा कि उनकी राह तो ये है और वह न जाने कब से, कौन कौन से रास्तों पर भटकते रहे हैं। गजराज रंगमंच के पुराने खिलाड़ी हैं। आयुष्मान खुराना ने भी उसी थियेटर ग्रुप से अपनी शुरुआत की, जहां के गजराज कभी उस्ताद हुआ करते थे। उनका एक नाटक 'गुनहगार' इन दिनों सैटेलाइट चैनल पर जी थियेटर पर भी प्रसारित हो रहा है। गजराज राव से इस बार ‘अमर उजाला’ की मुलाकात हुई तो खूब बातें हुईं, दिल खोलकर बातें हुईं। आइए आपको इसका साझादीर बनाते चलते हैं...
Sunday Special: ‘बैंडिट क्वीन’ में गजराज राव को यूं मिला पहला मौका, संघर्ष के दौरान हिंदी ने चमकाया करियर
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झांखड़ी गांव के गजराज राव
राजस्थान के डूंगरपुर जिले के छोटे से गांव झाखड़ी में कोई 52 साल पहले जन्मे गजराज राव की पढ़ाई लिखाई और कढ़ाई भी दिल्ली में हुई है। पिता भरत राव रेलवे में कर्मचारी थे और मां प्रेम राव घर संभालती थीं। पढ़ाई में मन नहीं लगता था। घर का हालत ऐसी नहीं थी कि जो मन में आए वह कर सकें। किसी तरह दिल्ली यूनिवर्सिटी से स्नातक की पढ़ाई पूरी की और उसके पहले ही जिंदगी की चक्की में पिसने लगे। छोटा मोटा काम करके घर की आर्थिक मदद करते लेकिन ये तय नहीं था कि जाना कहां और किधर है। गजराज बताते हैं, ‘16-17 साल की उम्र में मेरी जिंदगी उस तरह की थी जैसे तूफान में समुद्र के बीच में नौका हिलती डुलती है। वह नाव किनारे आएगी कि नहीं आएगी, ये भी पता नहीं था। उसी दौरान थियेटर मेरी जिंदगी में आया और यूं लगा कि तूफान में फंसी कश्ती को सहारा मिल गया है।’
अंग्रेजी बोलने वाले बुरे नहीं होते
गजराज राव अक्सर फिल्मों में मध्यमवर्गीय परिवार के वर्जित विषयों पर बनी फिल्मों में दिखते हैं। बचपन भी उनका ऐसे ही परिवार में बीता और शुरू शुरू में तो खुद उनकी सोच भी वैसी ही थी। वह बताते हैं, ‘मुझे अपने ही मित्रों को घर लाने में बड़ा संकोच होता था। सोचता था कि मेरा छोटा सा घर और दोस्त मेरे सारे रईस परिवारों से। बाद में थियेटर ने जिंदगी के मेरे फलसफे को साफ किया। मैंने साहित्य पढ़ा। अच्छे लेखकों को पढ़ा और समझ ये आया कि दिमाग के जो जाले हैं, वे फालतू के हैं। ये भी समझ आया कि अंग्रेजी बोलने वाले और बड़े बंगलों में रहने वाले सारे लोग बुरे नहीं होते। एक तरह से रंगमंच की दुनिया में मेरा पुनर्जन्म ही हुआ। इसी दौरान अखबारों में लिखने का मौका मिला। पहले लेख के ढाई सौ रुपये मिले तो पिताजी को लगा कि अब लड़का कुछ कर ले जाएगा।’
जब पिताजी के चेहरे पर दिखा संतोष
गजराज राव के पिताजी भी करोड़ों दूसरे परिवारों के मुखियाओं की तरह यही चाहते थे कि बेटे की कोई सरकारी नौकरी लग जाए तो ठीक रहे। गजराज ने कोशिशें भी इसके लिए कम नहीं की लेकिन बात बनी नहीं। फिर एक दिन वह अपने पिताजी को साथ ले गए नाटक दिखाने। गजराज बताते हैं, ‘पिताजी नाटक देखने आए तो मुझे मंच पर अभिनय करते देख रहे लोग मेरे लिए तालियां बजा रहे थे। पहली बार मुझे पिताजी के चेहरे पर अपने काम को लेकर संतोष दिखा। थोड़े बहुत पैसे मैं कमाने ही लगा था। पिताजी को समझ आया कि बेटे ने जो राह चुनी है, वह गलत नहीं है। और, इसके बाद टेलीविजन और विज्ञापन की दुनिया से जुड़ा तो वह मुझे लेकर निश्चिंत हो गए।’
सरकारी नौकरी नहीं मिली तो आए मुंबई
गजराज राव टेलीविजन के शुरुआती दौर के कलाकार हैं। दिल्ली उन दिनों टेलीविजन कार्यक्रमों के लिए काफी अच्छी जगह हुआ करती थी। गजराज राव को टेलीविजन में पहला मौका क्राइम शो 'भंवर' में बतौर लेखक मिला। उसके बाद सिद्धार्थ बसु की कंपनी ने उन्हें लेखन का मौका दिया। रास्ते खुले तो गजराज का अगला पड़ाव विज्ञापनों की दुनिया बनी। वह बताते हैं, ‘रंगमंच छोड़ने का मन नहीं कर रहा था लेकिन वहां रत्ती भर भी कमाई नहीं थी। मैंने अपने एक मित्र को कहा भी कि अगर मुझे 10 हजार रुपये महीने की नौकरी दिल्ली में मिल जाए तो कभी मुंबई नहीं जाऊंगा। लेकिन नौकरी उन दिनों इतनी आसानी से मिलती नहीं थी। और, तभी मेरी मुलाकात प्रदीप सरकार से हो गई।’