Movie Review: गिन्नी वेड्स सनी
नेटफ्लिक्स ने गुरुवार को न्यौता भेजा एक ऐसी फिल्म को शुक्रवार की सुबह 9 बजे देखने का जो आम पब्लिक के लिए दोपहर साढ़े बारह बजे से उपलब्ध है। ये टोटका वैसे तो हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में यशराज फिल्म्स का कॉपीराइट है लेकिन फिल्म ‘गिन्नी वेड्स सनी’ के निर्माता विनोद बच्चन भी किसी यशराज से कम थोड़े ही है। उनका भी अपना फिल्म मेकिंग का रुआब है। यूपी में नई फिल्मसिटी खुलवाने वालों में भी वह शामिल रहे हैं। लेकिन, जितना सक्रिय वह बाकी सब जगहों पर हैं, उतना ध्यान शायद ज्यादा बिजी होने के चलते खुद अपनी फिल्म पर इस बार दे नहीं पाए।
Ginny Weds Sunny Review: इस फिल्म की विलेन बनी कहानी, यामी और विक्रांत की मेहनत पर फिरा पानी
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वाशू भगनानी भी कभी हिंदी सिनेमा के नंबर वन प्रोड्यूसर रहे हैं। फिर उनको लगा कि डेविड धवन की वजह से नहीं फिल्में तो उनकी वजह से हिट हो रही है। तो उन्होंने ए मुथु को डायरेक्टर बना दिया। खालिद मोहम्मद से फिल्म बनवा ली। प्रोड्यूसर जब ज्यादा ज्ञानी हो तो फिर यही होता है, जैसे कि फिल्म ‘गिन्नी वेड्स सनी’ में होने जा रहा है। बिना सिर पैर वाली एक फिल्म सिर्फ इसलिए बनी है कि यामी गौतम और विक्रांत मैसी उनके पास साइन हैं, तो फिल्म बना लेनी है।
विनोद बच्चन को बिजनेस की अच्छी समझ है, तभी तो फिल्म नेटफ्लिक्स पर रिलीज हो रही है। कहानी की उतनी समझ दिखती नहीं है। यामी गौतम और विक्रातं की जोड़ी में ताजगी है। कोई ताजा कहानी होती तो ये फिल्म एक नई बयार बन सकती थी। लेकिन जिस फिल्म का नाम ही ‘गिन्नी वेड्स सनी’ हो और फिल्म दिल्ली में सेट हो तो फिर क्या हो सकता है। वही सब कुछ जो दर्शक बीसियों फिल्मों में पहले ही देख चुका है।
तो इस नई बैंड, बाजा, बारात का दूल्हा है सनी। घर पर सख्त बाप है। गाय जैसी मां है। बेटा कन्फ्यूजन में है कि लाइफ उसे अपनी जीनी है या फिर इन लोगों की। लेकिन, क्या करे बेचारा बगावत भी तो नहीं कर सकता। उतनी ही कन्फ्यूज कहानी की दूसरी किरदार गिन्नी भी है। एक एक्स है। बाकी सब दुनिया वाई जेड हो चुकी है। कहानी के इन दोनों किरदारों को मिलना है। बीच में खूब सारे डैडीजी, मम्मी जी वाले जबर्दस्ती ठूंसे गए सीन्स हैं। कानों को दुखते गीत हैं और पिक्चर पूरी हो जाती है।
फिल्म के दोनों लीड कलाकार विक्रांत मैसी और यामी गौतम अपनी तरफ से पूरी मेहनत करते हैं, वह सब कर दिखाने की जो उनको उनके निर्देशक पुनीत खन्ना ने करने को कहा होगा। फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी है इसकी पटकथा जिसने इस फिल्म को कभी ऊपर उठने ही नहीं दिया। कमजोर कहानी ने कमजोर किरदार गढ़े जिसने इसके मुख्य किरदारों के लिए ज्यादा कुछ कर सकने की गुंजाइश ही नहीं छोड़ी। सहयोगी कलाकार भी पूरी फिल्म में कभी अपनी लय नहीं पा सके। फिल्म का सेटअप जिस तरह का है, उसमें तकनीकी टीम को बहुत ज्यादा अपनी तरफ से कोई कौशल दिखाने की गुंजाइश ही नहीं रही। फिल्म के संगीत से भी निराशा ही होती है।
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