1999 में मिस इंडिया बनीं मशहूर अदाकारा गुल पनाग दिल से भी बहुत खूबसूरत हैं। दिल्ली में चल रहे किसान आंदोलन में वह किसानों का समर्थन देने आ चुकी हैं। राजनीति का एक सबक वह आम आदमी पार्टी के साथ भी पढ़ चुकी हैं। लेकिन, वह टोली उन्हें ज्याद रास नहीं आई। गुल का नाम उन शख्सियतों में शामिल है जो जीवन अपनी शर्तों पर जीते हैं। राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्म निर्देशक अश्वनी चौधरी की 2003 में आई फिल्म ‘धूप’ से अपना अभिनय करियर शुरू करने वालीं गुल एक दमदार अभिनेत्री हैं। एक सक्रिय राजनीतिज्ञ हैं। कुशल गृहणी हैं। एक जिम्मेदार बेटी, पत्नी और मां भी हैं। जिंदगी के हर किरदार में सामंजस्य बिठाती गुल पनाग के जीवन की ये पांच बातें किसी भी बेटी को कामयाबी के शिखर तक पहुंचा सकती हैं।
गुल पनाग के सक्सेस मंत्र- इन पांच आदतों को अपनाकर आप भी बन सकती हैं न्यू मिलेनियल ‘अपराजिता’
करो अपने मन की
मैं उस वक्त कॉलेज में थी और मेरे घर में एक मोटरसाइकिल और एक स्कूटर हुआ करता था। जब मैं चलाने लायक हुई तो मुझसे पूछा गया कि तुम्हें इन दोनों में से क्या चाहिए? मैं जवाब देने ही वाली थी कि अचानक पीछे से किसी ने कहा कि जाहिर है स्कूटर ही चलाएगी। यह बात मुझे लग गई। मैंने सोचा कि यह फैसला करने वाले वे कौन हैं कि मैं क्या चलाऊंगी और क्या नहीं? फिर मैंने उस वक्त मोटरसाइकिल को चुना। इसी तरह जब मैं अपने कॉलेज में बीए का फॉर्म भरने के लिए गई तो मुझसे किसी ने कहा कि क्या तुम आर्ट्स के लिए फॉर्म भर रही हो? इसी बात पर मैंने उस समय गणित को चुन लिया। मुझे सुकून सिर्फ अपने मन का करने में मिलता है।
उड़ान के सपने ही मत देखो, मेहनत भी जरूरी
मेरे पास भी जहाज उड़ाने का लाइसेंस है। मैं ऋषि को बोर्डिंग स्कूल में मिली थी। मुझे वह याद रहे लेकिन उन्हें मैं याद नहीं थी। मैं 15 साल की थी जब मैंने उन्हें देखा और तभी फैसला कर लिया कि मैं इसी तरह के किसी इंसान से शादी करूंगी। उसके बाद फिर हम करीब छह साल बाद मिले। इस दौरान हम दोनों ने अपने अपने सपने पूरे करने के लिए बहुत मेहनत की। तब से फिर हम साथ हैं। वह मेरे बहुत बड़े सहयोगी हैं। उन्होंने भी मुझे मेरी हर कामयाबी में मदद की है।
प्रेम को बाधा नहीं संबल बनाएं
प्यार उम्र के अलग-अलग पड़ावों से गुजरता है तो उस हिसाब से उसकी परिभाषा बदलती रहती है। जब प्यार शुरुआत के पड़ाव में अपने चरम पर होता है तो उसको महसूस करना कुछ अलग है। लेकिन वही प्यार जब मध्य उम्र में पहुंच जाता है तो उसकी परिभाषा बदल जाती है। फिर उसके पर्यायवाची समझ में आते हैं जिसे हम एक दूसरे की देखभाल करना या एक दूसरे का आदर करना कह सकते हैं। मेरे हिसाब से प्रेम की परिभाषा बहुत कठिन है लेकिन समय-समय पर उसके पर्यायवाची ढूंढना आसान है। अगर आप किसी से प्यार करते हैं तो आपको इसे हर रोज जाहिर करना चाहिए। और, यह प्रेम आपके करियर का संबल होना चाहिए, बाधा नहीं।
राजनीति में हिस्सा लेना जरूरी
मेरा मानना है कि देश के प्रत्येक नागरिक को राजनीति में सक्रिय होना चाहिए। अगर सोचते हैं कि कोई और आएगा और आपकी समस्याओं का समाधान करेगा तो यह बहुत मुश्किल है। राजनीति में सक्रिय होने के लिए लोग सिर्फ एक दिन निकालते हैं जिस दिन वोट करते हैं। उसके बाद अगले पांच साल तक पूरा देश एक ही आदमी के कंधे पर छोड़ देते हैं, क्यों? जब तक हम पूरी तरह से हर दिन राजनीति में सक्रिय नहीं होंगे तब तक हमें वह देश नहीं मिलेगा जिसकी हमें चाहत है।