‘अमर उजाला’ की लोकप्रिय ओरिजिनल सीरीज ‘हाशिये के सुपरस्टार’ में आज बात बिहार से मुंबई आए अभिनेता पंकज झा कश्यप की। काफी लंबे संघर्ष के बाद पंकज झा कश्यप को वेब सीरीज 'महारानी' में दिवाकर की दमदार भूमिका मिली। हालिया रिलीज वेब सीरीज 'जुबली' में निभाए उनके पुलिस इंस्पेक्टर के किरदार की भी सराहना हो रही है। अपने दादाजी से अभिनय का डीएनए पाने वाले पंकज ने हिंदी सिनेमा की ग्लैमर दुनिया का असली चेहरा करीब से देखा है और ये भी देखा है कि मीडिया में चर्चित नाम असल में संघर्षशील कलाकारों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। तो आइए जानते हैं पूर्वी चंपारण से आए हीरो पंकज झा कश्यप की कहानी, उन्हीं की जुबानी...
Hashiye Ke Superstar 12: ‘जुबली’ ने बदल दी पंकज झा कश्यप की किस्मत, अररिया से आकर मायानगरी में बनाया मुकाम
नौ साल की उम्र से अभिनय
मेरा जन्म बिहार के पूर्वी चंपारण के जिले अररिया गांव में 14 दिसंबर 1978 को हुआ। मेरे दादा रामनंदन झा और पिता कृष्ण कुमार झा का कला के प्रति गहरा लगाव था। दादा जी सती सावित्री, रामायण जैसे धार्मिक नाटकों का आयोजन करवाते थे। उनमें कभी कृष्ण तो कभी राम का किरदार निभाया। पिताजी भी नाटकों में भाग लेते थे, लेकिन जैसे मैंने होश संभाला तो उन्होंने नाटकों में काम करना इसलिए बंद कर दिया क्योंकि वह नहीं चाहते थे कि नाटकों का प्रभाव मेरे जीवन में पड़े और मैं इसमें करियर बनाने की सोचूं। मैं करीब नौ साल का रहा होगा जब एक नाटक में भिखारी का रोल किया। शर्त यह थी कि अपने घर भी भी जाकर भीख मांगनी है और कोई ना पहचाने। मेरी ऐसी वेशभूषा ऐसी थी कि घरवालों ने वाकई मुझे नहीं पहचाना।
‘दिल्ली 6’ से हुआ श्रीगणेश
12वीं की पढ़ाई करने के लिए मैं सीतामढ़ी आ गया। गांव से पहली बार बाहर निकला तो मुझे आजादी का अनुभव हुआ। सीतामढ़ी के गोयनका कॉलेज से 12वीं के बाद ग्रेजुएशन के लिए पटना आ गया। पटना के साइंस कॉलेज में एडमिशन नहीं मिला तो मुजफ्फरपुर चला गया और वहां से ग्रेजुएशन किया। मुजफ्फरपुर में ही उत्तम कुमार और मुकुल बंदोपाध्याय से मुलाकात हुई और उनके साथ थियेटर करने लगा। पढ़ाई में कम और थियेटर में ज्यादा रुचि थी। साल 2003 में दिल्ली आया और जब घर वालों को पता चला कि मैं वहां मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई न करके मंडी हाउस के चक्कर लगा रहा हूं तो सब नाराज हुए। जैसे ही मैंने अभिनेता बनने का इरादा घरवालों के साथ जाहिर किया, वहां तो मातम जैसा माहौल छा गया। मेरे पड़ोस के चाचा जितेंद्र झा दिल्ली में रहते थे, उन्होंने मेरा बहुत सहयोग किया। आजीविका चलाने के लिए बच्चों को ट्यूशन पढ़ता था। मैने कुछ अंग्रेजी नाटक किए। दूरदर्शन के कार्यक्रम ‘कृषि दर्शन’ में एंकरिंग भी की। लाइफ इंडिया चैनल के कार्यक्रम 'मेरी दीवानगी' के कई एपिसोड में लीड भूमिकाएं निभाई। दिल्ली में ही मुझे फिल्मों का पहला ब्रेक राकेश ओमप्रकाश मेहरा की फिल्म 'दिल्ली 6' और सुभाष घई की फिल्म 'ब्लैक एंड व्हाइट' में मिला।
प्रकाश झा ने कहा, दोबारा फोन मत करना साल 2009 फरवरी में मैं मुंबई आ गया। पनवेल अपनी बुआ के यहां रहता था जहां से अंधेरी आने जाने में छह घंटे लगते थे। एक फिल्म डायरेक्ट्री थी मेरे पास, उसी से पते निकालकर लोगों से मिलता रहता था। निर्माता निर्देशक प्रकाश झा मेरे दूर के रिश्तेदार हैं। उनको फोन किया तो उन्होंने अपने सहायक का नंबर देकर ताकीद की कि दोबारा इस नंबर पर फिर कभी फोन मत करना। उनकी फिल्म 'लिपस्टिक अंडर माय बुरका' में एक रोल के लिए फाइनल भी हुआ फिर पता नहीं क्या हुआ उस फिल्म में काम नहीं मिला।
नए कलाकारों के मसीहा हैं मुकेश
कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा मेरे बड़े पुराने मित्र हैं। दिल्ली में हम मिलते रहते थे, तब वह वहां टीआई में काम करते थे। फिर अपनी पहली फिल्म ‘चिंटूजी’ की कास्टिंग के समय उन्होंने कोशिश की थी मुझे रोल देने की। फिर मुम्बई आए तो उनसे मिलने की बात हुई लेकिन उनकी व्यस्तता की वजह हम से मिल नहीं पाए। ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ में मेरे लायक काम था लेकिन किसी वजह से ऑडिशन नहीं हुआ। उसके बाद कोशिश के बाद भी कभी उनसे व्यक्तिगत रूप से मिल नहीं पाया क्योंकि तब तक मुकेश के पास बहुत काम आ गया था। 2020 में लॉकडाउन के दौरान उन्होंने मुझे वेब सीरीज ‘महारानी’ में काम करने का मौका दिलाया। अभी टीवीएफ के शो में भी उनकी कास्टिंग एजेंसी के चलते काम मिला है। बाहर से आए कलाकारों के लिए किसी मसीहा से कम नहीं हैं मुकेश छाबड़ा।