ऋतिक रोशन को बतौर हीरो अपनी पहली फिल्म 'कहो ना प्यार है' की अमर उजाला में छपी फिल्म समीक्षा का शीर्षक ‘आ पहुंचा एक नया स्टार’ अब तक याद है। उनकी पिछली फिल्म 'सुपर 30' की अब तक सराहना हो रही है और अब काउंटडाउन शुरू हो चुका है उनकी अगली फिल्म 'वॉर' का, जिसे भारतीय सिनेमा की सबसे बड़ी एक्शन फिल्म कहा जा रहा है। ऋतिक रोशन से अमर उजाला की ये EXCLUSIVE बातचीत।
एक्सक्लूसिव: 'सुपर 30' के बाद अब 'WAR में उतरेंगे ऋतिक, खास इंटरव्यू में खोले जिंदगी के कई राज
देख रहे हैं कि आपने सुपर 30 की कामयाबी का जश्न ही नहीं मनाया, न कोई पार्टी न कोई जलसा, सीधे फिर से काम पर?
हां, समय बहुत तेजी से आगे भाग रहा है। समय को साधना आता तो जरूर पार्टी करता। लेकिन, 'सुपर 30' के तुरंत बाद 'वॉर' की शूटिंग में लग गया। अब इसका पोस्ट प्रोडक्शन चल रहा है। सच पूछें तो मेरे पास वाकई 'सुपर 30' की कामयाबी का जश्न मनाने के लिए अभी समय नहीं रहा।
कोई फिल्म जब हिट होती या फ्लॉप भी हो जाती है, तो आपकी पहली प्रतिक्रिया इसके बारे में क्या होती है?
मेरा मानना है कि किसी भी अभिनेता के लिए सबसे बड़ी बात उसके जीवन में होती है अपनी सूझबूझ या सहज प्रवृत्ति को बार बार ठोंक बजाकर देखते रहना। ये ठीक से काम कर रही हैं कि नहीं। समय के साथ बदल रही है कि नहीं। दुनिया के बाकी बदलावों के साथ कदमताल कर रही है कि नहीं। दोनों में तालमेल बहुत जरूरी है। कई बार अभिनेता के तौर पर मुझे लगता है कि ये फिल्म नहीं चलने वाली और वह फ्लॉप हो भी जाती है तो सुकून इस बात का मिलता है कि इसने मेरी सहज प्रवृत्ति को सही साबित किया। लेकिन, अगर आपको लगा कि फिल्म खराब है और फिल्म फिर भी चल जाए तो यह बहुत अजीब सी स्थिति होती है क्योंकि फिर आपको समझ नहीं आएगा कि आगे क्या और कैसे करना है।
मुख्य भूमिकाओं में अभिनय के आपके दो दशक पूरे होने वाले हैं। नंबर वन की दौड़ में आप कभी रहे नहीं। क्या सबक सीखे हैं आपने अपनी इस अभिनय यात्रा में?
मेरे ख्याल से जिस बात में मैं सबसे ज्यादा यकीन रखता हूं, वह ये है कि रचनात्मकता में कोई सर्वश्रेष्ठ नहीं होता। कोई नंबर एक है या नंबर दो या नंबर तीन, ये सब बातों में अच्छा लगता है। बातें करने के लिए ये थोड़ा रोचक भी होता है शायद। लेकिन, जैसे मैं अपने बच्चों को सिखाता हूं वैसा ही जीवन है। मैं बच्चों से कहता हूं कि आप दौड़ में जब भागते हो तो पहले स्थान पर रहे या आखिरी स्थान पर इससे मुझे कोई मतलब नहीं है। मतलब इस बात से है कि जब आपने दौड़ना शुरू किया तो आपने उसमें अपना सब कुछ दांव पर लगाया कि नहीं। मेरा सबक तो यही है कि मैं जो भी करूं उसमें अपना सबकुछ झोंक दूं, बिना नतीजे की परवाह किए।
ये तो सबक हुआ सिनेमा का, जीवन का क्या सबक रहा?
इसको मैं दूसरी तरह से देखता हूं। मैं देखता हूं कि जीवन में मेरे पास क्या विकल्प हैं? विकल्प बस दो ही हैं, कोशिश करना या फिर कोशिश नहीं करना। मैं सोचता हूं कि क्या मैं कोशिश करके ये साबित कर सकता हूं कि जीवन अच्छा है। या फिर कि मैं बिना कुछ किए बस जीवन को कोसता रहूं कि नहीं दुनिया बहुत खराब है। कुछ नहीं सुधरने वाला। तो मैं पहला विकल्प चुनता हूं और यह तय करता हूं कि मैं कोशिशें करना बंद नहीं करूंगा।