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Kabir Khan Interview: ‘83’ के निर्देशक ने बताई फिल्म न चलने की वजह, ‘पवनपुत्र भाईजान’ पर भी किया खुलासा
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भारतीय क्रिकेट टीम की पहली विश्वकप जीत पर बनी फीचर फिल्म ‘83’ का बॉक्स ऑफिस पर कुछ कुछ वैसा ही संघर्ष जारी है जैसा कपिल देव की टीम ने इस टूर्नामेंट में लंदन पहुंचने के बाद लगातार किया था। आंकड़ों के हिसाब से फिल्म बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप हो चुकी है लेकिन फिल्म के निर्देशक कबीर खान का दावा है कि फिल्म देखने जितने भी लोग पहुंचे उन सबको ये फिल्म पसंद आ रही है और इस बात के कई कारण हो सकते हैं कि समीक्षकों न जिस फिल्म को इतना सराहा उसे देखने लोग सिनेमाघरों तक क्यों नहीं आए। वजह पूछने पर कबीर खान फिल्म ‘83’ के बॉक्स ऑफिस पर न चल पाने की वजह कोरोना की तीसरी लहर को ही मानते हैं। हालांकि, फिल्म को वितरित करने वाली कंपनी रिलायंस एंटरटेनमेंट के सीईओ रहे शिबाशीष सरकार ने अपने एक इंटरव्यू में यही कहा था कि ओमिक्रॉन वैरिएंट का सिनेमाघरों में आने वाले दर्शकों पर कोई असर नहीं है।
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83 द फिल्म
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म निर्माता विष्णु इंदुरी ने फिल्म ‘83’ पर शुरुआती मेहनत की है। फिल्म बनाने के लिए अलग अलग खिलाड़ियों से इसके अधिकार हासिल करने में ही करीब 60 करोड़ रुपये खर्च हुए बताए जाते हैं। बाद में इसकी मेकिंग पर 120 करोड़ रुपये और खर्च हुए। जानकारी यही है कि फिल्म की लागत का बड़ा हिस्सा इसके ओटीटी राइट्स से रिलायंस एंटरटेनमेंट को हासिल हो चुका है। फिल्म ने विदेश में भी ठीकठाक कमाई कर ली है। लेकिन, देसी दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींचकर लाने में क्या फिल्म ‘83’ की मार्केटिंग टीम विफल रही? इस पर कबीर खान खुलकर कुछ नहीं कहते। वह यही कहते हैं कि फिल्म का संदेश लोगों तक शायद सही तरीके से नहीं पहुंच पाया लेकिन दर्शकों के सिनेमाघरों तक न आने की बड़ी वजह कोरोना की तीसरी लहर ही है। कबीर के मुताबिक उनके तमाम दोस्त उन्हें फोन करके सिनेमाघर ना जा पाने के लिए माफी मांग चुके हैं।
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Kabir Khan, Kamal Haasan & Shibasish Sarkar
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
‘अमर उजाला’ से एक खास बातचीत में कबीर खान मानते हैं कि फिल्म ‘83’ एक उत्सव है और ये उत्सव दर्शकों के बीच सिनेमाघरों के बाहर जश्न का माहौल नहीं बना पाया। कबीर कहते हैं, ‘फिल्म ‘83’ देखने पहुंच रहे सारे लोगों को फिल्म बहुत पसंद आ रही है। सिनेमाघरों के भीतर ऐसा ही माहौल दिखता है जैसा कि क्रिकेट स्टेडियम में देखने को मिलता रहा है। लोग इसका आनंद उठा रहे हैं और खूब तालियां बजा रहे हैं। सीटियां मार रहे हैं। बस ये माहौल लोगों तक ढंग से पहुंच नहीं पा रहा।‘ क्या फिल्म की रिलीज से पहले रिलायंस एंटरटेनमेंट की फिल्म वितरण टीम और सिनेमाघर मालिकों के बीच चली रस्साकशी से भी मामला बिगड़ा? इस सवाल पर कबीर कहते हैं, ‘ये ट्रेड की रूटीन बातें हैं। इसमें कुछ खास ऐसा था नहीं जिस पर अलग से चर्चा की जा सके।’
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83 द फिल्म
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म ‘83’ सामान्य संस्करण के अलावा थ्रीडी में भी हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं में रिलीज हुई है। सिनेमा के समाज पर असर को करीब से समझने देखने वाले लोग मानते हैं कि फिल्म ‘83’ का प्रचार योजनाबद्ध तरीके से न होने के चलते ही इस फिल्म को देखने आज की पीढ़ी के दर्शक नहीं पहुंचे। ‘स्पाइडरमैन नो वे होम’ और ‘पुष्पा पार्ट 1’ जैसी फिल्मों तक का प्रचार प्रसार ऐसा रहा कि फिल्म का संदेश देश के घर घर तक पहुंच गया। वहीं फिल्म ‘83’ ऐसी फिल्म रही जिसके बारे में तमाम लोगों को आखिर तक पता ही नहीं चला। नई पीढ़ी से संवाद स्थापित करने के लिए फिल्ममेकर्स ने पूरे देश में कहीं कोई बड़ा क्रिकेट से जुड़ा इवेंट भी नहीं आयोजित किया।
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83 द फिल्म
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
निर्देशक कबीर खान को इस सबके बाद अब संतोष इस बात का है कि वह एक कालजयी फिल्म बनाने में कामयाब रहे और जब भी क्रिकेट पर बनी फिल्मों की बात होगी तो फिल्म ‘83’ का नाम पूरे सम्मान के साथ लिया जाएगा। वह कहते हैं, ‘मैंने और मेरी टीम ने फिल्म की शूटिंग शुरू करने से पहले दो साल इसकी रिसर्च करने में लगाए हैं। वर्ल्ड कप के बारे में जो कुछ लिखा गया वह सब तलाशने केलिए हमने तमाम लाइब्रेरी की खाक छानी। जो कुछ जहां भी उपलब्ध था हम सब समेट लाए और उसके बाद इसकी स्क्रिप्ट लिखी गई। हमें खुशी है कि हम क्रिकेट प्रेमियों के लिए एक यादगार फिल्म बनाने में सफल रहे।’
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