निर्माता, निर्देशक और चैट शो ‘कॉफी विद करण’ के होस्ट करण जौहर की गिनती हिंदी सिनेमा के दिग्गज फिल्मकारों में होती है। सोशल मीडिया पर उनको निशाना भी खूब बनाया जाता है। आरोप उन पर ये भी लगता रहा है कि वह सिर्फ फिल्मी परिवारों को बच्चों को ही अपनी फिल्मों में काम देते हैं। करण जौहर इन दिनों अपने चैट शो का सातवां सीजन होस्ट कर रहे हैं। उनकी बतौर निर्माता दो फिल्में ‘ब्रह्मास्त्र’ और ‘लाइगर’ अगले एक महीने में रिलीज होने वाली हैं। ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल से इस एक्सक्लूसिव मुलाकात में करण जौहर दे रहे हैं अपने ऊपर अक्सर लगने वाले आरोपों के जवाब। प्रस्तुत हैं इस एक्सक्लूसिव इंटरव्यू के कुछ अंश..
EXCLUSIVE: करण जौहर को मिली मां से सलाह, ‘साफ दिल से सच्चा काम दूसरों की राय की परवाह किए बिना करना ही चाहिए’
‘कॉफी विद करण’ का सीजन 7 को लेकर इन दिनों काफी हंगामा है। ये चैट शो करने का विचार आपको कैसे आया?
मैं बहुत बड़ा प्रशंसक रहा हूं तबस्सुम जी का। उनका एक शो आया करता था, ‘फूल खिले हैं गुलशन गुलशन’। फिर सिमी ग्रेवाल का एक शो शुरू हुआ, ‘रौंडवू विद सिमी ग्रेवाल’। मैं बहुत पसंद करता था इन शोज को। तबस्सुम जी के शो का तो मुझे बेसब्री से इंतजार रहता था। ये मेरे बचपन की एक बहुत ही खूबसूरत याद है। मेरे जेहन में हमेशा एक बात थी कि मैं भी एक टॉक शो करूंगा। लेकिन मैं दो लोगों का बुलाऊंगा। शो जब शुरू हुआ तो लोग मानते थे कि ‘के’ अक्षर मेरे लिए सौभाग्यशाली है। उन दिनों मैंने फिल्म ‘कुछ कुछ होता है’ बनाई थी, फिर ‘कभी खुशी कभी गम’ और ‘कल हो ना हो’ बनाई तो मैंने कहा कि चलो चैट शो का नाम रखते हैं ‘कॉफी विद करण’ लेकिन मैंने कॉफी की वर्तनी ‘के’ से कर दी। इसके लिए मुझे काफी आलोचना भी सुननी पड़ी। और, एक बार तो अंग्रेजी की एक शिक्षक ने मुझे कहा भी कि आपकी वजह से बच्चे कॉफी की स्पेलिंग ‘के’ से लिखने लगे हैं।
इस बार जब आपने अपना शो शुरू किया तो पहले ही एपीसोड में काफी कुछ ऐसा कहा जिससे लगता है कि ये शो अब आपका ‘माउथपीस’ भी है..
बिल्कुल, बहुत सी चीजें जो मैं कहना चाहता हूं और जो शायद मैं सामान्य साक्षात्कारों में नहीं कह सकता या कहना नहीं चाहता, वह मैं यहां कहता हूं। खासतौर से एपीसोड के पहले दो मिनट में। मैं जो कहता हूं कि वह मेरी निजी राय होती है। हम इसे थोड़ा हंसी मजाक में कहते हैं और उसको गंभीर होने से भी बचाते हैं। लेकिन, मैं मेहमानों के लिए भी जो कुछ बातें शो के दौरान कहता हूं, वे मेरी अपनी राय होती है।
और, पिछले दो साल में आप वाकई काफी परेशान भी रहे?
कौन परेशान नहीं रहा? फिल्म इंडस्ट्री की खूब आलोचना हुई है, खिंचाई हुई है। बहुत कुछ भला बुरा कहा गया। बायकॉट के इतने ट्रेंड्स हुए। मेरे खिलाफ भी बहुत सारी बातें लिखी गईं। ट्रोलिंग हुई। ट्विटर पर, इंस्टाग्राम पर इतना कुछ लोगों ने कहा। हम भी इंसान हैं। असर तो होता ही है। तकलीफ भी पहुंचती है। हमने इतना काम किया है। यही चाहा है कि लोगों को अपने काम से खुश कर सकें। सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने वाले लोग समझते हैं कि वे आपको जानते हैं और वह अपनी राय बना लेते हैं। इन दो साल में बहुत कुछ पढ़ा मैंने और फिर मुझे लगा कि शायद मैं ये सीजन न करूं। लेकिन, मेरी मां (हीरू जौहर) ने मुझे समझाया कि अगर आप साफ दिल से कोई काम करते हो और आपको उस पर सच्चा भरोसा है तो वह काम करना ही चाहिए।
सोशल मीडिया पर सितारों के जितने फॉलोअर्स होते हैं अगर उतनी ही टिकटें बिक जाएं तो फिर कोई फिल्म फ्लॉप नहीं होगी। आपको नहीं लगता कि सोशल मीडिया की इफरात ने दर्शकों का सिनेमा के प्रति आकर्षण कम कर दिया है?
हां, सितारों के इर्द गिर्द रहने वाला रहस्यमयी आवरण सोशल मीडिया के चलते खत्म हो गया है। आज की पीढ़ी शायद स्टारडम का असली रूप न देख पाए। राजेश खन्ना से लेकर अक्षय कुमार तक सबका स्टारडम रहा है। बचपन में मुझे याद है कि अमिताभ बच्चन जब पार्टी में आते थे तो हम उत्सुक रहते थे कि देखें आज क्या पहना है? हर जगह हम उनको देख भी नहीं पाते थे। उनकी सिर्फ प्रीमियर या मुहूर्त की तस्वीरें आती थीं। एक रहस्य बना रहता था। रही बात फिल्मों के चलने न चलने की तो मेरे पिता (यश जौहर) कहा करते थे, ‘हिट फिल्म इज ए गुड फिल्म’। ऐसा हुआ ही नहीं है कि कोई बहुत खूबसूरत फिल्म बनी, हिंदुस्तान ने उसे तहे दिल से चाहा और वह नहीं चली।