{"_id":"5cfe8833bdec2207626c6174","slug":"know-about-constitution-of-india-article-15-before-ayushmann-khurrana-film-release","type":"photo-gallery","status":"publish","title_hn":"आयुष्मान खुराना की फिल्म पर क्यों हो रही हैं बहस? रिलीज से पहले जानें क्या है आर्टिकल 15","category":{"title":"Bollywood","title_hn":"बॉलीवुड","slug":"bollywood"}}
आयुष्मान खुराना की फिल्म पर क्यों हो रही हैं बहस? रिलीज से पहले जानें क्या है आर्टिकल 15
बीबीसी हिंदी
Published by: anand anand
Updated Mon, 10 Jun 2019 10:27 PM IST
विज्ञापन
Article 15
- फोटो : social media
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
"धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म स्थान या इनमें से किसी भी आधार पर राज्य अपने किसी भी नागरिक से कोई भेदभाव नहीं करेगा। ये मैं नहीं कह रहा, भारत के संविधान में लिखा है।" अनुभव सिन्हा निर्देशित और आयुष्मान खुराना अभिनीत फ़िल्म आर्टिकल 15 का महज़ एक डायलॉग समझने की भूल मत कीजिएगा। ये भारतीय संविधान के आर्टिकल (अनुच्छेद) 15 की पहली लाइन है। आर्टिकल 15 यानी समानता का अधिकार। यूं तो भारत का संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ था लेकिन बीते कुछ सालों में ये अलग-अलग वजहों में लगातार चर्चाओं में रहा है।
Ayushmann Khurrana
- फोटो : social media
कभी सत्ता में बैठे लोगों की ओर से संविधान संशोधन को लेकर तो कभी विपक्षी पार्टियों की ओर से संविधान को ख़तरे में बताने की वजह से। ऐसे में जब 'आर्टिकल 15' नाम से फ़िल्म आ रही है तो इसकी चर्चा सोशल मीडिया पर भी हो रही है। रिलीज़ के कुछ ही घंटों में 'आर्टिकल 15' के ट्रेलर को लाखों लोगों ने देखा।
आइए पहले आपको बताते हैं कि आख़िर आर्टिकल 15 है क्या और क्यों मौजूदा दौर में संविधान के इस आर्टिकल पर फ़िल्म के बहाने हो रही बहस को कुछ लोग ज़रूरी मान रहे हैं। 15 (1)। राज्य किसी नागरिक से केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान या इसमें से किसी के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करेगा। इसी आर्टिकल 15 के बारे में सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वक़ील अवनि बंसल कहती हैं कि संविधान समानता का अधिकार देता है।
आइए पहले आपको बताते हैं कि आख़िर आर्टिकल 15 है क्या और क्यों मौजूदा दौर में संविधान के इस आर्टिकल पर फ़िल्म के बहाने हो रही बहस को कुछ लोग ज़रूरी मान रहे हैं। 15 (1)। राज्य किसी नागरिक से केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान या इसमें से किसी के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करेगा। इसी आर्टिकल 15 के बारे में सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वक़ील अवनि बंसल कहती हैं कि संविधान समानता का अधिकार देता है।
Ayushmann Khurrana
- फोटो : social media
संविधान की रचना ही इस आधार पर की गई है कि देश के किसी नागरिक के साथ भेदभाव न हो लेकिन यह सच्चाई है कि संविधान में लिखित तथ्यों का ज़मीनी स्तर पर पालन नहीं हो पाता। अवनि मानती हैं कि भले ही क़ानून कुछ भी कहे लेकिन उसे ज़मीनी स्तर पर लागू कराने की ज़िम्मेदारी प्रशासन की है और ऐसे में यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि प्रशासन इसका सख़्ती से पालन करवाए।
ऊना में दलितों की पिटाई। देश के अलग-अलग हिस्सों में दलितों की बारात रोकने और मुसलमानों के साथ गाय को लेकर हुई मारपीट। ऐसी घटनाओं को याद करें तो आप पाएंगे कि आर्टिकल 15 को बार-बार याद रखने की ज़रूरत क्यों है?
ऊना में दलितों की पिटाई। देश के अलग-अलग हिस्सों में दलितों की बारात रोकने और मुसलमानों के साथ गाय को लेकर हुई मारपीट। ऐसी घटनाओं को याद करें तो आप पाएंगे कि आर्टिकल 15 को बार-बार याद रखने की ज़रूरत क्यों है?
विज्ञापन
विज्ञापन
Article 15
- फोटो : social media
आर्टिकल 15 के ट्रेलर के कुछ दृश्य साल 2014 में बदायूं के कटरा शहादतगंज गांव में दो चचेरी बहनों की मौत से जुड़े हुए लगते हैं। इस मामले में दो चचेरी बहनों के शव पेड़ से लटके मिले थे। पहले गैंग रेप के बाद हत्या की बात कही गई, फिर कहा गया कि दोनों बहनों ने आत्महत्या कर ली। कई बार ये भी बयान आया कि बच्चियों के पिता ने उनकी हत्या कर दी।
आर्टिकल 15 फ़िल्म के सह-लेखक गौरव सोलंकी ने बीबीसी हिंदी से कहा, ''यह फ़िल्म सिर्फ़ एक घटना पर आधारित नहीं है। हर रोज़ कुछ न कुछ ऐसा हो रहा है और ये फ़िल्म उन सभी घटनाओं को समाहित करती है।'' लेकिन इस फ़िल्म को बनाने की ज़रूरत क्यों महसूस हुई?
आर्टिकल 15 फ़िल्म के सह-लेखक गौरव सोलंकी ने बीबीसी हिंदी से कहा, ''यह फ़िल्म सिर्फ़ एक घटना पर आधारित नहीं है। हर रोज़ कुछ न कुछ ऐसा हो रहा है और ये फ़िल्म उन सभी घटनाओं को समाहित करती है।'' लेकिन इस फ़िल्म को बनाने की ज़रूरत क्यों महसूस हुई?
विज्ञापन
Article 15
- फोटो : social media
इस सवाल के जवाब में गौरव कहते हैं, ''अमूमन शहरों में रहने वाले एक बड़े वर्ग को लगता है कि जात-पात का भेदभाव अब रह नहीं गया है, ये सब गुज़रे जमाने की बात हो गई लेकिन ऐसा नहीं है। देश के बहुत से हिस्सों में अब भी इस तरह का भेदभाव कायम है।'' ट्रेलर में आयुष्मान खुराना भेदभाव ख़त्म करने की बात करते हुए नज़र आते हैं। ये फ़िल्म 20 जून को रिलीज़ होगी लेकिन कुछ लोगों ने ट्रेलर पर आपत्ति जताना शुरू कर दिया है। वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल का मानना है कि इस तरह की फ़िल्मों से कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा।