{"_id":"5cfe8bc2bdec22074f08ee9e","slug":"know-about-journey-of-girish-karnad-in-indian-cinema","type":"photo-gallery","status":"publish","title_hn":"कमर्शियल से लेकर सामाजिक मुद्दों पर बनीं फिल्मों तक, ऐसा था गिरीश कर्नाड का सिनेमाई सफर","category":{"title":"Bollywood","title_hn":"बॉलीवुड","slug":"bollywood"}}
कमर्शियल से लेकर सामाजिक मुद्दों पर बनीं फिल्मों तक, ऐसा था गिरीश कर्नाड का सिनेमाई सफर
बीबीसी हिंदी
Published by: anand anand
Updated Mon, 10 Jun 2019 10:27 PM IST
विज्ञापन
Girish Karnad
- फोटो : Social Media
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
गिरीश कर्नाड को आप रंग मंच के एक मझे हुए लेखक के तौर पर याद रख सकते हैं, जिसने 26 साल की उम्र में 1964 में तुग़लक़ जैसे एतिहासिक किरदार पर नाटक लिखा। 1986 की बात है जब इसका मंचन हो रहा था और दो ही साल पहले इंदिरा गांधी के बॉडीगार्डों ने उनकी हत्या की थी। नाटक में संवाद आया कि इस क़िले को कोई भेद नहीं सकता, जिसके जवाब में दूसरा किरदार कहता है कि अक्सर क़िले अंदर से ही भरभराकर टूटते हैं।
girish karnad
- फोटो : social media
आज की पीढ़ी उन्हें एक था टाइगर और टाइगर ज़िंदा है में डॉक्टर शिनॉय के किरदार से शायद रखती होगी, लेकिन उनके काम कहीं व्यापक हैं। फ़्लैशबैक में जाएँ तो याद आता है 1975 में आई फ़िल्म निशांत में गाँव का वो स्कूलमास्टर (गिरीश कर्नाड) जिसकी पत्नी (शबाना आज़मी) को ज़मींदार का जवान बेटा (नसीरुद्दीन शाह) अग़वा कर लेता है, जिसकी शादी (स्मिता पाटिल) से हो चुकी है।
अपने सीमित से उस रोल में गिरीश कर्नाड कई पड़ावों से गुज़रते हैं- पत्नी से अलग हुए पति का दर्द, ज़मीदार के ख़िलाफ़ और गाँव में अकेला और असहाय पड़ा स्कूल मास्टर। और जब गाँववाले आख़िरकर ज़मींदार के ख़िलाफ़ विद्रोह कर देते हैं तो हिंसा के उस उन्माद में भीड़ उस औरत (शबाना आज़मी) को ज़िंदा नहीं छोड़ती जिसे अग़वा किया गया था और न ही उस औरत (स्मिता पाटिल) को ज़िंदा छोड़ती है जिसका पति अपहरण के लिए ज़िम्मेदार है।
अपने सीमित से उस रोल में गिरीश कर्नाड कई पड़ावों से गुज़रते हैं- पत्नी से अलग हुए पति का दर्द, ज़मीदार के ख़िलाफ़ और गाँव में अकेला और असहाय पड़ा स्कूल मास्टर। और जब गाँववाले आख़िरकर ज़मींदार के ख़िलाफ़ विद्रोह कर देते हैं तो हिंसा के उस उन्माद में भीड़ उस औरत (शबाना आज़मी) को ज़िंदा नहीं छोड़ती जिसे अग़वा किया गया था और न ही उस औरत (स्मिता पाटिल) को ज़िंदा छोड़ती है जिसका पति अपहरण के लिए ज़िम्मेदार है।
girish karnad
- फोटो : social media
अंत में रहा जाता है तो बस स्कूल मास्टर। मॉब लिंचिंग और उन्मादी भीड़ का रूप बरसों पहले इस फ़िल्म में देखने को मिला था। फ़िल्म में सब किरदारों के नाम हैं लेकिन स्कूल मास्टर तो फ़िल्म में अनाम ही रह जाता। 1976 में आई मंथन जहाँ किसानों के कॉपरेटिव मूवमेंट की कहानी थी जिसमें गिरीश कर्नाड गाँव में आए आदर्शवादी डॉक्टर बनते हैं (वर्गिस कूरियन का रोल), वहीं ये दो लोगों के अनकहे रिश्ते की भी कहानी है।
मुश्किल हालात में गाँव में आया एक डॉक्टर जो गाँव वालों को दूध का सही दाम दिलाना चाहता है और उस पर भरोसा करने वाली एक जुझारू ग्रामीण महिला बिंदू (स्मिता पाटिल) जिसे उसका पति छोड़कर जा चुका है। दोनों मिलकर कॉपरेटिव मूवमेंट की नींव रखते हैं लेकिन दोनों के बीच एक अनकहा प्रेम और सम्मान का रिश्ता भी बन जाता है। दोनों एक अजीब से मोड़ कर अलग होते हैं लेकिन गाँव में स्मिता पाटिल डॉक्टर के आदर्शों को आगे बढ़ाते हैं। सामंतवाद, जातिवाद, पुरुषवाद।। अपने किरदार के ज़रिए गिरीश कर्नाड सब पर वार करते हैं।
मुश्किल हालात में गाँव में आया एक डॉक्टर जो गाँव वालों को दूध का सही दाम दिलाना चाहता है और उस पर भरोसा करने वाली एक जुझारू ग्रामीण महिला बिंदू (स्मिता पाटिल) जिसे उसका पति छोड़कर जा चुका है। दोनों मिलकर कॉपरेटिव मूवमेंट की नींव रखते हैं लेकिन दोनों के बीच एक अनकहा प्रेम और सम्मान का रिश्ता भी बन जाता है। दोनों एक अजीब से मोड़ कर अलग होते हैं लेकिन गाँव में स्मिता पाटिल डॉक्टर के आदर्शों को आगे बढ़ाते हैं। सामंतवाद, जातिवाद, पुरुषवाद।। अपने किरदार के ज़रिए गिरीश कर्नाड सब पर वार करते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
girish karnad
- फोटो : social media
1982 में आई मराठी फ़िल्म उम्बरता शायद उन चंद फ़िल्मों में से थी जिसमें लेस्बियन रिश्तों पर अप्रत्यक्ष रूप से बात की गई है। एक औरत जो घर की चारदीवारी से निकल कर कुछ करना चाहती है। लेकिन उसका वकील पति गिरीश करनाड ऐसा नहीं होने देना चाहता। गिरीश कर्नाड ने अपने फ़िल्मी करियर में कभी किसी रोल को करने से गुरेज़ नहीं किया भले वो नेगेटिव क्यों न हो।
उम्बरता फ़िल्म में गिरीश कर्नाड उन सब पुरुषों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो आज भी रूढ़िवादी सोच में फँसे हुए हैं। वहीं श्याम बेनेगल की फ़िल्म भूमिका उन्होंने सत्यदेव दुबे के साथ मिलकर लिखी। औरत के मन को टटोलती ये भी एक बेहतरीन फ़िल्म थी जिसमें एक अभिनेत्री (स्मिता पाटिल) है जो किसी परंपरा को नहीं मानती, समाज के नियमों को नहीं मानती। वो ख़ुद को तलाश रही है।
उम्बरता फ़िल्म में गिरीश कर्नाड उन सब पुरुषों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो आज भी रूढ़िवादी सोच में फँसे हुए हैं। वहीं श्याम बेनेगल की फ़िल्म भूमिका उन्होंने सत्यदेव दुबे के साथ मिलकर लिखी। औरत के मन को टटोलती ये भी एक बेहतरीन फ़िल्म थी जिसमें एक अभिनेत्री (स्मिता पाटिल) है जो किसी परंपरा को नहीं मानती, समाज के नियमों को नहीं मानती। वो ख़ुद को तलाश रही है।
विज्ञापन
girish karnad
- फोटो : social media
गिरीश कर्नाड की कलम इस विधा में माहिर थी। भूमिका के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ स्क्रीनप्ले का नेशनल अवॉर्ड भी मिला। और फ़िल्मों से बाहर आवाज़ उठाने की ज़रूरत जब पड़ी तो वो कभी पीछे नहीं हटे। इमर्जेंसी के दौरान झुकने के बजाय एफ़टीईआईआई का अक्ष्यक्ष पद छोड़ना उन्होंने बेहतर समझा। फ़िल्म इक़बाल में वो ऐसे क्रिकेट कोच बने थे जो एक मूक बधिर बच्चे के क्रिकेटिंग हुनर को तो पहचानते हैं लेकिन पैसे और ईष्या के आगे उसे कुछ दिखाई नहीं देता। हिंदी में उत्सव, गोधुली जैसी फ़िल्मों का उन्होंने निर्देशन भी किया। गोधुली के लिए उन्हें और बीवी कारंथ को सवश्रेष्ठ स्क्रीनप्ले का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार भी मिला जिसका निर्देशन भी दोनों ने किया था।