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दुष्कर्म में क्या होती सहमति और जबरदस्ती? इन बारीकियों को बताती है अक्षय खन्ना की फिल्म 'सेक्शन 375'

Fri, 20 Sep 2019 11:06 PM IST
anand anand एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला Published by: anand anand Updated Fri, 20 Sep 2019 11:06 PM IST
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know about Section 375 which provision of sexual harassment
Section 375 - फोटो : social media
'कानून से कभी प्यार मत करो क्योंकि कानून वो जलनखोर रखैल है जो हमेशा हताश करती है।' 'सेक्शन 375' फिल्म में जब बचाव पक्ष का वकील तरुण सलूजा (अक्षय खन्ना) ये कहता है तो इसके दो अर्थ समझ में आते हैं। पहला- कानून की समझ समाज की समझ के साथ बढ़ती है। दूसरा- रखैल बदल दी जाती है इसलिए उससे प्यार मत करो। लेकिन अगर लड़ाई कानून बनाम इंसाफ की हो जाए, तब आप किस तरफ होंगे ? उस कानून की तरफ जो ये कहता है कि एक लड़की की इच्छा और सहमति सबसे ज्यादा जरूरी है, एक बार के लिए नहीं बल्कि हर बार के लिए जरूरी है।



क्या आप उस न्याय की तरफ होंगे, जहां सिर्फ सच मायने रखता है। इस सवाल का कई लोग शायद ये जवाब दें कि वो ऐसे फैसले का समर्थन करेंगे, जहां कानून की मदद से न्याय मिला हो। मगर हकीकत तो ये है कि फैसले के रास्ते में सिस्टम की ऐसी धूल भरी फाइलें पड़ी हैं, जिन्हें पार करने में ही सालों-साल लग जाते हैं। फिल्म सेक्शन 375 भी ऐसी ही धूल पर सिनेमाई झाड़ू मारने की कोशिश करती दिखती है। औसतन हर 14वें मिनट में होते एक दुष्कर्म वाले देश में ये धारा 375 बलात्कार की परिभाषा बताती है। लेकिन सजा जानने के लिए कानून का पन्ना पलटकर 376 तक आना पड़ता है।

यहां तक पहुंचने की लड़ाई लड़ने वाली पीड़िताओं को झेलने होते हैं भोगे हुए सच का दर्द और उसे साबित करने की लड़ाई। वो भी इस दौर में जहां आए दिन ऐसी पीड़िताओं को कुचलने के लिए सामने से तेज रफ्तार ट्रक दौड़े चले आ रहे होते हैं। सेक्शन 375 फिल्म के केंद्र में एक सवाल रहता है- कानून बड़ा या न्याय? इस सवाल का साथ देती है- बलात्कार के दृश्य की ओर संकेत करती हुई कहानी।
फिल्म में डायरेक्टर का किरदार अदा कर रहे रोहित खुराना (राहुल भट्ट) पर अपनी कॉस्ट्यूम डिजाइनर अंजली दांगले ( मीरा चोपड़ा) का बलात्कार करने का आरोप है। सेशन कोर्ट फैसला सुनाता है- दोषी करार।

केस हाई कोर्ट पहुंचता है। बचाव पक्ष के वकील से हीरल गांधी (ऋचा चड्ढा) जिरह करने आती हैं,

'एक लाख औरतों में से करीब दो औरतों को अपनी जिंदगी में कभी दुष्कर्म का सामना करना पड़ सकता है।'

'इंडिया में 75 फीसदी मामलों में दुष्कर्म के अभियुक्तों को सजा होती ही नहीं है। वो बस आजाद होकर निकल जाते हैं।'

'जज साहेब, क्या दुष्कर्म का अभियुक्त रहा कोई भी मर्द कभी आजाद होकर निकल सकता है?'

 
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Section 375 - फोटो : social media
फिल्म में ऐसी दलीलों में ब्रिटेन से तुलना और दूसरे पहलुओं के मद्देनजर कहानी में दुष्कर्म के आंकड़े कम जान पड़ते हैं जबकि 'मासूम दर्शकों' को ये पूरे जोर-शोर से बताने की जरूरत थी कि विकसित देशों में रिपोर्टिंग की दर भारत जैसे तीसरी दुनिया और रूढ़िवादी देशों से कहीं ज्यादा
। वहां की महिलाओं में अपराधबोध की भावना हमारे देश की औरतों से कम है। इस देश में मर्यादा की नींव ही औरत के घूंघट की लंबाई से मापी जाती है। जहां स्कूल-ट्यूशन जाती लड़कियां छेड़छाड़ होने पर घर में शिकायत की जगह रास्ता या टीचर बदल लेना ज्यादा बेहतर समझती हैं। उस देश में नारी रक्षा के नाम पर ब्रिटेन जैसे देश से तुलना करना कानून को टोपी पहनाने से ज्यादा कुछ नहीं समझा जाएगा। फिल्म में अभियुक्त का डिफेंस करते हुए अक्षय खन्ना दुष्कर्म की दर्ज की गई शिकायतों में 25 फीसदी कन्विक्शन रेट का मतलब 75 फीसदी झूठे दावों से जोड़ते दिखते हैं।
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Section 375 - फोटो : social media
फिल्म में ऐसी दलीलों में ब्रिटेन से तुलना और दूसरे पहलुओं के मद्देनजर कहानी में दुष्कर्म के आंकड़े कम जान पड़ते हैं जबकि 'मासूम दर्शकों' को ये पूरे जोर-शोर से बताने की जरूरत थी कि विकसित देशों में रिपोर्टिंग की दर भारत जैसे तीसरी दुनिया और रूढ़िवादी देशों से कहीं ज्यादा है। वहां की महिलाओं में अपराधबोध की भावना हमारे देश की औरतों से कम है।

इस देश में मर्यादा की नींव ही औरत के घूंघट की लंबाई से मापी जाती है। जहां स्कूल-ट्यूशन जाती लड़कियां छेड़छाड़ होने पर घर में शिकायत की जगह रास्ता या टीचर बदल लेना ज्यादा बेहतर समझती हैं। उस देश में नारी रक्षा के नाम पर ब्रिटेन जैसे देश से तुलना करना कानून को टोपी पहनाने से ज्यादा कुछ नहीं समझा जाएगा। फिल्म में अभियुक्त का डिफेंस करते हुए अक्षय खन्ना दुष्कर्म की दर्ज की गई शिकायतों में 25 फीसदी कन्विक्शन रेट का मतलब 75 फीसदी झूठे दावों से जोड़ते दिखते हैं।

फिल्म विक्टिम के बचाव में प्रॉसिक्युटर को बेतुकी और अधूरी लाइनें देकर ये बताने से कतराती है कि भारत में कम कनविक्शन रेट के कितने सारे कारण हैं। इसी की वजह से कई केस कोर्ट पहुंचने से पहले दम तोड़ देते हैं। ऐसे केसों को फर्जी आरोपों की श्रेणी में डालने से पहले हमें उन्नाव दुष्कर्म पीड़िता को याद करना पड़ेगा। हमें याद करना पड़ेगा कि अलवर में कैसे सामूहिक बलात्कार के बाद वीडियो वायरल करने की धमकी दी गई थी।

कन्विक्शन रेट से पहले हमें ये पूछना होगा कि मानसिक उत्पीड़न और छेड़छाड़ झेलने वाली दिल्ली की एक लड़की को पुलिस की लापरवाही से फांसी क्यों लगानी पड़ी थी। एक कोर्ट रूम ड्रामा पेश कर रही फिल्म अगर दोनों पक्षों में से एक के तर्क में कंजूसी करती हुई दिखती है तो कहानी किस तरफ टिल्टेड है, इस पर राय बनाना बहुत मुश्किल नहीं होता है। मगर फिल्म दबे कदमों से ही सही, सिस्टम में चले आ रहे कुछ बेजा हरकतों पर हमारा ध्यान ले जाती है। इसमें सबसे पहले आता है किसी भी दुष्कर्म पीड़िता के साथ की गई पुलिस का व्यवहार और मेडिकल चेकअप। पीड़िता के साथ दिखाई जाने वाली विशेष संवेदनशीलता की जरूरत पर बार-बार बात की गई है।
 
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Section 375 - फोटो : social media
दुष्कर्म के चंद घंटों बाद ही पीड़िता से ये कहना जाहिर करता है कि हमारा प्रशासन अब भी पीड़िता के ट्रॉमा को पूरी तरह समझ नहीं पाया है। चंद घंटे पहले बलात्कार झेल चुकी औरत से सारी घटना 'टू द पॉइंट' बतलाने की उम्मीद रखना या न बतला पाने पर झूठा समझ लेना समाज में औरतों को लेकर आम राय का पर्दाफाश करता है। पुलित्जर प्राइज से सम्मानित लेख पर आधारित नेटफ्लिक्स की सीरीज 'अनबिलिवेबल' में मेरी एडलर की कहानी इसी नजरिए को बड़ी खूबसूरती और दर्दनाक तरीके से दिखाती है। कहानी के छिपे ट्विस्ट एंड टर्न्स को ज्यादा बताए बगैर अगर स्क्रिप्ट की बात की जाए तो मनीष गुप्ता की स्क्रिप्ट बहुत हद तक बांधे रखती है। ऐसे तो प्रॉसिक्युटर को ढीला और कन्फ्यूज्ड दिखाना निराशाजनक और छला हुआ लगता है लेकिन डिफेंस वकील की इन्वेस्टिगेशन का तरीका बेहतर लगता है।
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Section 375 - फोटो : social media
निदेशक अजय बहल बलात्कारी साबित हो जाने तक अभियुक्त के लिए कम्प्लीट जूडिशल प्रोसेस से बिना अपमानित हुए गुजरने के हक और सोशल मीडिया के हाफ-इंफॉर्मड ट्रायल को सफलतापूर्वक सामने लाने में सफल रहे हैं। कम सुनने और ज्यादा राय बनाने के दौर में फिल्म में उठाए छोटे-छोटे सवाल हमें सोचने पर मजबूर करते हैं कि सिक्के के दोनों पहलू को बिना सुने फैसले पर पहुंच जाना कितना घातक हो सकता है।

सेक्शन 375, जो ये कहता है कि किसी भी महिला से किया गया संभोग-- उसकी इच्छा और मर्जी के विरुद्ध/जबरन ली गई मर्जी/ धोखे से ली गई मर्जी/नशे की हालत/झूठा नैरेटिव बताकर ली गई मर्जी/दिमागी रूप से असमर्थ होना-- बलात्कार के अंदर आता है। जैसे ही कहानी प्रत्यक्ष रूप से सही दिखने वाले सबूत और साथ ही साथ फैक्ट्स के छेड़छाड़ पर आती है। कहानी की दूसरी परत अधखुले आकार में ही सही लेकिन बलात्कार जैसे गंभीर क्राइम में पुलिस के हाथों हुए अस्वीकार्य और संगीन गलतियों की लड़ी हमारे सामने लाकर बिछा देती है। कोर्ट की कार्यवाही के दौरान जज का ' ब्रोकेन चेन ऑफ कस्टडी.... पर दंग होकर त्योरियां चढ़ा लेना हमें ये बताने के लिए काफी होता है कि पुलिस प्रशासन की घोर लापरवाही और अफसरों के अंदर बैठी पितृसत्ता किस तरह से किसी भी केस को पलट सकती है। 'त्रिया चरित्र' से नवाजी जाने वाली औरत जात पर भरोसा न करना हमारे संस्कारों में है।

पुलिसकर्मियों का ढीला रवैया न सिर्फ एक दोषी को निर्दोष बना सकता है बल्कि एक मासूम के हाथों में हथकड़ियां भी डाल सकता है। दूसरे घंटे में थोड़ा चौंकाते हुए फिल्म सेक्शन 375 से 376 पर घिसक जाती है। ये हैरान इसलिए भी करता है क्योंकि सिक्के के दूसरे पहलू को सुनने की अपील लिए हुए ये फिल्म अपनी राय जस्टिफाई करने के लिए अंत में ओवर सिम्प्लीफाई होती दिखती है। 'हेन्स प्रूव्ड' की जल्दी में कहानी से तर्क कई जगहों पर गायब हुआ, जिससे सच के करीब दिखने वाली कहानी पर भरोसा कम होता है। हालांकि अपने मकसद में लेखक कुछ जगहों पर काफी हद तक सफल भी होते हैं। 'एक ही लाठी से सबको मारने' का विमर्श, मीडिया और पब्लिक ट्रायल के दौर में अभियुक्त के हिस्से में आई हुई जलालत और उसके गुनाह की गम्भीरता के बीच में आ चुके असंतुलन की तरफ लेखक सही इशारा भी करते हैं। लेकिन वर्कप्लेस में पावर एब्यूज जैसे भयानक और महामारी की तरह फैले हुए यौन उत्पीड़न पर साफ तौर से फिसलते हुए दिखते हैं।
 
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