{"_id":"5d1b27e68ebc3e3ca568c165","slug":"known-unknown-facts-about-mohammad-aziz-on-his-birthday","type":"photo-gallery","status":"publish","title_hn":"सारे शिकवे गिले भुलाकर जिए मोहम्मद अजीज, पढ़िए उनकी 10 अनसुनी कहानियां","category":{"title":"Bollywood","title_hn":"बॉलीवुड","slug":"bollywood"}}
सारे शिकवे गिले भुलाकर जिए मोहम्मद अजीज, पढ़िए उनकी 10 अनसुनी कहानियां
मुंबई डेस्क, अमर उजाला
Published by: anand anand
Updated Tue, 02 Jul 2019 03:59 PM IST
विज्ञापन
mohammad aziz
- फोटो : youtube
संगीत की दुनिया में मोहम्मद रफी के उत्तराधिकारी माने गए गायक मोहम्मद अजीज हिंदी सिनेमा के उन गायकों में से है जिन्होंने अपनी आवाज से तमाम सितारों के करियर को ऊंचाइयां दीं। एकलव्य की तरह रफी से गायिकी के गुर सीखने वाले मोहम्मद अजीज ने आखिरी सांस भी ठीक उसी तरह ली जिस तरह मोहम्मद रफी दुनिया छोड़ गए थे। शोहरत का हर आसमान नापने वाले मोहम्मद अजीज उर्फ मुन्ना का आज जन्मदिन है। उनका आखिरी इंटरव्यू भी अमर उजाला ने ही किया था। उसे सुनने से पहले आइए आपको बताते हैं उनसे जुड़ी 10 अनसुनी कहानियां।
Trending Videos
Mohammad Aziz
- फोटो : social media
मरफी के मुन्ना से मिला नाम
मोहम्मद अजीज का जन्म 2 जुलाई 1954 को कोलकाता, पश्चिम बंगाल के गुमा में हुआ। पूरा नाम रखा गया सईद मोहम्मद अजीत उल नबी। वह अक्सर रेडियो पर गाने सुना करते और जब भी मोहम्मद रफी का कोई गाना बजता, ये वैसे ही तल्लीन हो जाते जैसे मरफी रेडियो के विज्ञापन का मुन्ना दिखता था। इसी के चलते मोहम्मद अजीज को बचपन मे सब लोग प्यार से मुन्ना कहकर बुलाने लगे। तमाम गानों के क्रेडिट में उनका नाम मोहम्मद अजीज की बजाय मुन्ना अजीज ही लिखा मिलता है।
काम आया गुरु का आशीर्वाद
मोहम्मद अजीज की रोजी रोटी मोहम्मद रफी के गानों से करीब दो दशकों तक चलती रही। वह कोलकाता के रेस्टोरेंट ग़ालिब में रफी के गाने सुनाया करते और दर्शक उनको वाहवाही के अलावा कभी कभी अच्छी बख्शीश भी दे जाया करते थे। इस रेस्तरां में उस दौर के तमाम बड़े फिल्म निर्माता आया करते थे। बंगला सिनेमा में मोहम्मद अजीज की एंट्री भी इसी रेस्तरां में मिले फिल्म निर्माताओं के चलते ही हुई।
मोहम्मद अजीज का जन्म 2 जुलाई 1954 को कोलकाता, पश्चिम बंगाल के गुमा में हुआ। पूरा नाम रखा गया सईद मोहम्मद अजीत उल नबी। वह अक्सर रेडियो पर गाने सुना करते और जब भी मोहम्मद रफी का कोई गाना बजता, ये वैसे ही तल्लीन हो जाते जैसे मरफी रेडियो के विज्ञापन का मुन्ना दिखता था। इसी के चलते मोहम्मद अजीज को बचपन मे सब लोग प्यार से मुन्ना कहकर बुलाने लगे। तमाम गानों के क्रेडिट में उनका नाम मोहम्मद अजीज की बजाय मुन्ना अजीज ही लिखा मिलता है।
काम आया गुरु का आशीर्वाद
मोहम्मद अजीज की रोजी रोटी मोहम्मद रफी के गानों से करीब दो दशकों तक चलती रही। वह कोलकाता के रेस्टोरेंट ग़ालिब में रफी के गाने सुनाया करते और दर्शक उनको वाहवाही के अलावा कभी कभी अच्छी बख्शीश भी दे जाया करते थे। इस रेस्तरां में उस दौर के तमाम बड़े फिल्म निर्माता आया करते थे। बंगला सिनेमा में मोहम्मद अजीज की एंट्री भी इसी रेस्तरां में मिले फिल्म निर्माताओं के चलते ही हुई।
विज्ञापन
विज्ञापन
Mohammad Aziz
- फोटो : social media
जब जली गायिकी की ज्योति
बचपन से ही संगीत में खास रुचि रखने वाले मोहम्मद अजीज ने कोलकाता में ही संगीत गायन की शिक्षा ली। मोहम्मद अजीज बचपन में सामाजिक और पारिवारिक समारोहों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते और अपनी गायन कला का प्रदर्शन करते। रेस्टोरेंट में गाना गाने वाले मोहम्मद अजीज को बतौर गायक पहला मौका मिला 1984 में बनी बंगाली फिल्म ज्योति से। इस फिल्म के निर्माता की मुलाकात मोहम्मद अजीज से‘रेस्टोरेंट गालिब’ में हुई थी। इस फिल्म में गाने के बाद मोहम्मद अजीज संगीत की दुनिया में नाम कमाने के लिए मुंबई चले आए।
‘मर्द तांगे वाला’ ने बदल दी तकदीर
ज्योति में गाने के बाद मोहम्मद अजीज को 1984 में ही हिंदी फिल्म ‘अम्बर’ में गाने का मौका मिला। इसी दौरान मोहम्मद अजीज की मुलाकात संगीतकार अनु मलिक से हुई, अनु भी उस समय हिंदी सिनेमा में संघर्ष कर रहे थे। कुछ दिनों बाद 1985 में अनु मलिक ने मोहम्मद अजीज के सामने अमिताभ बच्चन की फिल्म मर्द में मर्द तांगेवाला गाना गाने का प्रस्ताव रखा। मोहम्मद अजीज ने इसे स्वीकार कर लिया और इस गाने के बाद से उनका नाम पूरी हिंदी सिनेमा में फैल गया। इसके बाद मोहम्मद अजीज ने गोविंदा, ऋषि कपूर, सनी देओल, और अनिल कपूर जैसे कई अभिनेताओं को अपनी आवाज दी और लता मंगेशकर, आशा भोंसले और अनुराधा पौडवाल जैसी कई बेहतरीन गायिकाओं के साथ युगल गीत भी गाए।
बचपन से ही संगीत में खास रुचि रखने वाले मोहम्मद अजीज ने कोलकाता में ही संगीत गायन की शिक्षा ली। मोहम्मद अजीज बचपन में सामाजिक और पारिवारिक समारोहों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते और अपनी गायन कला का प्रदर्शन करते। रेस्टोरेंट में गाना गाने वाले मोहम्मद अजीज को बतौर गायक पहला मौका मिला 1984 में बनी बंगाली फिल्म ज्योति से। इस फिल्म के निर्माता की मुलाकात मोहम्मद अजीज से‘रेस्टोरेंट गालिब’ में हुई थी। इस फिल्म में गाने के बाद मोहम्मद अजीज संगीत की दुनिया में नाम कमाने के लिए मुंबई चले आए।
‘मर्द तांगे वाला’ ने बदल दी तकदीर
ज्योति में गाने के बाद मोहम्मद अजीज को 1984 में ही हिंदी फिल्म ‘अम्बर’ में गाने का मौका मिला। इसी दौरान मोहम्मद अजीज की मुलाकात संगीतकार अनु मलिक से हुई, अनु भी उस समय हिंदी सिनेमा में संघर्ष कर रहे थे। कुछ दिनों बाद 1985 में अनु मलिक ने मोहम्मद अजीज के सामने अमिताभ बच्चन की फिल्म मर्द में मर्द तांगेवाला गाना गाने का प्रस्ताव रखा। मोहम्मद अजीज ने इसे स्वीकार कर लिया और इस गाने के बाद से उनका नाम पूरी हिंदी सिनेमा में फैल गया। इसके बाद मोहम्मद अजीज ने गोविंदा, ऋषि कपूर, सनी देओल, और अनिल कपूर जैसे कई अभिनेताओं को अपनी आवाज दी और लता मंगेशकर, आशा भोंसले और अनुराधा पौडवाल जैसी कई बेहतरीन गायिकाओं के साथ युगल गीत भी गाए।
Mohammad Aziz
- फोटो : social media
लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के अजीज
मोहम्मद अजीज जब हिंदी सिनेमा में आए तो उस समय संगीतकार लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की जोड़ी शिखर पर थी। फिल्म मर्द के बाद लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की नजर मोहम्मद अजीज पर गई और उन्होने 1986 में मोहम्मद अजीज को फिल्म 'आग और शोला' में अपने संगीत पर गाने का मौका दिया। उसके बाद मोहम्मद अजीज लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की पहली पसंद बन गए और उन्होंने लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की जोड़ी के साथ 30 से ज्यादा फिल्मों में काम किया। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के साथ की गई फिल्मों में खुदा गवाह, वतन के रखवाले, राम लखन, लव 86, बीवी हो तो ऐसी और चालबाज जैसी फिल्में प्रमुख थी। जब लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की जोड़ी का ढलान आया तो मोहम्मद अजीज का कैरियर भी उतरने लगा और तबसंगीतकार उदित नारायण और कुमार सानू जैसे नए गायकों के साथ काम करना ज्यादा पसंद करने लगे।
क्षेत्रीय संगीत के भी महारथी
मोहम्मद अजीज उन गायकों में से है जिन्होंने हिंदी के साथ साथ क्षेत्रीय संगीत में भी काम किया और उसको बढ़ावा दिया। इन्होने हिंदी के साथ साथ बंगाली और उड़िया फिल्मों में भी काम किया। कोलकाता में परवरिश होने के कारण मोहम्मद अजीज की बंगाली और उड़िया भाषा पर अच्छी पकड़ थी, इसी कारण ये बंगाली और उड़िया फिल्म इंडस्ट्री में भी कामयाब हुए। 1985 के बाद इन्होंने बंगाली और उड़िया भाषा में कई भजन और फल्मी संगीत गाए।
मोहम्मद अजीज जब हिंदी सिनेमा में आए तो उस समय संगीतकार लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की जोड़ी शिखर पर थी। फिल्म मर्द के बाद लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की नजर मोहम्मद अजीज पर गई और उन्होने 1986 में मोहम्मद अजीज को फिल्म 'आग और शोला' में अपने संगीत पर गाने का मौका दिया। उसके बाद मोहम्मद अजीज लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की पहली पसंद बन गए और उन्होंने लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की जोड़ी के साथ 30 से ज्यादा फिल्मों में काम किया। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के साथ की गई फिल्मों में खुदा गवाह, वतन के रखवाले, राम लखन, लव 86, बीवी हो तो ऐसी और चालबाज जैसी फिल्में प्रमुख थी। जब लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की जोड़ी का ढलान आया तो मोहम्मद अजीज का कैरियर भी उतरने लगा और तबसंगीतकार उदित नारायण और कुमार सानू जैसे नए गायकों के साथ काम करना ज्यादा पसंद करने लगे।
क्षेत्रीय संगीत के भी महारथी
मोहम्मद अजीज उन गायकों में से है जिन्होंने हिंदी के साथ साथ क्षेत्रीय संगीत में भी काम किया और उसको बढ़ावा दिया। इन्होने हिंदी के साथ साथ बंगाली और उड़िया फिल्मों में भी काम किया। कोलकाता में परवरिश होने के कारण मोहम्मद अजीज की बंगाली और उड़िया भाषा पर अच्छी पकड़ थी, इसी कारण ये बंगाली और उड़िया फिल्म इंडस्ट्री में भी कामयाब हुए। 1985 के बाद इन्होंने बंगाली और उड़िया भाषा में कई भजन और फल्मी संगीत गाए।
विज्ञापन
Mohammad Aziz
- फोटो : social media
सातवें सुर में गाने वाले
मोहम्मद अजीज का नाम उन चुनिंदा गायको में शुमार है जो संगीत के ‘सातवें सुर’ में गा सकते थे। एस. चंद्रशेखर के निर्देशन में बनी फिल्म‘आजाद देश के गुलाम’ में लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के संगीत पर ‘सारे शिकवे गिले भुला के कहो’ गाना मोहम्मद अजीज ने संगीत के सातवें सुर में गाया। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने इनकी इस खूबी को पहचाना और बाद में इलके साथ एक से बढ़कर एक हिट फिल्मों में काम किया और इनके सातवें सुर में गायिकी का बखूबी इस्तेमाल किया।
मोहम्मद रफी के उत्तराधिकारी
भारतीय संगीत की महान हस्ती मोहम्मद रफी जी को हिंदी सिनेमा के न जाने कितने गायक अपना गुरु मानकर उनकी ही तरह गाने का प्रयास किया लेकिन मोहम्मद अजीज उन सब में अग्रणी रहे। एक बार अजीज ने कहा, “मुझे लगता है कि अगर कोई मोहम्मद रफी का पांच प्रतिशत भी गाने के लायक हो जाता है तो उसे देश का बेस्ट सिंगर माना जा सकता है। मैंने अपनी शुरुआती संगीत शिक्षा किसी दूसरे संगीतज्ञ से ली है, लेकिन मैं रफी साहब को ही अपना गुरु मानता हूं। मैंने कई भाषाओं में और दुनिया भर में परफॉर्म किया और मैं अपनी इस सफलता का श्रेय मोहम्मद रफी को ही देता हूं।”
मोहम्मद अजीज का नाम उन चुनिंदा गायको में शुमार है जो संगीत के ‘सातवें सुर’ में गा सकते थे। एस. चंद्रशेखर के निर्देशन में बनी फिल्म‘आजाद देश के गुलाम’ में लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के संगीत पर ‘सारे शिकवे गिले भुला के कहो’ गाना मोहम्मद अजीज ने संगीत के सातवें सुर में गाया। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने इनकी इस खूबी को पहचाना और बाद में इलके साथ एक से बढ़कर एक हिट फिल्मों में काम किया और इनके सातवें सुर में गायिकी का बखूबी इस्तेमाल किया।
मोहम्मद रफी के उत्तराधिकारी
भारतीय संगीत की महान हस्ती मोहम्मद रफी जी को हिंदी सिनेमा के न जाने कितने गायक अपना गुरु मानकर उनकी ही तरह गाने का प्रयास किया लेकिन मोहम्मद अजीज उन सब में अग्रणी रहे। एक बार अजीज ने कहा, “मुझे लगता है कि अगर कोई मोहम्मद रफी का पांच प्रतिशत भी गाने के लायक हो जाता है तो उसे देश का बेस्ट सिंगर माना जा सकता है। मैंने अपनी शुरुआती संगीत शिक्षा किसी दूसरे संगीतज्ञ से ली है, लेकिन मैं रफी साहब को ही अपना गुरु मानता हूं। मैंने कई भाषाओं में और दुनिया भर में परफॉर्म किया और मैं अपनी इस सफलता का श्रेय मोहम्मद रफी को ही देता हूं।”