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भारत में साथ काम करने के लिए उस्ताद नुसरत ने चुना था इस कलाकार को
amarujala.com- Presented by: कुशमिता राणा
Updated Wed, 16 Aug 2017 05:15 PM IST
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nusrat fateh ali khan
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आज भी नुसरत फतेह अली खान की आवाज कानों में पड़ती हैं, तो बहुत से लोग मंत्रमुग्ध होकर उनकी गायकी में खो जाते हैं। उस आवाज के अनूठेपन और रूहानियत को चाहकर भी भुलाया नहीं जा सकता है। उनकी आवाज-उनका अंदाज, उनका हाथों को हिलाना, चेहरे पर संजीदगी का भाव, संगीत का उम्दा प्रयोग। शब्दों की शानदार रवानगी।।। उनकी खनक।।। सब कुछ हमें किसी दूसरी दुनिया में ले जाने पर मजबूर करता है।
nusrat fateh ali khan
नुसरत फतेह अली खान की चार बहने थीं और दो छोटे भाई थे। पिता उस्ताद फतेह अली खान साहब खुद भी मशहूर कव्वाल थे। उस्ताद पिता ने नुसरत को पहले तबला सिखाना शुरू किया लेकिन बाद में नुसरत ने गायन को ही अपना मुकाम बना लिया।
सुरों के ऐसे तार छिड़े कि क्या ब्रिटेन क्या यूरोप, क्या जापान, क्या अमरीका पूरी दुनिया में नुसरत के प्रशंसकों की बाढ़ सी आ गई। हालांकि दुनिया ने उन्हें देर से पहचाना, पर जब पहचाना तो दुनिया भर में उनके दीवानों की कमी भी नहीं रही। जिन जिन देशों में रॉक-कंसर्ट हुआ नुसरत फतेह अली खान ने अपनी कव्वाली का रंग जमाया, लोग झूम उठे-नाच उठे।
सुरों के ऐसे तार छिड़े कि क्या ब्रिटेन क्या यूरोप, क्या जापान, क्या अमरीका पूरी दुनिया में नुसरत के प्रशंसकों की बाढ़ सी आ गई। हालांकि दुनिया ने उन्हें देर से पहचाना, पर जब पहचाना तो दुनिया भर में उनके दीवानों की कमी भी नहीं रही। जिन जिन देशों में रॉक-कंसर्ट हुआ नुसरत फतेह अली खान ने अपनी कव्वाली का रंग जमाया, लोग झूम उठे-नाच उठे।
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हालांकि नुसरत ने ज्यादातर गीत ऊर्दू और पंजाबी में गाए, लेकिन उन्होंने फारसी, हिंदी और ब्रजभाषा में भी गीतों को सुर दिए। पूर्व और पश्चिम के आलौकिक फ्यूजन में भी उन्होंने अपना पंजाबीपन और सूफियाना अंदाज नहीं छोड़ा, न ही खुद से कोई छेड़-छाड़ की और फ्यूजन को एक नई परिभाषा दी।
नुसरत खुद कहते थे, “मैंने नई पीढ़ी को देखकर ही प्रयोग किए और अपनी गायकी में पश्चिमी वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल किया। जो लोग वेस्टर्न म्यूजिक को पसंद करते थे उन्हें अगर क्लासिकल सुनाया जाता तो वो पसंद नहीं करते इसलिए शास्त्रीय गायन में पश्चिमी वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल किया।”
नुसरत खुद कहते थे, “मैंने नई पीढ़ी को देखकर ही प्रयोग किए और अपनी गायकी में पश्चिमी वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल किया। जो लोग वेस्टर्न म्यूजिक को पसंद करते थे उन्हें अगर क्लासिकल सुनाया जाता तो वो पसंद नहीं करते इसलिए शास्त्रीय गायन में पश्चिमी वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल किया।”
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नुसरत के जादू ने सरहदें पार कीं। इस पार भारत में भी उनके गीत और कव्वालियां सिर चढ़ कर बोलने लगीं। 'मेरा पिया घर आया।।।', 'पिया रे-पिया रे।।।', 'सानू एक पल चैन।।।', 'तेरे बिन।।।', 'प्यार नहीं करना।।।', 'साया भी जब साथ छोड़ जाये।।।', 'सांसों की माला पे।।।' और न जाने ऐसे कितने गीत और कव्वालियां हैं, जो दुनिया भर का संगीत खुद में समेटे हुए हैं।
अपने पाकिस्तानी अल्बम्स से भारत में धूम मचाने के बाद नुसरत फतेह अली खान को जब बॉलीवुड में फिल्म का न्योता मिला तो उन्होंने शायर के मामले में अपनी पसंद साफ कर दी कि वो काम करेंगें तो सिर्फ जावेद अख्तर साहब के साथ।
अपने पाकिस्तानी अल्बम्स से भारत में धूम मचाने के बाद नुसरत फतेह अली खान को जब बॉलीवुड में फिल्म का न्योता मिला तो उन्होंने शायर के मामले में अपनी पसंद साफ कर दी कि वो काम करेंगें तो सिर्फ जावेद अख्तर साहब के साथ।
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दो मुल्कों के दो बड़े फनकारों का संगम हुआ और एलबम निकला 'संगम'। 'संगम' का सबसे हिट गीत था 'आफरीन आफरीन'। जावेद अख्तर के बोलों को नुसरत फतेह अली खान ने इस गीत को ऐसी रवानगी दी है कि गीत खत्म होने का बाद भी इसका नशा नहीं टूटता।
जिस समय नुसरत फतेह अली खान का नाम दुनिया में सिर चढ़ कर बोल रहा था उस समय उनके भतीजे राहत फतेह अली खान उनसे गायन की बारीकियां सीख रहे थे। जब भी नुसरत कहीं भी प्रोग्राम पेश करते तो राहत का काम सिर्फ अलाप देना होता था।
जिस समय नुसरत फतेह अली खान का नाम दुनिया में सिर चढ़ कर बोल रहा था उस समय उनके भतीजे राहत फतेह अली खान उनसे गायन की बारीकियां सीख रहे थे। जब भी नुसरत कहीं भी प्रोग्राम पेश करते तो राहत का काम सिर्फ अलाप देना होता था।