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कमाल अमरोही ने कैसे रचाई थी मीना कुमारी से शादी, बेहद रोमांचक है कहानी
बीबीसी हिंदी
Published by: विजय जैन
Updated Wed, 16 Jan 2019 06:30 PM IST
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kamal Amrohi
- फोटो : file photo
ये 1949 का साल था, करीब 30 साल के एक लेखक ने अशोक कुमार सहित 'बॉम्बे टॉकीज' के डायरेक्टरों को एक कहानी सुनाई। पुर्नजन्म और मोहब्बत की दास्तां पर आधारित इस कहानी को सुनाने के साथ लेखक ने खुद ही इसका निर्देशन करने की पेशकश की।
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मीना कुमारी
- फोटो : file photo
लेकिन 'महल' की कामयाबी ने पश्चिम उत्तर प्रदेश के अमरोहा से लाहौर के रास्ते मुंबई आए इस संजीदा लेखक को रातों रात सुपर स्टार का दर्जा दे दिया। 'महल' फिल्म के कुछ संवाद तो आज भी लोगों की जुबां पर मौजूद होंगे- 'मुझे जरा होश में आने दो, मैं खामोश रहना चाहता हूं...' या 'फिर स्लो पॉयजन अक्सर मीठे होते हैं और धोखे अक्सर हसीन होते हैं।।।' 'महल' ने ही मधुबाला और लता मंगेशकर को सुपर स्टार बनाया। 'आई वांट टू लिव- द स्टोरी ऑफ मधुबाला' में खतीजा अकबर ने लिखा है कि अशोक कुमार और 'बॉम्बे टॉकीज' के लोग इस फिल्म में सुरैया को लेना चाहते थे।
लेकिन ये फिल्म के निर्देशक कमाल अमरोही थे, जिन्होंने 16 साल की मधुबाला को ना केवल मौका दिया बल्कि पहली ही फिल्म में सुपर स्टार बना दिया। कमाल अमरोही किस तरह के डायरेक्टर थे इसका अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि उन्होंने 'महल' का एक गाना 'मुश्किल है बहुत मुश्किल है...' महज एक सिंगल शॉट में फिल्माया लिया था। नसरीन मुन्नी कबीर की किताब लता मंगेशकर इन हर वायस में लता मंगेशकर ने कमाल अमरोही के संगीत की समझ की काफ़ी तारीफ़ की है। कमाल अमरोही ने 'आएगा, आएगा, आएगा आनेवाला....' की धुन का इस्तेमाल फ़िल्म में सात बार करने का मन बनाया और आज भी पूरी फ़िल्म इस एक गाने से उलझी मालूम होती है।
लेकिन ये फिल्म के निर्देशक कमाल अमरोही थे, जिन्होंने 16 साल की मधुबाला को ना केवल मौका दिया बल्कि पहली ही फिल्म में सुपर स्टार बना दिया। कमाल अमरोही किस तरह के डायरेक्टर थे इसका अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि उन्होंने 'महल' का एक गाना 'मुश्किल है बहुत मुश्किल है...' महज एक सिंगल शॉट में फिल्माया लिया था। नसरीन मुन्नी कबीर की किताब लता मंगेशकर इन हर वायस में लता मंगेशकर ने कमाल अमरोही के संगीत की समझ की काफ़ी तारीफ़ की है। कमाल अमरोही ने 'आएगा, आएगा, आएगा आनेवाला....' की धुन का इस्तेमाल फ़िल्म में सात बार करने का मन बनाया और आज भी पूरी फ़िल्म इस एक गाने से उलझी मालूम होती है।
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मीना कुमारी
- फोटो : file photo
इस फिल्म की कामयाबी का असर कहीं और भी हुआ था। इसका जिक्र आउटलुक के संस्थापक संपादक विनोद मेहता ने अपनी पुस्तक 'मीना कुमारी-द क्लासिक बायोग्राफी' में किया है। विनोद मेहता ने लिखा है, "एक अंग्रेजी पत्रिका देखते हुए मीना कुमारी की नजर एक तस्वीर पर पड़ी। ये तस्वीर कमाल अमरोही की थी, 'महल' के बाद जिसे हर स्टूडियो अपने यहां काम देना चाहता था।
कहा जाने लगा था कि उन्हें लाख रुपये तक ऑफ़र किए जा रहे हैं। लेकिन मीना कुमारी को उस तस्वीर के साथ लेखक लिखा होना पसंद आया होगा।" विनोद मेहता के मुताबिक कमाल अमरोही को लेकर ऐसा आकर्षण मधुबाला में भी था, लेकिन कमाल ने खुद मधुबाला में कोई दिलचस्पी नहीं ली थी।
वहीं मीना कुमारी को उन्होंने 'अनारकली' फिल्म के लिए साइन किया। हालांकि ये फिल्म पूरी नहीं हो पाई क्योंकि प्रोड्यूसर इस फिल्म का बजट कम रखना चाहते थे, जो कमाल को पसंद नहीं आया। कमाल अमरोही के पूरे करियर के दौरान ये बात साफ़ देखने को मिली कि उन्होंने जो भी किया, तबियत से किया, पूरे इत्मीनान से किया और ख़र्चे की परवाह नहीं की।
कहा जाने लगा था कि उन्हें लाख रुपये तक ऑफ़र किए जा रहे हैं। लेकिन मीना कुमारी को उस तस्वीर के साथ लेखक लिखा होना पसंद आया होगा।" विनोद मेहता के मुताबिक कमाल अमरोही को लेकर ऐसा आकर्षण मधुबाला में भी था, लेकिन कमाल ने खुद मधुबाला में कोई दिलचस्पी नहीं ली थी।
वहीं मीना कुमारी को उन्होंने 'अनारकली' फिल्म के लिए साइन किया। हालांकि ये फिल्म पूरी नहीं हो पाई क्योंकि प्रोड्यूसर इस फिल्म का बजट कम रखना चाहते थे, जो कमाल को पसंद नहीं आया। कमाल अमरोही के पूरे करियर के दौरान ये बात साफ़ देखने को मिली कि उन्होंने जो भी किया, तबियत से किया, पूरे इत्मीनान से किया और ख़र्चे की परवाह नहीं की।
Meena kumari
- फोटो : file photo
हालांकि इस दौरान मीना कुमारी एक सड़क हादसे की चपेट में आ गईं और उन्हें पूना के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया। कमाल अमरोही जब पहली बार उन्हें अस्पताल में देखने पहुंचे तो मीना कुमारी की छोटी बहन ने उन्हें बताया कि आपा तो मौसम्बी का जूस नहीं पी रही हैं। लेकिन कमाल अमरोही के सामने मीना कुमारी ने झटके से जूस पी लिया। इसके बाद मीना कुमारी को देखने के लिए कमाल अमरोही सप्ताह के एक दिन मुंबई से पूना आने लगे।
कुछ ही दिनों में लगने लगा कि एक दिन की मुलाकात में दिल की बात नहीं हो पा रही है, तो फिर दोनों ने रोजाना एक दूसरे को खत लिखने का फ़ैसला लिया। विनोद मेहता ने इस बारे में लिखा है, "31 साल का एक आदमी काली शेरवानी में एंबैसडर कार से उतरता और खतों के लिफाफे के साथ एक प्राइवेट कमरे तक जाता था जहां 18 साल की मीना कुमारी बेड पर मौजूद हैं। दोनों एक दूसरे को लिखे खत देते हैं और थोड़ी ही देर में अमरोही कार से मुंबई के लिए रवाना हो जाते हैं।" ज़ाहिर है कि मीना कुमारी और कमाल अमरोही एक दूसरे को कुछ इस कदर देखने लगे थे जिसे आज की तारीख में मेड फॉर इच अदर कहा जाता है।
Edit
कुछ ही दिनों में लगने लगा कि एक दिन की मुलाकात में दिल की बात नहीं हो पा रही है, तो फिर दोनों ने रोजाना एक दूसरे को खत लिखने का फ़ैसला लिया। विनोद मेहता ने इस बारे में लिखा है, "31 साल का एक आदमी काली शेरवानी में एंबैसडर कार से उतरता और खतों के लिफाफे के साथ एक प्राइवेट कमरे तक जाता था जहां 18 साल की मीना कुमारी बेड पर मौजूद हैं। दोनों एक दूसरे को लिखे खत देते हैं और थोड़ी ही देर में अमरोही कार से मुंबई के लिए रवाना हो जाते हैं।" ज़ाहिर है कि मीना कुमारी और कमाल अमरोही एक दूसरे को कुछ इस कदर देखने लगे थे जिसे आज की तारीख में मेड फॉर इच अदर कहा जाता है।
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मीना कुमारी
- फोटो : file photo
मीना कुमारी के पिता नहीं चाहते थे उनकी बेटी इतनी जल्दी शादी करे और वो भी ऐसे शख्स से जो पहले ही दो शादियां कर चुका हो और तीन बच्चे का पिता हो। लेकिन मीना कुमारी और कमाल अमरोही के लिए एक दूसरे के बिना रह पाना मुश्किल होता गया और आख़िर में 14 फरवरी, 1952 को मीना कुमारी से कमाल अमरोही ने शादी कर ली। ये शादी कैसे हुई इसके बारे में विनोद मेहता ने लिखा है, "मीना कुमारी अपनी बहन के साथ वॉर्डन रोड पर स्थित एक मसाज क्लिनिक पर रोज जाती थीं, एक्सीडेंट के बाद ये उनके इलाज का हिस्सा था।
उनके पिता कार से उन्हें छोड़ने आते थे, दो घंटे के लिए। 14 फरवरी, 1952 को दोनों बहनें पिता के छोड़ने के बाद कमाल अमरोही और उनके सहायक बाकर के साथ निकाह कराने पहुंची। काजी पहले तैयार थे, उन्होंने पहले सुन्नी रवायत से और फिर शिया रवायत से निकाह करवाया।" इसके बाद मीना कुमारी अपनी बहन के साथ डॉक्टर के क्लिनिक लौटीं और फिर अपने घर। इस शादी के एक साल और कुछ महीनों के बाद अगस्त, 1953 में मीना कुमारी, कमाल अमरोही के घर पहुंचीं। अपने पिता का घर छोड़कर और एक दर्जन साड़ियों के साथ। मीना कमाल को चंदन कहती थीं और कमाल मीना को मंजू।
उनके पिता कार से उन्हें छोड़ने आते थे, दो घंटे के लिए। 14 फरवरी, 1952 को दोनों बहनें पिता के छोड़ने के बाद कमाल अमरोही और उनके सहायक बाकर के साथ निकाह कराने पहुंची। काजी पहले तैयार थे, उन्होंने पहले सुन्नी रवायत से और फिर शिया रवायत से निकाह करवाया।" इसके बाद मीना कुमारी अपनी बहन के साथ डॉक्टर के क्लिनिक लौटीं और फिर अपने घर। इस शादी के एक साल और कुछ महीनों के बाद अगस्त, 1953 में मीना कुमारी, कमाल अमरोही के घर पहुंचीं। अपने पिता का घर छोड़कर और एक दर्जन साड़ियों के साथ। मीना कमाल को चंदन कहती थीं और कमाल मीना को मंजू।
