मकरंद देशपांडे ने फिल्मों और टीवी सीरियल में कई यादगार रोल निभाए हैं। उन्हें एक बेहतरीन अभिनेता के रूप में देखा जाता है। मकरंद ने कई फिल्मों में सहायक कलाकार की भूमिका निभाई और दर्शकों के बीच अपनी एक अलग पहचान बनाई है। इसके साथ ही उन्होंने लेखक और निर्देशक की भूमिका भी अदा की है। आज उनके जन्मदिन के मौके पर हम आपको उनके जीवन से जुड़ी कुछ बातें बताने जा रहे हैं।
Birthday Special: कभी नहीं निभाया मुख्य किरदार, निर्देशन में भी रहे फ्लॉप, फिर क्यों प्रसिद्ध हैं मकरंद देशपांडे
बचपन से था लिखने का शौक
56 वर्षीय मकरंद देशपांडे का जन्म 6 मार्च 1966 को दहानू, महाराष्ट्र में हुआ था। उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई श्री बीपीएम स्कूल रत्नागिरी से की। वहीं, स्नातक नरसी मोनजी कॉलेज ऑफ कॉमर्स एंड इकोनॉमिक्स से किया है। बचपन से ही देशपांडे को लिखने का शौक था और अपने कॉलेज के दिनों से ही उन्होंने नाटक लिखना शुरू कर दिया था। देशपांडे की मां निर्मला देशपांडे की मृत्यु हो चुकी है। वहीं, उनके पिता विनायक देशपांडे भारतीय डाक में काम करते थे।
1988 से हुई करियर की शुरुआत
मकरंद देशपांडे ने 1988 में फिल्म ‘कयामत से कयामत तक’ में बाबा का किरदार निभाकर अपने करियर की शुरुआत की थी। 1989 में शो 'सर्कस' से टेलीविजन में कदम रखा और इसके बाद छोटे पर्दे पर कई शोज में नजर आए। कुछ समय बाद उन्होंने फिल्मों की ओर रुख किया, जिसमें उनके अभिनय को काफी पसंद किया गया। उन्होंने कई सारी फिल्मों में सहायक कलाकार की भूमिका अदा की, जिनमें 'सरफरोश', 'मकड़ी', 'डरना जरूरी है' जैसी फिल्में शामिल हैं।
सोनाली कुलकर्णी से टूटी थी सगाई
आपको बता दें कि मकरंद देशपांडे और सोनाली कुलकर्णी शादी करने वाले थे। दोनों ने सगाई भी कर ली थी, लेकिन उनका रिश्ता ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाया और 2006 में दोनों अलग हो गए। इसके बाद 2016 में देशपांडे ने निवेदिता पोहनकर से शादी की।
पांच फिल्मों का किया निर्देशन
अभिनय के अलावा मकरंद पांच फिल्मों का निर्देशन भी कर चुके हैं। उन्होंने ‘सोना स्पा’ और ‘शाहरुख बोला खूबसूरत है तू’ जैसी फिल्में निर्देशित की हैं। हालांकि यह फिल्में बॉक्स ऑफिस पर अपना कमाल नहीं दिखा पाईं। इन फिल्मों के फ्लॉप होने पर मकरंद ने एक इंटरव्यू में कहा था कि मैं जैसा सोचता हूं, शायद वह किसी को समझ में नहीं आया। मेरे लिए फिल्म आर्ट है, लेकिन जो पैसा लगाता है, उसके लिए यह पैसे कमाने का जरिया है और मैं बाजार के हिसाब से नहीं सोच पाता हूं।