बॉलीवुड में एक समय में भगत सिंह का चेहरा बन चुके अभिनेता मनोज कुमार इस साल अपना 83वां जन्मदिन मना रहे हैं। मनोज कुमार का जन्म 24 जुलाई 1937 को हुआ था। मनोज कुमार का असली नाम हरिकृष्ण गोस्वामी है। उनका जन्म 1937 को ऐबटाबाद में हुआ जो अब पाकिस्तान में है। उन्होंने बॉलीवुड को एक से बढ़कर एक फिल्में दी हैं। उन्होंने एक समय में देशभक्ति वाली इतनी फिल्में कीं और वो इतनी हिट रहीं कि उनका नाम ही 'भारत कुमार' पड़ गया। जन्मदिन के मौके पर जानते हैं मनोज कुमार के बारे में कुछ दिलचस्प किस्से...
Manoj Kumar Birthday: ऐसे बने थे मनोज कुमार बॉलीवुड के 'भगत सिंह', बेहद दिलचस्प है किस्सा
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मनोज कुमार के फिल्मी सफर की शुरुआत से जुड़े कई किस्से हैं जो बेहद दिलचस्प हैं। मनोज कुमार जब बहुत छोटे थे तब उनको उनके मामू ने एक फिल्म दिखाई। उस फिल्म में दिलीप कुमार की मौत हो जाती है और फिर 20 या 25 दिन बाद उन्होंने फिर से एक फिल्म देखी 'शहीद' उसमें भी वो थे। इस फिल्म में भी उनकी मौत दिखाई जाती है, ये सब देख कर वो परेशान हो गए। परेशान होकर उन्होंने अपनी मां से पूछा, 'माँ, एक इंसान कितनी बार मरता है। मां ने जवाब दिया एक बार। फिर मैंने पूछा और जो दो तीन बार मरे वो, तो मां ने कहा कि वो फरिश्ता हुआ।'
आगे मनोज कुमार बताते हैं, 'मैंने मन में सोचा कि मैं भी फरिश्ता बनूंगा। मेरे अंदर फिल्में देखने का शौक पैदा हो गया था और उसी दौरान मैंने फिल्म देखी 'शबनम' उसमें भी दिलीप कुमार साहब थे। उस फिल्म में उनका नाम मनोज था मुझे ये नाम अच्छा लगा। उस दौरान हम रिफ्यूजी कैंप में रह रहे थे और वहां अलग-अलग जुबां बोलने वाले लोग रहते थे। वहां मनोज किसी का नाम नही था, मैंने तय किया कि जब मैं एक्टर बनूंगा तब अपना नाम मनोज रखूंगा।
विभाजन के बाद मनोज कुमार दिल्ली आ गए और फिर मुंबई। मनोज कुमार को भगत सिंह से बचपन से ही लगाव था। इस बारे में उन्होंने बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में बताया था। मनोज ने बताया, 'बचपन में हमें गली मोहल्ले में शहीद भगत सिंह पर एक नाटक करना था, और मेरी कद काठी ठीक थी। तो मुझे भगत सिंह का रोल दे दिया गया और जब ये नाटक हुआ तो मोहल्ले के सभी लोगों के बीच मैं स्टेज पर जाने से हिचकने लगा और मेरे मन में खलिश रह गई कि मैं ये न कर सका। मेरे पिताजी ने भी कहा कि छोड़ यार तू नकली भगत सिंह भी न बन सका। उसके बाद ये भगत सिंह मेरे अंदर पनपने लगा मैं कभी पेंसिल से अपनी मूंछे बनाता, कभी पिताजी को परेशान करता।'
आगे मनोज बताते हैं, 'बड़े होने के बाद मैंने भगत सिंह के बारे में पढ़ना शुरू किया जहां से मुझे कोई मैगजीन या कुछ भी मिलता मैं पढ़ लेता। तीन चार साल मुझे खोज में लगे। उस समय भगत सिंह पर कोई किताब नहीं छपी थी इसलिए इतना वक्त लगा। मैंने एक स्क्रिप्ट तैयार की और अपने दोस्त कश्यप को दिखाई और उसने जिद की कि मुझे इसी पर एक फिल्म बनानी है। इसका क्रेडिट मैं कश्यप को ही देता हूं। ये शहीद फिल्म बनी और मेरी मेहनत रंग लाई। इस फिल्म को नेशनल अवॉर्ड मिला।
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