एक पैर में दिक्कत के चलते 13 साल की उम्र तक दौड़ने से महरूम रहे विकास खन्ना अब अपने सपनों की उड़ान का आनंद ले रहे हैं। उनकी बनाई फिल्मों की चर्चा संयुक्त राष्ट्र और अमेरिकी संसद तक में हो रही है। विकास की फिल्म ‘द लास्ट कलर’ ने दुनिया की 35 करोड़ विधवाओं की विरासत में हिस्सेदारी का मुद्दा दमदार तरीके से उठाया है तो उनकी दूसरी फिल्म ‘बेयरफुट एम्प्रेस’ लड़कियों की शिक्षा के अहम विषय पर बात करती है। अमृतसर में जन्मे विकास अब अमेरिका में रहते हैं और जल्द प्रसारित होने वाले रियलिटी शो ‘मास्टरशेफ इंडिया’ के सातवें सीजन की शूटिंग के लिए इस बार जब वह मुंबई आए तो ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल ने उनसे ये एक्सक्लूसिव मुलाकात की।
Vikas Khanna Exclusive Video Interview: ‘मां के हाथ से बने खाने से ज्यादा महत्वपूर्ण और पवित्र कुछ नहीं है’
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रसोई में पहली बार बचपन में आपने अपनी दादी के लिए चाय बनाई और उनका दिल जीत लिया। खाने का आत्मा से रिश्ता कितना अहम है?
जो आपके बड़े हैं, उनको पता है कि वह आपको हराना नहीं चाहते। चाय नहीं भी अच्छी बनी होगी तो उनको तो यही कहना था कि मैंने ऐसी चाय जिंदगी में कभी नहीं पी। लेकिन, मेरे मन में सवाल यही रहा कि ये चाय बीजी (दादी) जैसी क्यों नहीं बनती। मैं महसूस करता हूं खाने का रिश्ता दिल के साथ बहुत गहरा है। यही वह रिश्ता है जो सीधे हमें हमारे बचपन में ले जाता है। याद आते हैं वे सारे पल जब पूरा परिवार एक साथ होता था। सब तंदुरुस्त थे, रिश्तों में दीवारे नहीं थीं। और, ये सब आपको खाना याद दिलाता है।
आपने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा से लेकर देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक के लिए खाना पकाया है। खाना स्वाद के लिए भी खाया जाता है और भूख मिटाने के लिए भी, दोनों का संतुलन कितना चुनौती भरा होता है?
बहुत चुनौती भरा है। जब फुल कोर्स मेन्यू हो तो खाने की मात्रा बहुत कम रहती है। एक निवाले में ही पूरा स्वाद लाने की चुनौती होती है। लेकिन जब बात मध्यमवर्गीय रेस्तरां की आती है तो वहां मात्रा और दाम दोनों का संतुलन जरूरी होती है। मैं अमेरिका में हर वर्ग के लोगों के लिए अपनी सेवाएं देता हूं और उनमें अंतर है। लेकिन जो आत्मा है वह दोनों की एक सी है। नहीं तो मेरा अपने ग्राहकों के साथ रिश्ता नहीं बन पाएगा। खाने की भावना समझना बहुत जरूरी है। ये कहना आसान है, लेकिन अगर आपके खाने ने खाने वाली की रूह को नहीं छुआ तो लोग उसका स्वाद चंद लम्हों के बाद भूल जाएंगे।
और, यही गुण आप ‘मास्टर शेफ इंडिया’ के प्रतियोगियों के खाने में भी देखते हैं?
मैं शुरू से यही करता आ रहा हूं। मुझे 13 साल हो रहे हैं ये शो करते हुए और मैंने अपना रिश्ता वही रखा है। आधुनिकता और प्रयोगों से मुझे परहेज नहीं है लेकिन अगर मूल तत्व सही नहीं है तो बात बनेगी नहीं। लता (मंगेशकर) जी आधुनिक गाने भी गाती थीं लेकिन उनके गायन का मूल तत्व हमेशा शास्त्रीय रहा। खाने में शास्त्रीयता से मेरा अभिप्राय पाक कला के मूल तत्वों का सही ज्ञान है। अगर यही नहीं पता कि प्याज कैसे भूनना है, कितने तरीकों से इसे भूना जा सकता है तो खाना स्वादिष्ट कैसे बनेगा?
हमारी बातचीत से पहले आप अपने कार्यक्रम का कोई हिस्सा आंखों पर पट्टी बांधकर फिल्मा रहे थे जिसमें आपने सबसे पहला काम खाने को सूंघने का किया। खाने में खुशबू का कितना महत्व मानते हैं आप?
हमारी इंद्रियों में घ्राणेन्द्रिय यानी नाक सबसे शक्तिशाली होती है। लेकिन, इसका प्रयोग बहुत से लोग करते नहीं हैं। हालांकि किसी के घर जाएं और खाना सूंघने लगें तो ये भी ठीक नहीं है लेकिन आप देखेंगे कि खाने की खुशबुएं हमारी यादों को ताजा कर देती हैं।