फिल्म ‘हीरोपंती’ से अपना करियर शुरू करने वाली अभिनेत्री कृति सैनन अब हिंदी सिनेमा की चोटी की अभिनेत्रियों में शुमार हो चुकी हैं। ‘बरेली की बर्फी’, ‘लुकाछिपी’ और ‘पानीपत’ जैसी फिल्मों में उनके किरदारों ने उनकी पोजीशन और मजबूत की है। कृति सैनन का अब तक का करियर महज सात साल का है और किरदार उनके रहे हैं, एक से बढ़कर एक चुनौती वाले। आने वाली फिल्मों में से फिल्म ‘आदिपुरुष’ में वह अभिनेता प्रभास के साथ हैं और सीता का रोल कर रही हैं। फिल्म ‘मिमी’ के चर्चे इन दिनों चहुंओर हैं। फिल्म ‘बच्चन पांडे’ में वह अक्षय कुमार के साथ दिखेंगी। अभिनेत्री कृति सैनन से ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल की एक्सक्लूसिव बातचीत।
EXCLUSIVE: ‘मिमी’ के किरदार से कृति सैनन का बढ़ा रुतबा, बोलीं, ‘सीता का किरदार बहुत बड़ी जिम्मेदारी’
‘मिमी’ एक संवेदनशील फिल्म है। आपका किरदार इसमें एक नर्तकी का है। नृत्य आपका जुनून है या फिर अभिनय का एक हिस्सा?
डांस का शौक मुझे बचपन से था। मुझे पता नहीं था कि मैं एक्टिंग कर सकती हूं या नहीं और न ही मैंने कभी इसके बारे में सोचा ही था लेकिन, हां नाचना मुझे बचपन से बहुत पसंद रहा। ये गुण मेरा पैदाइशी कह सकते हैं। माता पिता ने पांच साल तक कथक की शिक्षा भी दिलवाई। उन दिनों मैं माधुरी दीक्षित के सारे गाने देखकर कॉपी करने की कोशिश करती थी।
सिर्फ सात साल पहले फिल्म ‘हीरोपंती’ से आपने करियर शुरू किया और अभी से लोगों को बिट्टी मिश्रा, रश्मि त्रिवेदी या पार्वती बाई जैसे आपके किरदारों के नाम याद रहने लगे हैं, ये अलग अलग किरदार संयोग हैं या रणनीति?
जी, रणनीति तो बिल्कुल नहीं है। शुरू में तो आपके पास गिने चुने ही प्रस्ताव आते हैं और इनमें से जो पसंद आते हैं, वह हम करते चले जाते हैं। हां, इन्हीं के बीच कुछ मील के पत्थर आते हैं जो आपको कुछ अलग करने का मौका देते हैं, जैसे मेरी चौथी फिल्म थी ‘बरेली की बर्फी’। एक साधारण सी दिखने वाली छोटे शहर की बिट्टी मिश्रा। अश्विनी अय्यर तिवारी और नितेश तिवारी ने मुझमें ये किरदार देखा, मैं कैसी हूं ये नहीं देखा। लोगों ने मुझे इस तरह के किरदारों में पसंद किया तो ‘लुकाछिपी’ की रश्मि त्रिवेदी भी बनी मैं। लेकिन, आशुतोष गोवारिकर ने मेरे जैसी उत्तर भारतीय पंजाबी लड़की को महाराष्ट्र की एक युवती के किरदार में कैसे देखा, मैं भी नहीं जानती।
फिल्म ‘पानीपत’ में पार्वती बाई का रोल आपके करियर का टर्निंग प्वाइंट है। ऐसा मानती हैं आप?
पानीपत की लड़ाई पर आधारित एक फिल्म मे अगर एक युवती का किरदार उभर कर आ जाए तो वही अपने आप में बड़ी बात है। युद्ध आधारित फिल्मों में अक्सर ऐसा होता नहीं है लेकिन फिल्म ‘पानीपत’ में ऐसा हुआ। एक अभिनेत्री के तौर पर मुझे लगता है कि मुझे वहां बहुत सराहा गया और इसके बाद ही मुझे खुद भी अंदर से महसूस हुआ कि मैं अब इससे भी चुनौतीपूर्ण कुछ कर सकती हूं।
और, ये चुनौती आपको लक्ष्मण उतेकर ने दी फिल्म ‘मिमी’ में?
मुझे लगता है कि कहीं न कहीं मैं ढूंढ रही थी ऐसा कोई किरदार। कई बार हम अंदर से किसी काम को करने के लिए तैयार होते हैं और आपको वही करने का मौका मिल जाता है। ‘लुकाछिपी’ हालांकि बहुत ही हल्की फुल्की फिल्म थी जबकि ‘मिमी’ बहुत ही भावुक फिल्म है। शायद ‘लुकाछिपी’ का जो इकलौता इमोशनल सीन है, लक्ष्मण ने वह देखा और मुझे ‘मिमी’ में ये चुनौतीपूर्ण रोल सौंपा।