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'साहिबा ने तीर क्यों तोड़े' मिर्जिया की कहानी, मेहरा की जुबानी

Mon, 29 Aug 2016 04:17 PM IST
अमित कर्ण, अमर उजाला
अमित कर्ण, अमर उजाला Updated Mon, 29 Aug 2016 04:17 PM IST
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mirzya director rakesh omprakash mehra interview

राकेश ओमप्रकाश मेहरा सिने प्रे‌मियों को अपनी अगली सौगात मिर्जिया के रूप में दे रहे हैं। 53 के हो चुकने के बावजूद वे युवा पीढ़ी की मानसिकता बखूबी समझते हैं। 'मिर्जिया' पंजाब के प्रसिद्ध प्रेमी-युगल मिर्जा और साहिबा की प्रेम कहानी पर आधारित है। यह दो कालखंडों यानी दो अलग एरा में सेट हैं। एक राजा-महाराजाओं वाला दौर। दूजा मौजूदा जमाने का शोर। राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने खास बातचीत में साझा की फिल्म से जुड़ी बातें। साथ ही यह भी ढलती उम्र में भी किस्सागोई का तरीका कैसे धारदार रखा जाए।

जिंदगी जीने वालों के पास होती है सफलता की चाभीः राकेश ओमप्रकाश मेहरा

mirzya director rakesh omprakash mehra interview

साहिबा ने तीर क्यों तोड़े

राकेश बताते हैं, बरसों पहले कॉलेज में मैंने मिर्जा व साहिबा की प्रेम गाथा पर आधारित प्ले देखा था। मिर्जा साहब बेमिसाल योद्धा थे। सा‌हिबा और वे एक-दूसरे से बेपनाह मोहब्बत करते थे। पर वह साहिबा के भाइयों को नामंजूर था। नौबत मरने-मारने पर आ गई। दोनों पक्ष जंग के मैदान में एक-दूसरे के सामने थे। साहिबा वह सब देख खुश नहीं थी। जब साहिबा को लगा कि युद्ध में मिर्जा साहब का पलड़ा भारी है तो उन्होंने मिर्जा साहब के तरकश के सभी तीर तोड़ डाले। मैं हक्का-बक्का रह गया। मैं समझ नहीं सका कि साहिबा ने ऐसा क्यों किया? मिर्जिया के निर्माण के दौरान मैं गुलजार साहब से मिला। उनसे इस सवाल पर काफी माथा-पच्ची हुई। गुलजार साहब ने हंसते हुए कहा कि साहिबा से ही पूछ लो। फाइनली बात समझ में आई। वह यह कि सच्चे प्यार में हासिल करने से ज्यादा त्याग करने का माद्दा होता है। सा‌हिबा ने उसी प्यार की खातिर जान से भी प्यारी चीज 'अपने' भाइयों पर कुर्बान कर दी। इस किस्म का जज्बा रखना सच्ची मोहब्बत की निशानी है। मिर्जिया में हमने दो अलग पी‌ढ़ियों की मुश्किलों, दुविधाओं व प्रलोभनों को पिरोया है। प्यार के तब्दील हो चुके दुश्मनों और पैरोकारों को जाहिर किया है।

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जिंदगी जीना न छोड़ें, खुदा न माने खुद को

उम्र ढलने के बावजूद हम सोच से जवां रह सकते हैं। जरूरत इस बात कि है कि आप जिंदगी जीना न छोड़ें। इससे मेरा मतलब है कि हम चाहे कितने अनुभवी क्यों न हो जाएं, हममें सीखने की ललक सदा होनी चाहिए। खुद को खुदा मान लेने पर पतन जरूर होता है। यही वजह है कि एक जमाने में लगातार हिट फिल्में देने वाले अपने दौर के बंदी होकर रह गए। उन्हें आज के युवाओं की मुश्किलें महज बहाना लगती हैं। हकीकत में ऐसा है नहीं। वे दर-दर पर भटकाव से भरे दौर में जी रहे हैं। विकल्पों की अत्याधिक उपलब्धता से वे  कन्फ्यूज्ड हैं। वे करें तो क्या करें। बुनियादी जरूरतों की चुनौतियां उनके समक्ष ज्यादा हैं। तभी उन्हें फैसले लेने में दिक्कतें होती हैं। इन चीजों को समझते हुए ही हम ऐसी कहानी दे सकते हैं, जो उन्हें अपनी लगे। कई अनुभवी फ‌िल्मकार यहीं पर गलती करते हैं। वे अपनी दशकों पुरानी सोच जाने-अनजाने में थोपते हैं और वहीं आउटडेटेड कहानी कह देते हैं। नतीजतन उनकी फ‌िल्में अच्छा नहीं कर पातीं।

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हर्ष की मुस्कान, सैयमी का ठहराव

मिर्जा व साहिबा एपिक किरदार हैं। दो अलग एरा यानी कालखंड में वे मौजूद हैं। लिहाजा हमारी दरकार दमदार अदाकारी करने वालों की थी। हर्षवर्धन तो दिल्ली6 में मेरे सहायक रह चुके हैं। वे खासे मेहनती भी हैं। उनकी मुस्कान में काफी गहराई है। उससे मैं बड़ा प्रभावित हुआ था। इसलिए मैंने उन्हें दिल्ली6 खत्म होते ही कहा था कि आप एक्टिंग क्यों नहीं ट्राई करते? उस वक्त तो उन्होंने कुछ नहीं कहा। वे तीन साल पहले मेरे पास आए और कहा कि अब वे इसके लिए तैयार हैं। मैंने उनका भी ऑडिशन लिया और मैं हतप्रभ रह गया उनकी परफॉर्मेंस देखकर। यही चीज सैयमी खेर के साथ रही। उनके लुक टेस्ट और ऑडिशन का सिलसिला तो महीनों तक चला। दोनों के चयन पर मुझे खुद पर नाज हुआ। वह इसलिए कि उन दोनों ने अपना खून-पसीना इस फिल्म को दिया। शूटिंग से पहले उनकी आठ महीने लंबी वर्कशॉप चली। सैयमी ने राजस्थान में कड़ाके की ठंड में जिस सहजता से शॉट दिए हैं, वे कसम से कमाल के हैं। उनके चेहरे के नूर व ठहराव कातिलाना हैं।

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एडिटिंग पैटर्न के चलते भूत-वर्तमान

रंग दे बसंती व भाग मिल्खा भाग की तरह यहां भी कहानी भूत व वर्तमान काल में आती-जाती है। इस पैटर्न पर काम करने की वजह फिल्म की एडिटिंग है। सरल शब्दों में समझाऊं तो शूटिंग के बाद हमारे पास फ‌िल्म की रॉ फुटेज का जखीरा होता है। कहानी कहने के क्रम में मुझे वर्तमान और भूतकाल की अदला-बदली करने में मजा आता है। जैसा रंग दे बसंती में होता है। आमिर के किरदार दलजीत सिंह ऊर्फ डीजे भूतकाल में चंद्रशेखर आजाद की भूमिका अदा कर रहा होता है। इससे दो दौर और अलग शख्सियत को दिखाने में मुझे सहूलियत होती है। तभी फुटेज के किसी भी हिस्से को कट कर कहीं और पेस्ट कर देता हूं।

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