50, 60 और 70 के दशक के आसपास जिन पुरुष गायकों का नाम फौरन जुबां पर आता है, वो हैं मोहम्मद रफी, किशोर कुमार, मन्ना डे और मुकेश। इन सबके गीत गाने की शैलियां भी अलग थीं जिससे इनकी पहचान थी। ये एक दूसरे के समकालीन प्रतिद्वंदी होते हुए भी गहरे दोस्त भी थे। और इनकी दोस्ती के किस्से आज भी खूब मशहूर हैं। आज मुकेश का जन्मदिन है। उन्हें जीना यहां मरना यहां, जाने कहां गए वो दिन, कहीं दूर जब दिन ढल जाए जैसे सैकड़ों भावनात्मक गीतों को गाए जाने के लिए पहचाना जाता है। इस खास मौके पर आज हम मुकेश और उनके दोस्तों से जुड़े कुछ किस्से सुनाते हैं।
कालजयी गायक मुकेश ने अपने ही गाने को बताया गंदा तो रिक्शा वाले ने किनारे लगाया रिक्शा और फिर...
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मुकेश एक बार शिर्डी गए। साईं बाबा के दर्शन करने के बाद उन्हें शिर्डी के आसपास के इलाके को घूमने की इच्छा हुई। उन्होंने वहां खड़े रिक्शा वाले से कहा कि क्या वह उन्हें वहां के आसपास की चीजों को घुमा सकता है? रिक्शा वाला तो इसी के लिए खड़ा हुआ था। उसने फौरन हां बोल दी। मुकेश रिक्शे पर सवार हुए। रिक्शा वाले को तो पता ही नहीं था कि जो शख्स उसके रिक्शे पर आकर बैठा है, वह कौन है? वह अपने रिक्शे को खींचते हुए मुकेश का ही गाया हुआ एक मशहूर गीत 'गाए जा गीत मिलन के, तू अपनी लगन के, सजन घर जाना है' गाने लगा।
गीत को सुनकर मुकेश मुस्कुराए और रिक्शा वाले से बोले कि भाई यह किसका गाना गा रहे हो? तो रिक्शा वाले ने जवाब दिया कि आप इन्हें नहीं जानते! यह मुकेश जी का गाया हुआ गाना है। मुकेश थोड़े मजे लेने के मूड में थे। उन्होंने कहा कि नाम तो सुना है लेकिन बहुत गंदा गाता है। किसी और का गीत सुनाओ। यह सुनकर रिक्शावाला नाराज हो गया। रिक्शा एक बगल में रोककर उसने मुकेश को अपने रिक्शा से उतरने को कहा। मुकेश यहां थोड़े डर गए। लेकिन फिर भी उन्होंने साहस बांधते हुए कहा कि क्या हुआ भाई?
रिक्शा वाले ने गुस्से में कहा कि आप मुकेश जी को नहीं जानते तो कोई बात नहीं लेकिन उनके बारे में आपने बुरा बोलने की हिम्मत कैसे की? मुकेश ने उससे माफी मांगी और दो सौ रुपये देने की शर्त पर रिक्शा आगे ले चलने को कहा। लेकिन रिक्शा वाला नहीं माना। हारकर मुकेश को अपना परिचय उसे देना पड़ा, तब रिक्शा वाला बहुत खुश भी हुआ और दोपहर तक मुकेश को अपने रिक्शा पर घुमाया रहा। इस दौरान मुकेश ने उस रिक्शेवाले को बहुत से गीत भी सुनाए। उस रिक्शे का मालिक वह नहीं था। खुश होकर मुकेश ने एक नया रिक्शा भी उसे उपहार स्वरूप दिया।
एक किस्सा उनके करीबी दोस्त मोहम्मद रफी से भी जुड़ा हुआ है। 27 अगस्त 1976 को अमेरिका में जब मुकेश का निधन हुआ तब उनके शव को अंतिम संस्कार के लिए भारत लाया गया। उनके दोस्त मोहम्मद रफी को मुकेश के निधन की खबर सुनकर एक धक्का सा लगा। उस वक्त खुद रफी भी अपनी गर्दन की नस पर निकले एक फोड़े की वजह से अस्पताल में डॉक्टरों की देखरेख में अपना समय गुजार रहे थे। जब मुकेश के शव को भारत लाया गया तो रफी को अपने दोस्त की अंतिम यात्रा में जाने की भरपूर इच्छा हुई।