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Nusrat Fateh Ali Khan: पिता की मौत ने नुसरत को बनाया था दस्तारबंदी, इस लालच में ली थी सुरों की तालीम
Fri, 13 Oct 2023 10:32 AM IST
आकांक्षा गुप्ता
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
Published by: आकांक्षा गुप्ता
Updated Fri, 13 Oct 2023 10:32 AM IST
सार
नुसरत फतेह अली खान को संगीत की शिक्षा अपने घर पर पिता से ही मिली है। इसके बाद शहंशाह-ए-कव्वाली ने अपनी इस कला को विदेशों तक पहुंचाया और नाम कमाया।
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नुसरत फतेह अली खान
- फोटो : अमर उजाला
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जाने-माने गायक नुसरत फतेह अली खान की आज जन्मतिथि है। अपनी रूहानी आवाज से लोगों के दिलों पर राज करने वाले पाकिस्तानी कव्वाल नुसरत फतेह अली खान अपने काम से अमर हैं। नुसरत फतेह अली के शब्दों में ऐसा जादू था, कि आज भी जो उनकी आवाज एक बार सुन लेता है, वह बस उन्हीं का होकर रह जाता है। आज भी उनके गाए हुए गाने समां बांध देते हैं। वह चुनिंदा शब्दों को सुरों में पिरोकर उसे कव्वाली के रूप में पेश करते थे, और यह सीधा सुनने वालों के दिल पर वार करते थे। आज ही के दिन पाकिस्तान में उनका जन्म हुआ था। आज उनकी जन्मतिथि के मौके पर हम आपको उनकी जिंदगी के चंद किस्सों से रूबरू करा रहे हैं।
नुसरत फतेह अली खान
- फोटो : सोशल मीडिया
नुसरत फतेह अली खान का जन्म 13 अक्तूबर, 1948 को पाकिस्तान के फैसलाबाद में हुआ था। भारत-पाकिस्तान बंटवारे से पहले उनका परिवार भारत के जालंधर शहर में रहता था। जन्म के वक्त नुसरत साहेब का नाम परवेज था। नुसरत फतेह अली के पिता जाने-माने कव्वाल थे। उनके पिता से कव्वाली सीखने के लिए विदेशों से लोग आया करते थे। नुसरत को संगीत की शिक्षा अपने घर पर पिता से ही मिली है। इसके बाद शहंशाह-ए-कव्वाली ने अपनी इस कला को विदेशों तक पहुंचाया और नाम कमाया। पाकिस्तान से ताल्लुक रखने के बावजूद नुसरत फतेह अली खान को भारत में बेशुमार प्यार मिला। इतना ही नहीं उन्हें शहंशाह-ए-कव्वाली के नाम से भी नवाजा गया।
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नुसरत फतेह अली खान
- फोटो : सोशल मीडिया
नुसरत के पिता फतेह अली खान के अलावा उनके चाचा सलामत अली खान और मुबारक अली खान भी प्रसिद्ध कव्वाल थे। उनका यह खानदानी पेशा था। यही कारण रहा कि बचपन से ही नुसरत और उनके भाई फारुक को हारमोनियम बजाना, गाना और इससे जुड़ी दूसरी तालीम मिलती रहीं। लड़कपन में दोनों भाईयों का मन इसमें नहीं लगता था। इसके बावजूद उन्हें इसकी तालीम लेनी पड़ती थी। एक इंटरव्यू में नुसरत के भाई फारुक फतेह अली खान ने बताया था, 'दोनों भाइयों को टॉफी का लालच लेकर धोबीघाट के पास ले जाते थे। वहां पर बैठकर ही राग, हारमोनियम और अन्य जानकारी दी गई। ये सिलसिला लंबे वक्त चलता रहा, लेकिन किसी का भी गाने में मन नहीं लगा।'
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नुसरत फतेह अली खान
- फोटो : सोशल मीडिया
खान साहेब के पिता चाहते थे कि उनके बेटे इंजीनियर या डॉक्टर बनें। हालांकि, पीढ़ियों से चली आ रही इस परंपरा को बरकरार रखने के लिए उन्होंने अपने बेटों को कव्वाली और संगीत की तालीम दी। वक्त आगे बढ़ता रहा और 1964 में फतेह अली खान दुनिया को अलविदा कह गए। उनके निधन से परिवारिक पेशे पर संकट के बादल छा गए, क्योंकि उस वक्त फतेह अली खान के भाइयों और खान साहेब के दोनों चाचा सलामत अली खान और मुबारक अली खान की भी उम्र काफी ज्यादा हो चुकी थी।
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नुसरत फतेह अली खान
- फोटो : सोशल मीडिया
इसके बाद नुसरत फतेह अली खान ने अपने कंधों पर घर की जिम्मेदारी उठाने की ठानी। हालांकि, जिस वक्त दस्तारबंदी होनी थी, उस वक्त वहां मौजूद लोग चाहते थे कि वह गाकर सुनाए। उस समय वह गाना नहीं गाते थे, लेकिन बिना गायिकी की परीक्षा दिए ही उनकी दस्तारबंदी की गई, यानी उन्हें कव्वाली ग्रुप का प्रमुख बनाया गया। पिता के गुजर जाने के 40 दिन बाद खान साहेब ने कव्वाली गाई, जिसके बाद नुसरत फतेह अली ने छोटे-छोटे कार्यक्रमों और धार्मिक स्थलों पर गाना शुरू किया। वहीं, जब चाचा मुबारक अली खान ने इस दुनिया को अलविदा कहा तो कव्वाली ग्रुप की पूरी जिम्मेदारी उनको सौंप दी गई थी।
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