वेब सीरीज 'जुबली' का नशा अभी ओटीटी दर्शकों के सिर से उतरा नहीं है। इस सीरीज में बंबई शहर के पहले फिल्म स्टूडियो बॉम्बे टाकीज के संस्थापक हिमांशु राय से मिलता जुलता किरदार श्रीकांत रॉय निभाने वाले अभिनेता प्रोसेनजीत चटर्जी की भी इस सीरीज में उनके काम के लिए खूब सराहना हो रही हैं। प्रोसेनजीत चटर्जी का मानना है कि वह करियर के ऐसे मुकाम पर हैं जहां उनके लिए कुछ और हासिल करना शेष नहीं है। लेकिन, अब वह ऐसी भूमिकाएं जरूर करना चाहते हैं जिनका जिक्र सिनेमा पर आने वाले दिनों में होने वाले शोध में जरूर हो। 60 साल के हो चुके प्रोसेनजीत चटर्जी उन गिने चुने भारतीय कलाकारों में हैं जो श्वेत श्याम फिल्मों के दौर से शुरू करके अब डिजिटल दौर तक की फिल्मों में काम कर रहे हैं। प्रोसेनजीत से ‘अमर उजाला’ की एक खास मुलाकात...
Prosenjit Chatterjee Interview: 300 फिल्में, सौ निर्देशक और ‘जुबली’, प्रोसेनजीत बोले, अब ऐसा चाहता हूं कि...
प्रोसेन दा, ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म ‘छोटो जिज्ञासा’ (1968) से आपकी अभिनय में बोहनी हुई और अपनी पहली फिल्म में आप अपने पिता विश्वजीत चटर्जी के नजर आए। क्या यादें हैं आपके साथ इस फिल्म की?
फिल्म 'छोटो जिज्ञासा' डैडी ने ही प्रोड्यूस की थी। जब वह फिल्म की थी तब मैं पांच साल का था। उस समय कि ऐसी कोई बात तो याद नहीं है जो सुना सकूं। लेकिन अपने बुजुर्गों से सुनता हूं कि क्या हुआ था। इस फिल्म की शूटिंग के दौरान मैं बहुत ही मस्ती किया करता था और लोगों को कहता था, चलो शूटिंग शूटिंग खेलते हैं। इस फिल्म के बाद डैडी के साथ कभी स्क्रीन शेयर करने का मौका नहीं मिला। डैडी अब भी स्वस्थ है और मौका मिला तो उनके साथ फिर से जरूर काम करना चाहूंगा। मैंने सुना था कि ‘छोटो जिज्ञासा’ राज कपूर साहब को बहुत पसंद थी और इसे वह हिंदी में बनाना चाह रहे थे।
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ऋषिकेश मुखर्जी की तो और भी फिल्में आपने देखी होंगी? उनके निर्देशन को लेकर कुछ बताना चाहेंगे?
ऋषि दा का मै बचपन से ही बहुत बड़ा प्रशंसक रहा हूं, उनकी सारी फिल्में देखी हैं। ‘छोटो जिज्ञासा’इस फिल्म के बाद उसने कई बार मिलना हुआ। मुझे याद है 'छोटो जिज्ञासा' की शूटिंग के दौरान उनके पैर में चोट लगी थी लेकिन दर्द को नजरअंदाज करके वह अपने काम में बिजी रहते थे। मैं जब भी मुंबई आता था तो ऋषि दा के घर जाकर उनसे जरूर मिलता था। एक बार उन्होंने बताया था कि कैसे उस समय कलाकार और कैमरे के बीच की दूरी फीता लेकर नापा करते थे ताकि रोशनी सही से व्यवस्थि की जा सके। फीता फोल्ड करके रखा जाता था, और मुझे लगता कि वह कैडबरी चाकलेट है, जिसे मैं खाने की कोशिश करने लगता था।
बाल कलाकार के बाद खूब काम करने के बाद आप बिमल रॉय की फिल्म ‘दुती पाटा’ में दिखे, बिमल दा के बारे में आपकी क्या यादें हैं?
जब मैंने बिमल दा की फिल्म 'दुती पाटा' की थी तब मैं 17-18 साल का था। उस समय मैं थियेटर करता करता था। ज्यादातर नाटक पारिवारिक होते थे। उस समय बिमल दा ‘बॉबी’ जैसी एक लव स्टोरी बनाना चाह रहे थे। उन्होंने मेरा नाटक देखा और 'दुती पाटा' के लिए फाइनल कर लिया। यह फिल्म पहले ब्लैक एंड व्हाइट में बनी थी बाद में इसे रंगीन करके रिलीज किया गया और यह फिल्म एक एक थियेटर में 22 हफ्ते चली थी। फिल्म सुपर हिट होने के बाद भी तीन चार साल तक किसी ने मुझे काम ही नहीं दिया। लोग बोलते थे कि तुम बहुत छोटे हो। मुंबई में भी यही सोचकर थियेटर करता रहा कि शायद मुझे यहां काम मिले। फिर मुझे एक फिल्म 'अमर प्रेम' मिली और यह फिल्म 75 सप्ताह चली। इसमें जूही चावला ने काम किया था। जूही की यह पहली बांग्ला फिल्म थी।
बिमल रॉय की कौन सी फिल्म का आपके जीवन पर प्रभाव पड़ा और आप को लगा हो कि एक एक्टर के तौर पर उसे अपनी जिंदगी में उतारना चाहिए?
बिमल दा की मैने हर फिल्म देखी है। चाहे वह ‘दो बीघा जमीन’ हो, या फिर ‘देवदास’, ‘मधुमती’, ‘यहूदी’, ‘सुजाता’ या फिर ‘बंदिनी’ हो। फिल्म ‘मधुमती’ का मेरे ऊपर काफी प्रभाव पड़ा। इस फिल्म में वैजयंती माला और दिलीप कुमार साहब ने काम किया था। फिल्म की कहानी एक आधुनिक विचार वाले पुरुष की है जिसे मधुमती नामक एक आदिवासी महिला से प्यार हो जाता है। दोनों किस तरह से अपने रिश्ते में चुनौतियों का सामना करते हैं, इसे बेहद खूबसूरती से परदे पर उतारा गया है।
