रीना रॉय के माता-पिता सादिक अली और शारदा राय ने उन्हें अभिनय घुट्टी में पिलाया। दोनों हिंदी सिनेमा के हाशिये पर रहे कलाकार थे। और, फिर एक दौर ऐसा भी आया जब रीना रॉय हिंदी सिनेमा की सबसे महंगी अभिनेत्री बनीं। 70 और 80 के दशक की दमकती सुपरस्टार रीना रॉय ने ये एक्सक्लूसिव बातचीत अपने जन्मदिन की पूर्व संध्या पर की।
अमर उजाला EXCLUSIVE: मेरे हीरो बनकर शत्रुघ्न को मिली नई राह, बस, एक ही अरमान अधूरा रह गया
आपने बहुत कम उम्र में अभिनय शुरू कर दिया, क्या वाकई ‘जरूरत’ ही आपकी पहली फिल्म है?
निर्माता निर्देशक बी आर इशारा की फिल्म 'नई दुनिया नए लोग' मेरी पहली फिल्म थी। हां, रिलीज पहले हुई 'जरूरत'। 'नई दुनिया नए लोग' में जब मैंने एक छोटी सी स्कूल गर्ल का किरदार किया तब मैं 13 साल की थी। यह फिल्म निर्माताओं के आपसी झगड़े की वजह से रिलीज नहीं हो पाई। इसके छह महीने बाद जब बी आर इशारा 'जरूरत' बनाने जा रहे थे तो उसमें भी पहली पसंद रेहाना सुल्तान ही थीं लेकिन 'चेतना' के बाद रेहाना बहुत व्यस्त हो गई थी तो मुझे ये मौका मिला। यह फिल्म 1972 में रिलीज हुई थी।
50 साल हो गए आपको मनोरंजन जगत में काम करते हुए लेकिन आपकी राह कामयाबी की तरफ मोड़ देने वाली फिल्में ‘जैसे को तैसा’ और ‘नागिन’ को लोग अब तक नहीं भूले...
'जैसे को तैसा' 1973 में रिलीज हुई। इसके हीरो जितेन्द्र बहुत ही मेहनती और समय के पाबंद इंसान रहे हैं। लोग अब फिटनेस के चक्कर में खाने पीने पर इतना ध्यान देते हैं, वह 50 साल पहले हमें समझाया करते थे कि मीठा मत खाओ, रोटी चावल मत खाओ, सिर्फ प्रोटीन वाली चीजें और सलाद खाओ। खूब वर्जिश करो। मैं तो थी 15 साल की तो मुझे उनकी बातें समझ ही नहीं आती थीं लेकिन मैंने कभी जितेंद्र को रोटी, चावल खाते नहीं देखा। रही बात ‘नागिन’ की तो उस दौर में राजकुमार कोहली ही ऐसे निर्देशक थे जो इतने सारे सितारों को एक साथ इकट्ठा कर सकते थे। इस काम में उनकी पत्नी निशि की भी बहुत मेहनत शामिल थी। 'नागिन' के बाद मैंने उनके साथ 'जानी दुश्मन' और 'राज तिलक' भी कीं। कोहली साब के बाद मनमोहन देसाई ही ऐसा कर पाए।
और, फिर आई ‘कालीचरण’! शत्रुघ्न सिन्हा के साथ तो आपकी जोड़ी खूब जमी?
फिल्म ‘कालीचरण’ के निर्देशक सुभाष घई के साथ मैं उनकी हीरोइन के तौर पर एक फिल्म 'गुमराह' कर चुकी थी। उसमें वह अभिनेता थे। उनके साथ एक अलग ही रिश्ता था मेरा। फिर जब वह निर्देशक बने तो उनकी फिल्म 'कालीचरण' और ‘विश्वनाथ’ में मैंने काम किया। शत्रुघ्न सिन्हा के साथ मैंने बहुत सारी फिल्में की और सारी फिल्मों को बहुत पसंद किया गया। तो ये तो सच है कि उनके साथ मेरी जोड़ी खूब जमी। पहली बार वह 'कालीचरण' में मेरे ही हीरो बनकर आए और इसी फिल्म से उनका दौर बदला। नहीं तो पहले तो वह फिल्मों में विलेन के ही किरदार निभाते थे। मेरी फिल्म 'मिलाप' में भी वह विलेन थे लेकिन 'कालीचरण' हिट हुई तो उनके लिए नए रास्ते खुल गए।
हम जितेंद्र की बात कर रहे थे तो आप उनकी खाने को लेकर सख्ती की बातें बता रही थीं लेकिन संजीव कुमार तो बिल्कुल अलग रहे होंगे?
संजीव कुमार को खाने का बहुत शौक था। वह बोलते थे कि जो मन में आए सब खाओ। जब सेट पर आते थे तो सेट का पूरा वातावरण ही बदल जाता था। वह बहुत ही मजाकिया इंसान थे। सेट पर जब वह काम करते थे तो उनके चुटकुले शुरू ही रहते थे। ऐसे चुटकुले सुनाते थे कि पूरी टीम हंस हंस कर पागल हो जाती थी।