लता मंगेशकर पर शोध करने वालों में एक प्रमुख नाम आवाज़ की दुनिया की मशहूर हस्ती हरीश भिमानी का भी रहा है। हरीश भिमानी ने लता मंगेशकर के साथ 21 देशों के 53 शहरों में 123 शोज की यादें अपनी पुस्तक ‘इन सर्च ऑफ लता मंगेशकर’ में संजोई हैं। वह कहते हैं, ‘लता जी ने कभी नहीं माना कि उन्होंने 30 हजार या 40 हजार गाने गाए।’ यहां हमें रिकॉर्डिंग और गानों का फर्क़ भी समझना चाहिए। उन दिनों हर गाने की कम से कम तीन रिकॉर्डिंग होती थीं। और, हर रिकॉर्डिंग अलग अलग ही गिनी जाती थी। उनकी लिखी इस किताब का अगला संस्करण भी जल्द प्रकाशित होने वाला है, जिसमें वह अपनी कुछ और यादें पुस्तक में संजोने वाले हैं। खासतौर से बीते 15 साल की वे यादें जब लता मंगेशकर सार्वजनिक जीवन में कम और सोशल मीडिया पर अधिक नजर आईं। ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल ने हरीश भिमानी से लता मंगेशकर के साथ बिताए उनके समय पर एक लंबी बातचीत की। आज के आपके संडे के लिए पेश है इस ख़ास इंटरव्यू की पहली कड़ी:
Sunday Interview: जब लता मंगेशकर की जिह्वा पर बैठीं सरस्वती और वह बोलीं, ‘मैं चाहती हूं नरेंद्रभाई हमारे प्रधानमंत्री बनें... ’
समय की धाराओं पर चलते हुए जिनके साथ आपने इतना समय बिताया वह लता मंगेशकर अब हमारे बीच में नहीं है। लता जी के के साथ रहते आपको कैसा लगता रहा होगा कि समय बीत रहा है या कि समय इकट्ठा हो रहा है?
ये दो चीजें होती थी, आपने पता नहीं कैसे, क्या सोच कर ये सवाल पूछा क्योंकि अभी मेरे मस्तिष्क में बार बार ये ख्याल आ रहा था मैं अब भी मैं उनके साथ बैठा हूं और बड़ा ही सहज सा पुराना गीत मन में आया कि ‘समय तू रुक जा….। बचपन से जब से होश संभाला, मैं आप और मेरे साथ जितने भी श्रोता इस समय होंगे या पाठक होंगे सभी के बचपन से युवावस्था की शुरुआत से उन्होंने गीत सुने हैं। और, विशेषकर लता मंगेशकर के गीत सुने क्योंकि लता मंगेशकर ने सबसे अधिक लोकप्रिय गीत गाए हैं। लोकप्रिय गीतों की सूची बनाई जाए तो उनके गीत सबसे अधिक होंगे बाकी नंबर गेम में मुझे इतना विश्वास नहीं है कि किसने कितने गाए, ज्यादा गाने से कोई आगे नहीं बढ़ जाता या कि बेहतर माना जाता है लेकिन मैं क्यूं सोचता था के समय रुक जाए। मुझे लगता कि क्या ये मेरी अगाध मेहनत का परिणाम है या फिर आई एम जस्ट लकी। मैं इतना सौभाग्यशाली कि मैं वहां बैठा हूं जहां मैं उनके गीत सीधे उन्हीं से सुन रहा हूं। कैसे? रिहर्सल में। हर कॉन्सर्ट के लिए वह औसतन तीन रिहर्सल करतीं। कहीं पांच, छह भी रहीं। मुझे बहुत अच्छा लगता था कि मैं इस माहौल में हूं पर मुझे कुछ अंदाजा नहीं है कि कौन कौन से गीत गाए जाने वाले हैं क्योंकि उनके लिए एंकरिंग करना, मंच संचालन करना बड़ा पेचीदा था। संक्षेप में कहूं तो पेचीदा इसलिए था कि मंच संचालक को गीत से पहले आना है लेकिन बताना नहीं है कि वह कौन सा गीत गाएंगी!
अच्छा, क्या वाकई?
जी हां, इसीलिए उनके साथ एंकरिंग पेचीदा हुआ करती थी। हमें ये बताने की भी अनुमति नहीं होती कि हम गाना शुरू होने से पहले उस गाने की फिल्म या उसे रचने वालों के बारे में कुछ कहें। और समय की पाबंदी भी थी। वैसे तब मेरा ये भी मानना था कि इतना खर्च करके लोग लता मंगेशकर के कंसर्ट में उनके गीत ही सुनने आते हैं और साथ में मन्ना दा होते हैं। किशोर दा थे, कभी हेमंत दा थे, कभी महेंद्र कपूर थे लेकिन ये लोग गाने सुनने आ रहे हैं। सच कहूं तो हरीश भिमानी की बकबक सुनने नहीं चाहे वो एंकरिंग कितनी अच्छी ही क्यों न हो। तब तो मेरा ‘समय’ भी नहीं आया था।
हां, ‘महाभारत’ धारावाहिक से पहले मैंने आपका वह शो सुना है जो लता मंगेशकर ने 1983 की क्रिकेट वर्ल्डकप विजेता टीम के लिए किया, इसमें लता जी ने गाना गाया था, ‘भारत विश्व विजेता अपना भारत विश्व विजेता’..
मुझे भी ये किसी ने लाकर हाल ही में दिया और वह रिकॉर्ड था और अभी ज्यादा नहीं कुछ ही साल हुए। कोई सज्जन आए मेरे ऑटोग्राफ लेने उस रिकॉर्ड पर। बोले कि मैं टीम के उस शो में मौजूद रहे सारे लोगों के ऑटोग्राफ ले रहा हूं। उस पर विश्वकप विजेता टीम के कुछ क्रिकेटर्स के साथ ही लता जी का भी ऑटोग्राफ था। उन्होंने मुझसे कहा कि आप सेलेब्रिटी हैं तो कुछ देना वगैरह होगा तो हम दे देंगे। मैंने कहा हां, देना तो जरूर होगा। लेकिन सिर्फ इसकी एक प्रति। इसके बदले में आप मुझसे कुछ भी चाहें मैं देने को तैयार हूं।
लता मंगेशकर के साथ आपने करीब दो दर्जन देश घूमे और 1995 में लिखी किताब ‘इन सर्च ऑफ लता मंगेशकर’। उसके बाद 27 साल और आप रहे उनके साथ। तो लता मंगेशकर की खोज कितना और आगे बढ़ पाई इन बीते बरसों में?
मेरा ये मानना है कि जिस किसी आदमी को जानना हो तो उसके साथ सफर करिए। सबसे सही तरीका वही होता है उस आदमी को जानने का। जो आप कह रहे हैं ना तो यही बात खुशवंत सिंह ने अपनी आलोचना में कही थी। पुस्तक की समीक्षा के अंत में उन्होंने जो लिखा तो मुझे लगा कि मुझे तो अवार्ड ही मिल गया। मैंने लता जी को यात्रा के माध्यम से जाना। पहले इस किताब का नाम ये भी सोचा था, ‘लता यात्रा’। लताजी के साथ मेरी यात्रा और लता जी की जीवन यात्रा। मगर थोड़ा सा मुझे इतना अच्छा नहीं लग रहा था। और भी एक शीर्षक दिया था ‘सात सुरों के साथ’। मैं सात सुरों के साथ था और सात सुरों के साथ इनका जीवन। लेकिन उसमें एक ही बात थी कि सात सुरों के साथ तो कोई भी हो सकता है। लता मंगेशकर या कोई भी तो...