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बाइस्कोप: डायरेक्टर की 17 साल की बीवी ने कर ली खुदकुशी, दिल का दर्द सुनाने को बनाई ये क्लासिक फिल्म

Thu, 09 Jul 2020 01:17 AM IST
Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Thu, 09 Jul 2020 01:17 AM IST
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sadma this day that year series by pankaj shukla 8 july 1983 bioscope kamal hassan sri devi
सदमा - फोटो : रोहित झा, अमर उजाला

साल 1981 में ब्लॉकबस्टर फिल्म एक दूजे के लिए से हिंदी सिनेमा में छा जाने वाले अभिनेता कमल हासन के करियर को हिंदी सिनेमा में डूबने से बचाने के लिए जो इकलौती फिल्म क्रेडिट ले सकती है, वह है सदमा। सदमा और एक दूजे के लिए के बीच कमल हासन ने सनम तेरी कसम, ये तो कमाल हो गया और जरा सी जिंदगी से फ्लॉप की हैट्रिक लगाकर न सिर्फ अपने लाखों चाहने वालों का दिल दुखाया बल्कि खुद अपने लिए भी तमाम दिक्कतें पैदा कर लीं। ये फिल्में न कारोबार कर पाईं और न कोई कमाल। इनकी मेकिंग तक लोगों को पसंद नहीं आई। वैसे तो निर्देशक बालू महेंद्रा की फिल्म सदमा भी हिंदी में खास चली नहीं लेकिन इस फिल्म को सिनेमा के सुधी दर्शकों ने खूब सराहा और समय के साथ ये उन गिनी चुनी फिल्मों की लिस्ट में शामिल हो गई जिन्हें रिलीज के समय तो लोगों ने नहीं पूछा लेकिन समय के साथ इन्होंने क्लासिक सिनेमा का दर्जा हासिल कर लिया।



सदमा मेरी भी पसंदीदा हिंदी फिल्मों में से एक है। ये प्रेम में पूरी तरह डूब जाने की फिल्म है। ये फिल्म एक ऐसी दृश्यावली है जिसमें हृदय के हर उस कोने के चित्र कूंची से उकेरे गए  जिन्हें इंसान किसी खास अहसास के लिए संभालकर रखता है। ये फिल्म बालू महेंद्रा का करुण क्रंदन है। वैसा ही जैसा सुमित्रानंदन पंत की कविता कहती है, ‘वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान। निकलकर आंखों से चुपचाप, बही होगी कविता अनजान।’ सदमा उस प्रेम की अनुभूति है जो पीर के पर्वत सी हो जाने पर पिघलने की गुहार मांगती है। सदमा इसके निर्देशक बालू महेंद्रा की ही बनाई तमिल फिल्म मूंदरम पिराई की फ्रेम बाई फ्रेम हिंदी रीमेक है। दोनों फिल्मों में लीड रोल कमल हासन और श्रीदेवी ने ही किए। और, दोनों फिल्मों में सिल्क स्मिता ने स्कूल टीचर की ऐसी पत्नी का किरदार किया, जो यौवन के मद में है और मदन की तलाश में है।

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सदमा - फोटो : Social Media

निर्देशक बालू महेंद्रा ने इस फिल्म के दृश्यों में बहती दर्द की अंतर्धारा के बारे में खुद ही खुलाया किया था दक्षिण भारत के मशहूर टीवी शो कॉफी विद अनु में। इस शो में बालू ने बताया कि ये फिल्म उनके अपनी दूसरी पत्नी शोभा के रिश्तों का निचोड़ जैसा है। शोभा ने बालू महेंद्रा से विवाह के बाद खुदकुशी कर ली थी। बताते हैं कि शोभा तब सिर्फ 17 साल की थी। फिल्म देखते समय ऐसा लगता भी है कि एक पुरुष एक स्त्री पर अपना सब कुछ निछावर करने को उस सूरत में तैयार है जब वह स्त्री इस प्रेम के अथाह सागर में अपनी एड़ी तक नहीं भिगो पाई है। ये प्रेम की पराकाष्ठा है। प्रेम का परलंबन है। बालू महेंद्रा फिल्म के जरिए यही दिखाना चाहते रहे। श्रीदेवी और कमल हासन ने दक्षिण में तमाम फिल्में एक साथ की हैं, लेकिन हिंदी में सदमा ही उनकी जोड़ी की एक साथ फबने की एकमात्र बानगी  है।

फिल्म की नियति तमिल और हिंदी में एक जैसी नहीं रही। तमिल में ये फिल्म करीब साल भर तक सिनेमाघरों में मोहब्बत का मर्सिया पढ़ती रही। तमाम लोगों को इसका अंत बहुत ही ज्यादा दुखद लगा। ये सच भी लगता है। रेलवे स्टेशन पर सोमू का रेशमी के लिए ध्यानाकर्षण करने की कोशिश करना। उसके लिए बंदर की तरह तरह के स्वांग भरना। डिब्बे के पीछे पीछे दौड़ना और रेशमी के चेहरे पर ये सब देखकर साधारण भाव भी न आना। प्रेम में तिरस्कृत होने का ये अतिरेक है। लेकिन, प्रेमी अस्वीकृति को साधारण नहीं मानते। सोमू को भी ये असाधारण ही लगता है। सामान्य जिंदगी में इसके बाद प्रेमी या तेरे नाम का राधे बनकर जी पाता है या फिर मुकद्दर का हारा हुआ सिकंदर बनकर अपनी जान दे देता है। सदमा की कहानी भी ऐसी ही है। वेश्यालय में मिली रेशमी को सोमू बहाने से अपने साथ ले आता है। रेशमी दरअसल एक अच्छे खासे घर की बेटी है जिसके सिर में चोट लगने के बाद वह बच्चों जैसी हरकतें करने लगती है। सोमू का प्यार और दुलार उसे फिर से ठीक होने के मुहाने पर ले आता है, लेकिन सब कुछ वापस पा लेने के बाद रेशमी फिर से नेहलता तो बन जाती है, पर सोमू को भूल जाती है। सिर पर चोट लगने के बाद से लेकर वापस अपनी असली जिंदगी याद आने तक के बीच का वह सब कुछ भूल जाती है। सब कुछ।
 

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सदमा - फोटो : Social Media

बालू महेंद्रा फिल्म के तमिल संस्करण मूंदरम पिराई में कमल हासन के साथ अभिनेत्री श्रीप्रिया को लेना चाहते थे। श्रीप्रिया दूसरी फिल्मों में व्यस्त होने के कारण ये फिल्म स्वीकार नहीं कर पाईं। जब इसकी हिंदी रीमेक बनने को हुई तो कमल हासन ने उन्हीं दिनों रमेश सिप्पी की फिल्म सागर साइन की थी। फिल्म की हीरोइन डिंपल कपाड़िया थीं और उन दिनों का ये भी सच है कि डिंपल एक बार किसी हीरो के साथ काम कर लें तो वह फिर बार बार डिंपल के साथ ही काम करना चाहता था। कमल हासन ने फिल्म सदमा मे डिंपल को लाने के लिए खूब जोर लगाया। बालू महेंद्रा भी डिंपल से फिल्म को लेकर मिले। लेकिन, बताया गया कि उनके पास सदमा के लिए डेट्स ही नहीं थी। कहा ये भी जाता है कि इस फिल्म के लिए डिंपल ने अपनी फीस इतना ज्यादा बता दी कि बालू महेंद्रा ने उन्हें साइन करने का विचार ही त्याग दिया। इसके बाद फिल्म में श्रीदेवी आईं। कमल हासन तो फिल्म की ओरीजनल तमिल में कर ही चुके थे। उनको फिर से मनाना ज्यादा दिक्कततलब नहीं रहा। ओरीजनल फिल्म करते समय भी कमल हासन ने फिल्म की कहानी सिर्फ 20 मिनट के लिए ही सुनी थी और हां कर दी थी।
 

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सदमा - फोटो : Social Media

बालू महेंद्रा का सिनेमा दक्षिण में अपनी एक खास अंतर्धारा के लिए जाना जाता है। ये प्रवाह है कहानी के किरदारों की दैहिक पिपासा का मनोवैज्ञानिक चित्रण। ये मनोदशा उनके चरित्र कहते नहीं है, अपने कृत्यों से प्रदर्शित करते हैं। सदमा में भी कहानी का प्रस्थान बिंदु सोमू का वेश्यालय पर दैहिक सुख के लिए पहुंचना ही होता है। लेकिन उसे यहां अनुभूति प्रेम की होती है। जिस सुख लोक में सोमू यहां से अपनी रेशमी को लेकर जाता है, वहां सोनी है, दैहिक सुख की लालसा लिए एक विवाहिता। और, यहीं कहानी में दैहिक सुख का दूसरा सिरा लिए मिलता है बालू। सबके अपने अपने तरीके हैं इस चाहना को दर्शाने के और बालू महेंद्रा की खासियत यही है कि वह इस चाहना को दिखाने के लिए अपने कैमरे का प्रयोग किसी बाजीगर की तरह करते हैं। श्रीलंका में जन्मे और लंदन से लेकर पुणे के फिल्म इंस्टीट्यूट तक पढ़े लिखे बालू का कैमरा ही उनकी बातें कहने वाला उनका साथी है। 1977 में रिलीज हुई कमल हासन और शोभा की जिस ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म कोकिला के लिए बालू को बेस्ट सिनेमैटोग्राफी का पहला नेशनल अवार्ड मिला, वह उनकी कारस्तानी की पहली बानगी है। सिनेमा में सिनेमैटोग्राफर से निर्देशक बने लोगों की लंबी लिस्ट है, लेकिन इस लिस्ट के चंद शुरूआती नामों में बालू का नाम सबसे सम्मान के साथ लिया जाता है।

 

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इलैयाराजा और येसुदास - फोटो : Social Media

बालू महेंद्रा खुद लिखते भी थे तो उन्हें स्क्रीनप्ले की भी गहरी समझ रही। वह भाषाएं सीखने की ललक रखते थे। हिंदी को वह सिनेमा का सबसे बड़ा विस्तार मानते थे। श्रीलंका से भारत आकर सिनेमा सीखने के बाद लंबे समय तक वह मलयालम सिनेमा में काम करते रहे। अपनी मातृभाषा तमिल में काम करने के बाद उन्होंने तेलुगू सिनेमा का भी रसास्वादन किया लेकिन सदमा उनके कल्पनालोक का स्वप्न जैसा विस्तार रहा। इस विस्तार में उन्होंने अपनी मूल फिल्म मूंदरम पिराई के संगीतकार इलैयाराजा को भी साथ लिया। बालू की ही तरह इलैयाराजा का भी हिंदी से ये पहला संगम रहा। फिल्म के संवाद और गीत लिखे गुलजार ने। इसी फिल्म की एक म्यूजिक सिटिंग में ए आर रहमान की पहली मुलाकात गुलजार से हुई। रहमान तब इलैयाराजा के लिए की बोर्ड बजाया रते थे। इलैयाराया ने मूल फिल्म के दो गाने तो हू ब हू हिंदी में लिए लेकिन तमिल में के जे येसुदास और तेलुगू में एस पी बालासुब्रमण्यम  गाए गाने को जब हिंदी में सुरेश वाडेकर से गवाने की बारी आई तो इलैयाराजा ने इस गाने की धुन बदल दी।


 

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