हिंदी सिनेमा के पहले सुपरस्टार कहलाए राजेश खन्ना से मिलना, उनसे बातें करना अब बस यादें हैं। आठ साल पहले आज ही के दिन बांद्रा में आशीर्वाद बंगले के सामने मूसलाधार बारिश में उनके प्रशंसकों का हुजुम उनके अंतिम दर्शन को उमड़ पड़ा था। सड़क के दूसरी तरफ से तब मैं और मेरे तब के सहयोगी शरद अवस्थी इस पूरे वाकये का लाइव कर रहे थे। और, जैसे ही ब्रेक होता, हम लोग आपस में राजेश खन्ना के किस्सों पर बातें करते रहते। पास खड़े मेरे एक बहुत पुराने मित्र भी राजेश खन्ना में खासी दिलचस्पी रखते थे और वह भी इस किस्सागोई में शामिल हो गए।
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ऐसा ही एक किस्सा है राजेश खन्ना की लेटलतीफी का और फिर उससे मुक्ति पाने के लिए निकाले गए फिल्म ‘हाथी मेरे साथी’ के निर्माता के जुगाड़ का। हुआ यूं कि राजेश खन्ना की फिल्म ‘हाथी मेरे साथी’ की शूटिंग जब हो रही थी तो उन दिनों राजेश खन्ना का सितारा हिंदी सिनेमा के आसमान पर अपनी पूरी दमक के साथ चमक रहा था। फिल्में दर फिल्में हिट होती जा रही थीं और उनके घर से लेकर शूटिंग स्थल तक निर्माता निर्देशकों की लाइन लगी रहती उनसे मिलने के लिए।
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‘हाथी मेरे साथी’ के निर्माता सैंडो एम एम ए चिनप्पा देवर एक सर्कस चलाते थे और उन्होंने इस फिल्म के लिए राजेश खन्ना को मुंहमांगी रकम देकर साइन किया था। इसी रकम से राजेश खन्ना ने फिल्म अभिनेता राजेंद्र कुमार से उनका बंगला डिंपल खरीदा और बाद में इसका नाम बदलकर रख दिया, आशीर्वाद। ‘हाथी मेरे साथी’ एक तमिल फिल्म की रीमेक थी, ये तमिल फिल्म भी चिनप्पा देवर की ही बनाई हुई थी। फिल्म साइन करने के बाद राजेश खन्ना ने ही इसकी हिंदी पटकथा लिखने के लिए सलीम-जावेद को हिंदी सिनेमा का पहला बड़ा मौका दिया।
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फिल्म की पटकथा राजेश खन्ना को बहुत पसंद आई और देवर ने फिल्म की शूटिंग के लिए भव्य इंतजाम किए। देवर का दक्षिण भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में बड़ा नाम रहा है। उनकी बनाई कंपनी देवर फिल्म्स जानवरों के साथ फिल्म बनाने के लिए खूब मशहूर रही है। तो नारियल फूटा, पूजा हुई और शुरू हो गई फिल्म ‘हाथी मेरे साथी’ की शूटिंग। लेकिन, राजेश खन्ना अपनी आदत से मजबूर। सुपरस्टारडम का पूरा नखरा वह सीख चुके थे। अभिनेता रूपेश कुमार जैसे उनके सहयोगी उनको और सातवें आसमान में चढ़ाए रहते। रूपेश जब भी राजेश खन्ना से मिलते या उन्हें फोन करते, उनका तकिया कलाम तब हुआ करता, ‘ऊपर आका, नीचे काका’। यानी आसमान में अगर भगवान राज करता है तो धरती पर राजेश खन्ना। चापलूसों से घिरते जाने की अपनी इसी आदत ने राजेश खन्ना का स्वभाव बदलना शुरू कर दिया था।
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दो चार दिन तो चिनप्पा देवर ने देखा कि पूरी यूनिट इंतजार करती रहती है और राजेश खन्ना का कहीं पता तक नहीं होता। फिर धीरे धीरे उनका सब्र जवाब दे गया। एक दिन जैसे ही राजेश खन्ना सेट पर पहुंचे, चिनप्पा देवर ने पास खड़े एक आदमी को पकड़ा और उसे अपनी जांघों पर लिटाकर उसकी ठुकाई शुरू कर दी। देवर थे भी भारी भरकम शख्सीयत वाले। फिर ऐसा अगले दिन भी हुआ। उनके सेट पर पहुंचते ही ये हरकत लगातार होने लगी तो राजेश खन्ना का भी एक दिन माथा ठनका। उन्होंने फिल्म के निर्देशक एम ए थिरूमुगम से पूछा कि माजरा क्या है।