अभिनेता गोविंदा के गाने 'मय से न मीना से न साकी से' पर डांस करते वीडियो से भोपाल के एक प्रोफेसर साहब सोशल मीडिया स्टार हो गए हैं। 46 साल के इलेक्ट्रॉनिक्स के प्रोफेसर संजीव श्रीवास्तव असल जिंदगी में भी गोविंदा के फैन हैं।
सोशल मीडिया पर 'डांसिंग स्टार' बने अंकल, जानिए कहां गए 'नंबर वन हीरो' गोविंदा
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'खुदगर्ज' हिट रही...
फिल्म के इस हिट गाने को याद करते हुए गोविंदा ने एक मजेदार किस्सा सुनाया था। उन्होंने बताया, "मैं अपने भांजे को लेकर वैष्णो देवी की चढ़ाई पर गया था। उसे सर पर बैठाया था। इसके बाद से मेरे पैर सूज गए थे।"
"फिल्म की शूटिंग एक दिन के लिए टालनी पड़ी लेकिन अगले दिन हमने शूटिंग की और सिर्फ छह घंटों में नीलम और मैंने ये गाना शूट किया जो सुपरहिट हुआ।" "मैं और नीलम ने कई स्टेज शो में भी इस पर परफॉर्म किया। मैं ये गाना सिर्फ राकेश रोशन के प्रति अपने सम्मान के चलते शूट किया था।"
फिल्म 'खुदगर्ज' हिंदी में हिट रही और बाकी भाषाओं में इसका रीमेक भी बना। तमिल में खुद रजनीकांत ने इसमें काम किया, तेलुगू में वेंकटेश ने और उड़िया में मिथुन ने।
गोविंदा का परिवार
बात गोविंदा की चली है तो उनके पिता थे अपने जमाने के एक्टर अरुण कुमार अहूजा और मां थी निर्मला देवी। अरुण कुमार ने 40 के दशक में कोई 30-40 फिल्मों में काम किया।
महबूब खान ने उन्हें अपनी फिल्म 'औरत' में मौका दिया था जो बाद में 'मदर इंडिया' के नाम से महबूब खान ने दोबारा बनाई। उनकी मां निर्मला देवी बनारस की रहने वाली बेहद उम्दा शास्त्रीय गायिका थीं जो अपनी ठुमरी के लिए जानी जाती थीं और कई फिल्मों में गाया भी लेकिन एक फिल्म के निर्माण में जबरदस्त घाटे के बाद गोविंदा के पिता को अपना बंगला छोड़ मुंबई में विरार आकर रहना पड़ा और यहीं से उन्हें विरार का छोकरा का नाम मिला। घर की हालत ज्यादा अच्छी न थी।
गोविंदा कॉमर्स में ग्रेजुएट थे और नौकरी के लिए कई जगह गए और ताज में तो उन्हें नौकरी के लिए रिजेक्ट कर दिया गया। पर गोविंदा की किस्मत में तो हीरो बनना लिखा था। उन्हें 80 के दशक में पहले एलविन नाम की एक कंपनी का विज्ञापन मिला और जल्द ही 'तन-बदन' फिल्म में हीरो बनने का मौका। हीरोइन थी दक्षिण की खुशबू।
फिल्म 'लव 86' से जो उन्हें कामयाबी मिलनी शुरू हुई तो 90 का दशक आते-आते वो इंडस्ट्री में छा गए। 90 के दशक में तीनों खानों के अलावा अगर कोई था जो बॉक्स ऑफिस पर उनका मुकाबला कर रहा था तो वो गोविंदा थे।
कॉमिक टाइमिंग
एक समय था जब गोविंदा की साल में 8 से 9 फिल्मों तक रिलीज होती थी और पैसा भी कमाती थीं। उनकी कमाल की कॉमिक टाइमिंग, खास डायलॉग और पंच लाइन जो उनके लिए ही लिखे जाते थे, उनके रंग बिरंगे चटखदार कपड़े, कमाल का उनका डांस- ये सब काफी थे बॉक्स ऑफिस पर आग लगाने के लिए।
न तो वे आमिर खान की तरह चॉकलेटी हीरो थे, न सलमान की तरह उनकी बॉडी थी, न शाहरुख की तरह रोमांटिक इमेज न अक्षय कुमार जैस एक्शन। फिर भी गोविंदा का अपना अलग स्वैग था या कहिए उस समय उनका अच्छा वक़्त चल रहा था।
उनकी कॉमिक टाइमिंग ऐसी थी कि जब 1998 में फ़िल्म 'बड़े मियाँ छोटे मियां' आई तो बहुतों को ऐसा लगा कि एकबारगी गोविंदा ने अमिताभ बच्चन तक को पछाड़ दिया है।
कामयाब फ़िल्मों का सिलसिला...
वैसे 90 के दशक में फूहड़ता और डबल मीनिंग वाले गानों का आरोप भी उनपर लगा जिनपर आज के दौर पर अच्छा ख़ासा बवाल हो सकता है लेकिन ये गोविंदा ही थे जो बे सिर पैर वाले डायलॉग को भी अपनी ख़ासियत बना लेते थे -मसलन, "दुनिया मेरा घर है, बस स्टै़ंड मेरा अड्डा, जब मन करे आ जाना, राजू मेरा नाम है और प्यार से मुझे बुलाते हैं कुली नंबर वन।"
या फिर कादर ख़ान के साथ फिल्म 'दूल्हे राजा' में उनकी राजा भोज और गंगू तेली वाली बतकहियां। 'हीरो नंबर वन', 'हसीना मान जाएगी', 'दीवाना मस्ताना', 'कुली नंबर वन', 'साजन चले ससुराल', 'हद करदी आपने', 'शोला और शबनम'- वे 90 के दौर की हिट मशीन थे।
निर्देशक करते थे घंटों इंतजार
निजी ज़िंदगी की बात करें तो गोविंदा ने करियर के शुरुआती दिनों में ही सुनीता से लव मैरिज की। लेकिन एक साल तक उन्होंने इस शादी को छिपाए रखा क्योंकि उन्हें लगता था कि शायद इससे उनकी लोकप्रियता पर असर पड़ेगा। लेकिन ऐसा कुछ नहीं था।
वैसे गोविंदा अपनी लेट लतिफ़ी के लिए भी जाने जाते हैं और निर्देशक कई बार घंटों इतज़ार किया करते थे। 'पान सिंह तोमर' बनाने वाले तिग्मांशु धूलिया एक बार फ़िल्म शूटिंग के लिए लंदन आए हुए थे। उनसे मुलाक़ात हुई तो उन्होंने बताया कि वे गोविंदा के बड़ै फ़ैन हैं और वो एकमात्र स्टार हैं जिनके साथ काम करने के लिए वे उनके आगे पीछे घूमे।