हिंदी की दो फिल्मों ‘लव यात्री’ और ‘मित्रों’ में प्रतीक गांधी ने काम किया लेकिन शायद ही उन्हें किसी ने तब नोटिस किया हो लेकिन पिछले साल रिलीज हुई वेब सीरीज ‘स्कैम 1992’ ने उन्हें ओटीटी का सुपरस्टार बना दिया। प्रतीक की बतौर हीरो पहली हिंदी फिल्म ‘भवाई’ रिलीज की कतार में हैं। शनिवार को पूरा दिन लोगों ने प्रतीक की वेब सीरीज का एक साल पूरा होने का जश्न मनाया। और, प्रतीक ने भी अपनी इस शोहरत के लिए सीरीज के निर्देशक हंसल मेहता का दिल से आभार जताया। प्रतीक गांधी से ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल ने ये लंबी बातचीत हाल ही में की। इस बातचीत में प्रतीक ने 14 साल की मेहनत के बाद मिली इतनी बड़ी सफलता, इस सफलता में अपने माता पिता के योगदान और अपन जीवन दर्शन के बारे में खुलकर बातचीत की। इस इंटरव्यू के कुछ अंश ‘अमर उजाला’ अखबार के नियमित स्तंभ ‘बिंदास’ में शनिवार को प्रकाशित हो चुके हैं। ‘अमर उजाला डॉट कॉम’ पर पढ़िए ये पूरा एक्सक्लूसिव इंटरव्यू।
Sunday Interview: प्रतीक गांधी बोले, ये तय कर पाना कि क्या सही है और क्या गलत, सबसे बड़ी मुश्किल है
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प्रतीक, बीते साल के डिजिटल के तकरीबन सारे पुरस्कार जीतने के बाद का एहसास कैसा है?
एक एक्टर की लाइफ में ये बहुत बड़ा माइलस्टोन होता है जब इतना प्यार मिले दर्शकों से इतना भरोसा मिले मेकर्स से कि लोग आपके साथ और काम करना चाहें। दर्शक आपको और देखना चाहें। मुझे लगता है कि एक एक्टर शायद इसी समय के लिए जीता और काम करता है। मैं अपने आप को बहुत भाग्यशाली मानता हूं कि मुझे इस लाइफटाइम में ये मौका मिला और ये मैं देख पा रहा हूं और अनुभव कर पा रहा हूं।
आप 2005 में थिएटर और 2006 में गुजराती फिल्मों में आ गए, बीच में ‘लवयात्री’ और ‘मित्रों’ जैसी हिंदी फिल्मों में भी आप दिखे। लेकिन, किसी हिंदी फिल्म का लीड हीरो बनना, उसके लिए तैयार होना, उसके लिए आपको 14 साल वाकई लग गए, आपका वनवास अब जाकर पूरा हुआ फिल्म ‘भवाई’ से?
मैं यही मानता हूं कि भगवान ने शायद इसी हिसाब से मेरे लिए प्लान तैयार किया था। मेरे लिए लिफ्ट नहीं बनाई। मुझे हर एक सीढ़ी चढ़कर ही जाना था ऊपर। जैसे आपने कहा कि 14 साल का मेरा समय जो था वह वनवास जैसा था, मेरे लिए ये मेरी तैयारी का समय था, कि मैं इतना तैयार होकर आऊं कि जब मुझे ‘स्कैम’ जैसा कुछ मिले तो मैं उसे पूरी मेहनत से पूरी हिम्मत से परफॉर्म कर पाऊं।
‘स्कैम 1992’ में आपको रोल बहुत कुछ हर्षद मेहता से प्रेरित है, तो हंसल मेहता का विजन कितना था इसमें और कितनी प्रतीक गांधी की मेहनत?
मैं तो पूरी क्रेडिट दूंगा हंसल सर को। राइट फ्रॉम द सेलेक्शन, उन्होंने मेरे साथ ‘स्कैम’ बनाना भी चाहा वही बहुत बड़ा डिसीजन था क्योंकि वो मुझे उस किरदार में देख पाए। उन्होंने ऑडिशन भी नहीं देखा था मेरा। उन्होंने सिर्फ मेरी एक गुजराती फिल्म देखी थी जिसे नेशनल अवार्ड मिला है 2016 में। मुझे एक दो बार नाटकों में देखा है और शायद उसी के चलते उन्होंने मन बनाया कि मैं इस किरदार को करूंगा। दूसरे जिस तरह से कहानी को लिखा गया, उसको एडिट किया गया तो मैं उनसे कहता था कि सर, शायद मैं सालों से ऐसे ही काम करना चाहता था। चाहे स्टेज हो या गुजराती सिनेमा लेकिन पहली बार मैं अच्छे से कैप्चर हुआ कैमरे में।
तो हर्षद मेहता का किरदार गुजराती, उसका निर्देशक गुजराती और उसका एक्टर भी गुजराती..ये सारी चीजें भी काम आईं उस कैरेक्टर को निभाने में?
मुझे लगता है कि बहुत हद तक काम आई हैं ये सारी चीजें इस किरदार को निभाने में क्योंकि हर एक रीजन का हरेक भाषा का अपना एक फ्लेवर होता है फिर चाहे वो बोलने का हो, उस किरदार की बारीकियां निकालने का हो, हेल्प तो मिली ही..