अबू धाबी रवाना होने से पहले अमर उजाला से बोली 'बबली', कोशिश करने वालों की वाकई हार नहीं होती
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सबसे बड़ा बदलाव यह है कि लोगों को मेरा काम दिखा। मुझे शो में अपने किरदार के लिए काफी अधिक प्यार मिला है। अच्छे वजह से आपको लोगों की तारीफ तो मिलती ही है साथ ही दूसरे मौके खुल जाते हैं और कई तरह के ऑफर्स आने लगते हैं।
'बंटी और बबली' तक पहुंचने का आपका सफरनामा क्या है?
2013 में मैंने अपने कॉलेज के दौरान एक ब्यूटी प्रतियोगिता में भाग लिया था। मुझे उस प्रतियोगिता में भाग लेने की वजह से क्लास में उपस्थिति मिल रही थी तो मैंने बस उसी लिए उस प्रतियोगिता में भाग लिया। फिर मुझे पता चला कि ये तो मिस इंडिया के स्तर की प्रतियोगिता है जिसके बाद मैंने उसके लिए खूब मेहनत की और वह प्रतियोगिता जीत ली। इसके बाद मैंने एक विज्ञापन किया जिसके चलते मेरे पास लगातार लोगों के फोन आने लगे। इस बीच मैंने 'प्यार का पंचनामा 2' और 'बाजीराव मस्तानी' और 'सोनू के टीटू की स्वीटी' में सहायक निर्देशक के तौर पर भी काम किया।
'फॉरगॉटन आर्मी' एक वॉर ड्रामा है। इसमें मेरा काफी संजीदा किरदार था। उसमें एक्शन बहुत किया है साथ ही जज्बात भी उस किरदार में बहुत अधिक है। 'बंटी और बबली 2' इससे पूरी तरह अलग है। इसमें कॉमेडी है, मसाला है, गाने है, बहुत अलग किरदार और कहानी है। मेरे लिए यह बहुत अच्छा मौका है।
सिनेमा जगत में आपके जानने वाला कोई नहीं है। मौके तलाशते हुए कितना संघर्ष करना पड़ा?
मेरे पिता शैलेश वाघ बिल्डर हैं, मेरी मां नम्रता वाघ इंटीरियर डिजाइनर हैं। मेरे परिवार का कोई भी सदस्य फिल्मी दुनिया से नहीं है। इस वजह से मेरी राह काफी मुश्किल रही। मुंबई में काम की तलाश में पहुंचने वालों को मौका मिलने में बरसों लग जाते हैं। मैं भी 2014 से कोशिश कर रही हूं और अब 2020 में मुझे अच्छा मौका मिला है। मुझे तमाम लोगों ने रिजेक्ट भी किया है। लेकिन, असली संघर्ष तभी शुरू होता है जब लोग आपको नकारते हैं। अगर आप एक बार ठान लेते हैं तो कुछ भी मुश्किल नहीं होता है। मेरा मानना है कि कोशिश करने वालों की वाकई कभी हार नहीं होती।
मुझे 'बाजीराव मस्तानी' और 'जोधा अकबर' जैसी पीरियड ड्रामा फिल्में बहुत पसंद है। मुझे ऐसी फिल्में देखने में भी बहुत अच्छा लगता है और मैं चाहती हूं कि मुझे भी इस तरह का किरदार मिले।