अभिनेता सिद्धार्थ मल्होत्रा हिंदी सिनेमा में कामबायी के 10 साल पूरे कर रहे हैं। इन दिनों वह ओटीटी पर रोहित शेट्टी के साथ ‘इंडियन पुलिस फोर्स’ नाम की वेब सीरीज कर रहे हैं। अपने मेंटॉर करण जौहर की कंपनी धर्मा प्रोडक्शंस के लिए फिल्म ‘योद्धा’ की शूटिंग जारी है और रश्मिका मंदाना के साथ बनी उनकी फिल्म ‘मिशन मजनू’ रिलीज की कतार में हैं। दिवाली पर वह निर्देशक इंद्र कुमार की फिल्म ‘थैंक गॉड’ में अभिनेता अजय देवगन के साथ नजर आने वाले हैं। इस फिल्म को लेकर सिद्धार्थ मल्होत्रा से ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल की ये खास मुलाकात हुई। आइए शुरू करते हैं सवालों और जवाबों का सिलसिला...
Sidharth Malhotra: फ्लॉप फिल्मों के सवाल पर बोले सिद्धार्थ, मैंने इनके निर्देशकों की क्षमता पर भरोसा किया
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‘थैंक गॉड’ इन दो शब्दों का आपके लिए क्या मायने हैं? और, कितना इनका प्रयोग करते हैं इनका अपने दैनिक जीवन में?
मैं तो बहुत करता हूं। जो भी मिला हमको जीवन में, उसके लिए हमें हमेशा शुक्रगुजार होना चाहिए। मेरे लिए तो ये दो शब्द ‘थैंक गॉड’ बहुत ही खास हैं। जो मेरी अब तक की यात्रा रही है और जो सपने लेकर मैं दिल्ली से आया था और जिन्हें मैं आज जी रहा हूं, उन सबके लिए मैं ईश्वर को धन्यवाद देता हूं। जीवन तो खैर उतार चढ़ाव भरा रहेगा ही, यही जीवन भी है लेकिन जहां से मैंने शुरुआत की थी, उससे बेहतर स्थिति में हूं, उसके लिए दिल से ‘थैंक गॉड’ हर दिन निकलता है।
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आपकी पहली फिल्म ‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर’ 10 साल पहले अक्टूबर महीने में ही रिलीज हुई थी? अगले 10 साल के लिए क्या सपना देखा है?
जी बिल्कुल सही कह रहे हैं आप। इसी महीने मेरी पहली फिल्म रिलीज हुई थी। ये 10 साल का जो सफर रहा है, उसमें वाकई ईश्वर की बहुत कृपा रही। मेरी पिछली फिल्म ‘शेरशाह’ को लोगों ने इतना प्यार दिया। अब ये फिल्म ‘थैंक गॉड’ रिलीज होने जा रही है। अगले 10 साल में मुझे बहुत कुछ करना है। एक दौर था जब कलाकार एक दिन में दो-दो, तीन-तीन शिफ्ट में काम किया करते थे। सिनेमाघरों में एक ही समय में एक कलाकार की कई कई फिल्में लगी रहती थीं। अब हम हर फिल्म के लिए एक नया रूप धरते हैं, एक बार में एक ही फिल्म कर पाते हैं। फिर भी मैं कोशिश करूंगा कि अगले 10 साल में खूब सारा काम करूं और खूब अच्छा काम करूं।
बात आपकी सिनेयात्रा के 10 साल की निकल ही पड़ी है तो मैं जानना चाहता हूं कि ये यात्रा शुरू करने से पहले आपके क्या सपने थे?
जी, सपने तो वाकई बहुत सारे थे और शुरू में ही ये सपने टूटे भी। 21-22 साल का था जब मुझे फिल्मों में पहला मौका मिला एडलैब्स और अनुभव सिन्हा की फिल्म में। दिल्ली में मेरा ऑडीशन हुआ। मुझे फिल्म के लिए साइन कर लिया गया। मैं मुंबई आ गया। आठ महीने तक इस फिल्म के लिए प्रशिक्षण लिया और फिर एक दिन मुझे बताया गया कि ये फिल्म अब नहीं बन रही है। मैंने सारे दोस्तों को, घरवालों को, रिश्तेदारों को सबको बता दिया था कि मेरी फिल्म शुरू होने जा रही है।
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और, इसके बावजूद आप यहां तक आ गए तो इसमें किसका योगदान सबसे ज्यादा मानते हैं?
कह सकते हैं कि उस पहले झटके के बाद ही मेरी असली संघर्ष यात्रा शुरू हुई। पहले घर ढूंढो, फिर ऑडीशन होने वाली जगहें ढूंढो। हर ऑडीशन के लिए 30-40 लोग तो आते ही हैं। सब एक से एक काबिल और धुरंधर लोग होते हैं और ऐसे ही मौके पर एक बात जो किसी एक को ये मौका दिला देती है, वह है किस्मत और इसके लिए हमें हमेशा ईश्वर का शुक्रगुजार होना चाहिए। मेरा यह पक्का भरोसा रहा है कि इंसान जैसे कर्म करता है, उसका फल उसे इसी जीवन में भुगतना ही होता है। आप जो भी करोगे, किसी दिन वह घूमकर आप तक आएगा जरूर। सच पूछिए तो मेरी तीसरी फिल्म ‘एक विलेन’ की कामयाबी को मैं ईश्वरीय चमत्कार ही मानता हूं। हममें से किसी को उम्मीद नहीं थी कि ये फिल्म इतनी बड़ी हिट साबित होगी।