सुनील दत्त को जितनी कामयाबी फिल्मों में मिली, उतने ही कामयाब वो राजनीति में भी रहे। हालांकि बॉलीवुड में उन्होंने ऐसा भी दौर देखा जब उन्हें फिल्में नहीं मिल रही थीं। सुनील दत्त आज ही के दिन यानी 6 जून 1929 को झेलम में पैदा हुए थे, जो अब पाकिस्तान में है। सुनील दत्त ने अपने छह दशक के लंबे फिल्मी करियर में 50 से ज्यादा फिल्मों में अभिनय किया था।
फिल्मों में आने से पहले रेडियो में नौकरी करते थे सुनील दत्त, सफल अभिनेता होने के बावजूद जिंदगी भर करना पड़ा संघर्ष
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
साल 2005 में सुनील दत्त ने दुनिया को अलविदा कह दिया लेकिन सुजाता, मदर इंडिया, रेशमा और शेरा, मिलन, नागिन, जानी दुश्मन, पड़ोसन, जैसी फिल्मों के लिए वो हमेशा याद किए जाते रहेंगे। अभिनय के साथ ही उन्होंने फिल्म निर्माण और निर्देशन में भी हाथ आजमाए। सुनील दत्त ने 1964 में एक प्रयोगधर्मी फिल्म 'यादें' बनाई थी। इस फिल्म का नाम सबसे कम कलाकार वाली फिल्म के रूप में गिनीज बुक ऑफ रिकॉर्ड में दर्ज है। इस फिल्म के आखिरी सीन में नरगिस एक छोटे से किरदार में नजर आई हैं। बाकी फिल्म में सुनील के अलावा कोई और एक्टर नहीं है। इस फिल्म की कहानी लिखी थी सुनील दत्त की पत्नी नरगिस दत्त ने। फिल्म में एक ऐसे पति की कहानी है जिसकी पत्नी उसे छोड़कर चली गई है और वो उससे जुड़ी बातों को याद करता है।
संघर्ष
वैसे उनका निजी जीवन काफी संघर्ष भरा रहा था। सुनील दत्त से जुड़ी निजी यादों को साझा करते हुए वरिष्ठ फिल्म पत्रकार जयप्रकाश चौकसे कहते हैं, "सुनील दत्त ने पूरे जीवन असंभव लड़ाइयां लड़ी हैं। अपने बेटे को ड्रग्स की लत छुड़ाने और पत्नी का इलाज कराने के लिए वो दो बार अमरीका गए। इस दौरान वो बहुत परेशान रहे। चौकसे कहते हैं, "उनकी मुसीबतें कभी कम न हुईं। कैंसर और ड्रग्स ने उन्हें बहुत लाचार और दुखी कर दिया था। ड्रग्स और कैंसर के प्रति लोगों में जागरुकता लाने के लिए उन्होंने दो बार मुंबई से चंडीगढ़ तक पदयात्रा की।"
चौकसे बताते हैं कि 'सुनील दत्त पर्दे पर खलनायक की भूमिका नहीं निभाना चाहते थे। जब 1971 से 1975 तक कोई फिल्म नहीं मिलने से उनका करियर लड़खड़ाने लगा तब अभिनेत्री साधना और आरके नय्यर ने उन्हें 'गीता मेरा नाम' फिल्म में काम करने को कहा। लाख समझाने के बाद उन्होंने पहली बार खलनायक की भूमिका निभाई। उसके बाद से उन्हें फिर से फिल्में मिलनी शुरू हो गईं।"
पंढरी जुकर 1958 से 2005 तक सुनील दत्त के मेकअप मैन और फोटोग्राफर रहे थे। सुनील दत्त को याद करते हुए पंढरी दादा ने बताया था कि 'दत्त साहब दूसरों की बहुत मदद किया करते थे। मेरी पत्नी को हिंदुजा अस्पताल में भर्ती ना करने पर खुद सुनील दत्त साहब मेरी पत्नी को अस्पताल लेकर गए थे उन्होंने सभी डॉक्टरों को मेरी पत्नी का बेहतर इलाज करने की गुजारिश की थी और तो और उन्होंने अस्पताल का पूरा खर्चा उठाया हालांकि मेरी बीवी बच नहीं सकी, इसका उन्हें बहुत दुख हुआ था।"
''अगर कोई काम ना हो रहा हो तो सुनील दत्त को बहुत गुस्सा भी आया करता था लेकिन उन्हें मजाक करने की भी खूब आदत थी।''