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'सांड की आंख' के लिए ऐसे हुई तापसी की ट्रेनिंग, EXCLUSIVE इंटरव्यू में कंगना पर कही ये बात

Sat, 19 Oct 2019 07:17 AM IST
Mishra Mishra मुंबई टीम, अमर उजाला
मुंबई टीम, अमर उजाला Published by: Mishra Mishra Updated Sat, 19 Oct 2019 07:17 AM IST
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taapsee pannu exclusive interview with amar ujala
Taapsee Pannu - फोटो : मुंबई टीम, अमर उजाला
तापसी पन्नू हिंदी सिनेमा की उन चंद अभिनेत्रियों में से हैं, जो लगातार अपने किरदारों से शोहरत बटोर रही हैं। पिंक, सूरमा, मुल्क, बदला और मिशन मंगल के बाद अब बारी है फिल्म सांड की आंख की। तापसी से अमर उजाला ने की ये खास मुलाकात।




सूरमा के बाद सांड की आंख आपके करियर की अगली बायोपिक है, रिलीज से पहले घबराहट तो आपको भी होती होगी?
अब तो मुझसे इस फिल्म की रिलीज का इंतजार भी नहीं हो रहा। हर कलाकार की तरह मैं भी चाहती हूं कि मेरी हर फिल्म सुपरहिट हो। इस फिल्म से जो खास आकांक्षाएं हैं वे ये हैं कि लोग याद रखें हमने कुछ अलग किया। मेरा यही मानना है कि हर बार कुछ न कुछ हटकर करना चाहिए। ज्यादा से ज्यादा क्या होगा, फेल हो जाऊंगी पर लोग याद रखेंगे कि कुछ अलग करने की कोशिश की थी।
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Taapsee Pannu - फोटो : मुंबई टीम, अमर उजाला

कितना मुश्किल रहा एक 60 साल के सच्चे इंसान का किरदार निभाना?
बहुत मुश्किल था। अपने उम्र से कम उम्र के किरदार निभाना काफी आसान होता है क्योंकि वह उम्र आप जी चुके होते हो। आपको पता है उस उम्र के लोग क्या सोचते हैं उनके विचार क्या होते हैं। मेरी मां भी साठ साल की हैं। उनको मन में रखकर मैं यह किरदार करती तो भी गलत होता क्योंकि मेरी मां कभी गांव में नहीं रहीं। उन्हें नहीं पता वहां क्या क्या होता है। मैंने सांड की आंख की शूटिंग से पहले करीब ढाई महीने ट्रेनिंग ली। गाय का दूध कैसे निकालते हैं, मक्खन कैसे बनाते हैं, चारा काटना, खेतों के बीच काम करना और भी बहुत सी चीज़ें हैं। अपने किरदार को अच्छे से अच्छे तरीके से निभाने के लिए इतना प्रशिक्षण तो जरूरी है।

चंद्रो दादी और प्रकाशी दादी दोनों ही आपकी तारीफ कर रही हैं। ऐसा क्या किया आपने?
करीब एक महीने तक मैं चंद्रो दादी के घर में ही रुकी थी। उन्हीं के बिस्तर पर सोती थी। एक महीना किसी के घर पर रहना कम नहीं होता। वहां गीजर नहीं है पर मेरे उठने से पहले हमेशा मुझे गरम पानी मिलता था। मैने कई बार कहा कि मैं कर लूंगी पर किसी ने मुझे कुछ नहीं करने दिया। मैं उनके परिवार में अच्छे से घुल मिल गई थी।

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Taapsee Pannu - फोटो : मुंबई टीम, अमर उजाला

इस फिल्म को आप अपनी मां के नाम करना चाहती हैं। क्या सोचकर आपने ऐसा कहा होगा?
यह सच में काफी बड़ी बात है क्योंकि ये उतनी बड़ी फिल्म भी है। मैने जब यह कहानी सुनी। मेरे दिमाग में एक ही चेहरा घूमता रहा, मेरी मां का। कहानी सुनने के बाद और धीरे धीरे इसपर काम शुरू करने के बाद मुझे मेरी मां की याद और भी ज्यादा आने लगी। जिस प्रकार इस कहानी में दादियां अपने बच्चों औऱ पोते पोतियों के लिए कितना कुछ कुर्बान करती हैं, उसी प्रकार हमारी मांए भी करती आई हैं। अपने लिए दो रुपये की चीज़ नहीं खरीदेंगी पर अपने बच्चों के लिए किसी चीज़ की कसर नहीं छोड़तीं। इसी विचारधारा को मैंने इस किरदार में लाने की कोशिश की और इसीलिए मैं यह फिल्म अपनी मां के नाम करती हूं।

महिला सशक्तीकरण के मायने आप क्या समझती हैं, क्या ये बात ही महिलाओं के खिलाफ नहीं जाती कि हम उन्हें मजबूत करने की बात करते हैं, मतलब कि हम पहले ही मान लेते हैं वे कमजोर हैं?
मेरे घर में तीन औरतें हैं और एक पापा हैं। मैं, मेरी बहन और मां, हमारी ही चलती है घर में। तो घर पर तो ऐसा कुछ कभी महसूस नहीं हुआ। जो भी और जब भी पता चला वह घर के बाहर आकर पता चला। जब बड़ी होने लगी तो पता चला कि लोगों की सोच कैसे होती है। बचपन में मैं बहुत खेला कूदा करती थी, लड़कों के साथ ही ज्यादा खेलना होता था। धीरे धीरे मेरा घर से बाहर निकलना समय अनुसार होने लगा। क्योंकि लड़की जब थोड़ी बड़ी हो जाती है, तब उसे घर में ज्यादा रहना होता है। साथ ही साथ लड़कियों के ज़िंदगी के निर्णय वह खुद नहीं लेती, उनके लिए कोई और निर्णय लेता है। पर लड़का जो चाहे वो कर सकता है। पर जब मैं यहां आ गईं, तो व्यवसाय अनुसार चीज़े बदल गईं। एक लड़की होने के कारण कई तरह के किरदार मैं नहीं निभा सकती हूं। पर हां मैं इन बातों में विश्वास नहीं करती। अभिनेता की फीस के मामले में आज भी चीज़ें प्रचलित हैं, एक अभिनेत्री की फीस एक अभिनेता से हमेशा कम ही होती है।

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Taapsee Pannu - फोटो : मुंबई टीम, अमर उजाला

महिलाओं की बायोपिक इधर खूब बन रही हैं, मणिकर्णिका, शकुंतला, साइना नेहवाल, पीवी सिंधू और भी कई नाम हैं। इस बदलाव को आप कैसे देखती हैं?
मुझे तो यह बदलाव बहुत अच्छा लग रहा है। कहानी चाहे मर्द की हो या किसी महिला की, सुनाने लायक दोनों होती हैं। आप को एक बायोपिक की कहानी में क्या देखने को मिलता है, पैसों की तंगी, अवसरों की दिक्कतें, पर एक महिला के साथ उसके महिला होने के कारण जुड़ी दिक्कतें भी आ जाती हैं। उसके संघर्ष और इस बीच आई कठिनाइयों को दर्शाना और भी अच्छा हो जाता है। तब जाकर यह कहानी सुनाने लायक बनती है। इसीलिए महिलाओं पर आजकल ज्यादा बायोपिक्स बन रही हैं। इतिहास ने तो महिलाओं को ज्यादा मौका नहीं दिया, शायद इस तरह हम उन महिलाओं की कहानी बता पाएं जिन्होंने बड़े काम किए हैं।

पहले मनमर्जियां, अब सांड की आंख और इसके बाद अनुराग कश्यप के साथ एक और फिल्म आप कर रही हैं, वह क्या है?
ये एक साइंस फिक्शन फिल्म है, जो काफी हद तरह सुपरनेचुरल भी है। थ्रिलर भी है। सच कहूं तो उस फिल्म को किसी शैली में डालना बड़ा कठिन है क्योंकि इस तरह का सिनेमा भारत में कभी नहीं बना है। अनुराग कश्यप कर रहे हैं कुछ तो अलग होगा ही।

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Taapsee Pannu - फोटो : मुंबई टीम, अमर उजाला

एक और फिल्म कर रहीं हैं आप, थप्पड़?
ये आदमी और औरत के संबंधों की कहानी है। इसमें आपको तमाम दिग्गज कलाकार दिखेंगे। रत्ना पाठक शाह हैं, तन्वी आजमी हैं, एक 12 - 13 साल की लड़की है, दीया मिर्जा भी हैं। मेरे अलावा सात महिलाएं और हैं फिल्म में। सभी की कहानी एक जगह आकर मेरी कहानी से मिलती है।

कंगना रनौत, उनकी बहन रंगोली और आप के बीच क्या दिक्कतें हैं?
यह सवाल तो आप उन्हीं से पूछिए। मुझे कुछ नहीं पता इस बारे में कि वे ऐसा क्यों कर रही हैं। कंगना एक अच्छी अभिनेत्री हैं। उनको मैं पहले से जानती भी नहीं हूं। हालांकि मेरा अपना नजरिया है जीवन का। मैं मानती हूं कि जिन लोगों के कहने से मेरी निजी ज़िंदगी प्रभावित नहीं होती, उन पर तवज्जो देने की जरूरत ही क्या है। मैं उनसे ये कहना चाहती हूं कि आपके कुछ भी कहने से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता।



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