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स्वरा के ओपन लेटर पर पहली बार बोली टीम भंसाली, पद्मावती के जौहर पर बड़ा खुलासा

Tue, 30 Jan 2018 08:12 AM IST
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला Updated Tue, 30 Jan 2018 08:12 AM IST
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team bhansali attacks on swara bhaskar for padmaavat johar controversy

हाल ही में फिल्म एक्ट्रेस स्वरा भास्कर ने आरोप लगाया था कि संजय लीला भंसाली की फिल्म 'पद्मावत',  जौहर और सती प्रथा को मंडिमामंडित करती है। एक्ट्रेस के मुताबिक इस फिल्म के जरिए महिलाओं की एक दर्दनाक तस्वीर पेश की गई है। स्वरा ने कहा है कि भंसाली की इस फिल्म को देखकर ऐसा लगता है कि महिलाओं का चित्रण सिर्फ 'वजाइना' के तौर पर ही सीमित है। एक्ट्रेस ने पद्मावत के डायरेक्टर को एक ओपन लेटर लिखकर अपना विरोध जताया था।


वहीं अब टीम भंसाली ने इस लेटर पर पलटवार किया है। भंसाली की फिल्म 'गोलियों की रासलीला राम-लीला' के सह-लेखक सिद्धार्थ और गरिमा की जोड़ी ने एक्ट्रेस स्वरा भास्कर के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। इन दोनों ने भी एक ओपन लेटर लिखकर अपनी बात रखी है। लेटर का शीर्षक रखा गया है -An open letter to all the offended vaginas। इस खुले खत में स्वरा के उस बयान पर तीखा विरोध जताया गया है जिसमें उन्होंने कहा था- 'मैं खुद को महज एक वजाइना के तौर पर सीमित महसूस कर रही हूं।'

team bhansali attacks on swara bhaskar for padmaavat johar controversy

सिद्धार्थ और गरिमा के ओपन लेटर में फेमिनिज्म की परिभाषा बताई गई है। उन्होंने लिखा है कि स्त्री के जिस अंग का स्वरा ने जिक्र किया है उसमें जीवन देने की क्षमता है। कोई भी पुरुष जितनी कोशिश कर ले वह ऐसा कुछ भी नहीं कर सकता। दोनों लेखक तंज कसते हुए कहते हैं कि इंडस्ट्री में कुछ ऐसे फिल्म मेकर्स, आर्टिस्ट और एक्टर हैं, जिन्हें ऐसा लगता है कि आधुनिक सिनेमा में वही फेमिनिज्म के अगुआ है। सिद्धार्थ और गरिमा ने कुछ फिल्मों के दृश्यों का भी जिक्र किया है। 

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आगे लेटर में लिखा है कि रानी पद्मावती द्वारा रेप के बजाए जौहर को ज्यादा तरजीह देने का फैसला उनका अपना था। सही हो, गलत हो, कमजोर हो या सशक्त, फैसला चाहे जैसा भी हो, इस पर राय देने के लिए सभी स्वतंत्र हैं। उस वक्त जिन महिलाओं ने जौहर करने का फैसला लिया उन्हें क्यों छोटा या गुनहगार महसूस कराया जाए क्योंकि उन्होंने गुलामी के जीवन और पीटकर मार दिए जाने के बजाए अपनी हिफाजत का यह रास्ता चुनना सही समझा। 700 साल पहले के वक्त को लेकर इस आधार पर क्यों किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जाए कि 'आज मैं क्या करती'? यह पद्मावती का अपना फैसला था कि उसे खिलजी के सामने नहीं झुकना था। यह उसका अपना चुनाव था, ऐसे में 'रेप के बाद भी जिंदगी है' का कोई सवाल ही नहीं उठता।

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लेटर में आगे लिखा है कि यह फिल्म 13वीं शताब्दी की कहानी बताती है, जब महिलाएं रेप किए जाने के बजाए खुद मौत चुनना पसंद करती थीं। फिल्मों में फेमिनिज्म महिलाओं को सिगरेट शराब पीते और जुआ खेलते दिखाने तक सीमित रह गया है। आगे लिखा है कि फेमिनिज्म का मतलब यह नहीं कि महिलाएं वही करें जो पुरुष कर रहे हैं। लेटर के आखिर में स्वरा पर तंज कसते हुए कहा गया है कि 'जो लोग फिल्म देखने के बाद खुद को वजाइना महसूस कर रहे हैं, उन्हे आगे भी ऐसा ही महसूस करते रहना चाहिए क्योंकि वे स्त्री के इस अंग की अहमियत कभी नहीं समझेंगे। इसमें जीवन देने और दुनिया को चलाने की ताकत है।'

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