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Bhimsen Joshi: इन सूत्रों को अपनाकर भारत रत्न बने पंडित भीमसेन जोशी, गुरु की कृपा को माना असली इनाम

Thu, 04 Feb 2021 11:27 AM IST
प्रतीक्षा राणावत मुंबई ब्यूरो, अमर उजाला
मुंबई ब्यूरो, अमर उजाला Published by: प्रतीक्षा राणावत Updated Thu, 04 Feb 2021 11:27 AM IST
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Ten commandments of Bhimsen Joshi to become successful in any professional career bharat ratan
भमसेन जोशी - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

आधुनिक भारत के तानसेन कहे जाने वाले पंडित भीमसेन जोशी के गले से निकले पहले सुर 4 फरवरी, 1922 को कर्नाटक के गडग जिला के एक छोटे से गांव में सुने। पैदा होते ही भीमसेन जोशी रोए भी तो राग में। ये बच्चा आगे चलकर भारत रत्न बना। यहां की मिट्टी के लिए गौरव बना । शास्त्रीय संगीत से लगाव और सीखने की चाहत में कम उम्र में ही घर छोड़ देने वाले इस महान गायक ने गुरु की तलाश में ग्वालियर से जालंधर तक का सफ़र तय किया। जालंधर में विनायक राव पटवर्धन से एक समारोह के दौरान हुई मुलाकात में भीमसेन को गुरु सवई गंधर्व से मिलने की सलाह मिली। अपनी कड़ी मेहनत की वजह से पंडित जोशी ने वह कर दिखाया जो बहुतों के लिए एक सपना मात्र था। किराना घराने से जुड़े इस महान गायक ने इस खयाल तर्ज़ के संगीत को देश-विदेश में लोकप्रिय बना दिया। आज उनकी जयंती पर चलिए आपको ले चलते हैं, भीमसेन जोशी के संगीत सफर पर...

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भीमसेन जोशी - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

गुरु की कृपा को माना असली इनाम
एक टीवी शो के दौरान जब पंडित जी से पूछा गया कि आपको भारत के अनेक अवॉर्ड और खिताब मिल चुके हैं, आपके लिए इनके क्या मायने हैं? इसपर पंडित भीमसेन जोशी ने कहा था कि जैसे गुल बढ़ते हैं वैसे ही यह खिताब भी बढ़ते रहते हैं पर असली खिताब है गुरु की कृपा और गला (संगीत)। पंडित भीमसेन जोशी के गुरू सवई गंधर्व ने पंडित जी को कई रागों में गायकी की कला सिखाई । ऐसा माना जाता है कि पंडित जोशी जी को 20 से ज्यादा रागों पर पकड़ हासिल थी। अपनी गायकी से दिल को छू लेने की कला रखने वाले शास्त्रीय संगीत सम्राट का निधन 24 जनवरी 2011 को 88 वर्ष की उम्र मे पुणे के एक निजी अस्पताल में हुआ।

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भीमसेन जोशी - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

मां के भजन सुनकर गायक बनने की ठानी
शौक और प्रेरणा में अगर अंतर करना न आता हो तो पंडित भीमसेन जोशी की कही हुई इस बात को हमेशा याद रखना जरूरी है। उनसे जब पूछा गया कि आपको गाने का शौक कब और कैसे हुआ? उन्होंने कहा, "मुझे गाने का शौक मेरी मां की वजह से हुआ। वह अक्सर पूजा-पाठ करती थी और पूजा के दौरान भजन गाया करती थी जिसकी वजह से, धीरे-धीरे मुझे भी गाने का शौक हो गया।" पंडित जी आगे बताते हैं कि उन्हें गायक बनने की प्रेरणा सबसे पहले उस्ताद अब्दुल करीम खान से मिली। वह उस दिन को याद करते हुए बताते हैं कि उन्होंने सबसे पहले उस्ताद करीम खान की दो ठुमरी 'ये बसंत' और 'पिया बिन नही आवत' की रिकार्डिंग को सुना था और उसी पल यह फैसला कर लिया था कि अगर जीवन में उन्हें कुछ करना है तो यही कि उन्हें शास्त्रीय संगीत सीखना है। इस जज्बे ने उनके दिल में इस कदर घर बना लिया कि वह अपना घर-बार सब छोङ कर गुरु की खोज में दक्षिण भारत से उत्तर भारत को चल पड़े ।

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भीमसेन जोशी - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

अनुयायी भी चले उन्हीं की राह पर
पंडित भीमसेन के गायिकी में बहुत सारे अनुयायी हैं। इन अनुयायियों का कहना है कि पंडित जी के जीवन से बहुत महत्वपूर्ण सीख यह मिलती है कि हमारा घर छोड़ना तभी सफल है जब इसका कोइ मकसद या उद्देश्य हो। बिना किसी लक्ष्य के घर से भागने का कोई फायदा नही है । पंडित भीमसेन ने कला सीखने की चाहत लिए घर छोड़ा था। छोटे कस्बों या शहरों से निकलते ही कई युवा गंदी संगत की वजह से नशे और गलत आदतों की लत पकड़ लेते हैं जोकि एक खुशहाल और स्वस्थ जीवन जीने के लिए सही नही होता है।

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भीमसेन जोशी - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

लोगों से यही कहते रहे कि ‘राग’ न करें
भीमसेन जोशी से एक बार पूछा गया कि आपने राग सीखा है और अपने जीवन में बहुत से लोगों से मुलाकात भी की है, लोग आपको सुनना पसंद करते हैं, तो आप कला के अपने मंच से लोगों को क्या राग (संदेश) देते हैं? इसपर संगीत सम्राट कहे जाने वाले पंडित जोशी ने जवाब दिया कि "मै उन्हें यही राग देता हुं कि वे राग ना करें। (मराठी में राग गुस्से को कहते हैं)। पंडित जी को सिर्फ संगीत का ही नहीं बल्कि जीवन के दूसरे पहलुओं की भी अच्छी परख थी । यह बात उनके निजी जीवन के सादे और शांत स्वभाव से बिल्कुल मेल खाती है। टीवी पर उन्होंने अनेक साक्षात्कार दिए। तीखे और पेचीदे सवालों का सामना किया लेकिन उनके स्वभाव में कहीं कोइ खटास या भिन्नाहट नहीं दिखेगी।

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