क्या आपने गुल्लू और जादू की जोड़ी के बारे में सुना है? आप कहेंगे कि ये क्या सवाल हुआ भला। सवाल ये इसलिए है कि बाइस्कोप में आज जिस फिल्म के बारे में हम बात करने जा रहे हैं, उसका सिलसिला इन्हीं दो नौजवानों की जोड़ी से जुड़ता है। फिल्म है आज ही के दिन यानी 28 अप्रैल को साल 1971 में रिलीज हुई फिल्म अधिकार, जिसके सितारे हैं, अशोक कुमार, देब मुखर्जी, नंदा, हेलेन और प्राण। इस नाम से हिंदी सिनेमा में दो फिल्में और भी रिलीज हुई हैं। एक थी इससे पहले 1954 में आई किशोर कुमार और उषा किरण स्टारर मोहन सहगल निर्देशित अधिकार और दूसरी रिलीज हुई 1986 में। विजय सदाना के निर्देशन में बनी इस अधिकार में राजेश खन्ना और टीना मुनीम लीड रोल में थे।
बाइस्कोप: आज ही के दिन रिलीज हुई थी सलीम-जावेद की पहली फिल्म 'अधिकार', ऐसे बनी जादू और गुल्लू की जोड़ी
खैर, हम तो बात कर रहे थे साल 1971 में रिलीज हुई अधिकार की। इस फिल्म की पटकथा एक छोटी सी कहानी सुनने के बाद इसके लेखकों ने सिर्फ 12 दिन में रच डाली थी। फिल्म में इसके लेखकों का नाम भी नहीं गया लेकिन ये पहली फिल्म है जिसे गुल्लू यानी सलीम खान और जादू यानी जावेद अख्तर ने मिलकर एक साथ लिखी। यानी कि आप कह सकते हैं कि सलीम-जावेद की एक साथ लिखी ये पहली फिल्म रही। फिल्म देखेंगे तो इसमें कहीं आपको सलीम जावेद का नाम नहीं मिलेगा। हिंदी सिनेमा में भूत लेखन (घोस्ट राइटिंग) की परंपरा शुरू से ही चलती रही है, लिखता कोई और है नाम किसी और का होता है। मुंबई के शायर ओबैद आजम आजमी मुशायरों के दौरान दोस्तों से जो कुछ कहते हैं, उस पर यकीन करें तो ये सिलसिला बदस्तूर आज भी जारी है।
बाइस्कोप में आज हम आपको बताते हैं कि फिल्म अधिकार के लिए सलीम और जावेद की जोड़ी बनी कैसे। जैसा कि आप जानते ही होंगे कि मशहूर लेखक और शायर जावेद अख्तर के वालिद जां निसार अख्तर देश के नामचीन शायरों में हुआ करते थे। जिन दिनों गुरु दत्त के साथ रहकर सिनेमा सीखने का सपना लिए जावेद अख्तर बंबई पहुंचे थे, तब जां निसार अख्तर अपना ज्यादातर वक्त गुमनामी में बिताया करते थे। वजह थी उनका कम्युनिस्ट होना और उनके खिलाफ दायर तमाम मामलों की वजह से लगातार पुलिस का उनके पीछे लगे रहना। जावेद अख्तर कुछ दिन रहे अपने वालिद के यहां लेकिन कहते हैं कि अपनी सौतेली मां से उनकी बनी नहीं और एक दिन वह यूं ही बिना बताए घर से निकल लिए।
कमाल अमरोही के यहां जावेद अख्तर को पहली नौकरी मिली। रहने को कोई जगह थी नहीं तो वह वहीं कमालिस्तान स्टूडियो के गोदाम में सो जाया करते थे। गिनती के तीन जोड़ी कपड़े थे और उन्हीं को अदल बदल कर वह पहना करते। कई बार तो वहीं लॉन्ड्री की दुकान पर भी उन्होंने खड़े खड़े अपने कपड़े बदल लिए। कमाल अमरोही की गोदाम में उन्हें फिल्मफेयर की वो ट्रॉफियां भी पड़ी मिलीं जो मीना कुमारी को उनके बेहतरीन अभिनय के लिए दी गई थीं। गुरबत के दिनों में जावेद को उन ट्रॉफियों से बड़ा हौसला मिलता और वह उन्हें सीने से लगाकर फर्श पर सोया करते। कहते हैं कि इन ट्रॉफियों को हाथ में लेकर जावेद तमाम तरह की तकरीरें भी किया करते थे, जाहिर सी बात है कि ये तकरीरें बाद में कई बार जावेद अख्तर को फिल्मफेयर के मंच पर असली तकरीरें देने के काम आईं।
जिन दिनों जावेद अख्तर बंबई की सड़कों पर ठोकरें खाते घूम रहे थे, उन्हीं दिनों इंदौर के एक डीआईजी का बेटा बंबई में ‘दिलीप कुमार की दुकान बंद करा देने’ के सपने लिए स्टूडियो स्टूडियो घूम रहा था। प्यार से लोग घर पर इन्हें गुल्लू कहकर बुलाते थे और असल नाम था इनका सलीम खान। इंदौर के अपने कॉलेज में दोस्तों के लिए प्रेम पत्र लिखने वाले के तौर पर मशहूर रहे सलीम को ये समझ आने लगा था कि हिंदी सिनेमा में कहानी का रुतबा तो होता है लेकिन इन्हें लिखने वाले रुआबदार नहीं होते। अक्सर जब वो शूटिंग पर होते तो फिल्म के राइटर का कोई असिस्टेंट वही सेट पर बैठे सीन लिख रहा होता। ऐसा एक बार नहीं कई बार हुआ।