हिंदी फिल्मों की जानीमानी हास्य अभिनेत्री टुनटुन की 24 नवंबर को पुण्यतिथि है। टुनटुन का निधन 2003 में हुआ था। टुन टुन उस दशक की पहली फीमेल कॉमेडियन थीं जिनके पर्दे पर आते ही हॉल में ठहाके गूंजने लगते थे। टुन टुन का असली नाम उमा देवी था। लेकिन मोटे होने की वजह से उन्हें लोग टुन टुन बुलाने लगे। तबसे उनका नाम टुन टुन पड़ गया। संगीत की कोई औपचारिक तालीम न होने पर भी उनकी आवाज में एक खास मिठास थी। उनके संगीत पर नूरजहां और शमशाद बेगम का प्रभाव साफ नजर आता था।
बचपन में ही टुनटुन ने ठान लिया था कि जब भी उन्हें गाने का मौका मिलेगा तो वो नौशाद के लिए गाएंगी। तेरह वर्ष की आयु में एक दिन चुपचाप वो रिश्तेदारों से भागकर मुंबई आ गईं। दिल्ली में किसी ने उन्हें निर्देशक नितिन बोस के असिस्टेंट जव्वाद हुसैन का पता दिया था। वो मुंबई आकर उनसे मिलीं और उन्होंने ही टुन टुन को पनाह दी। वर्ष 1947 में उन्हें पहली बार गाने का मौका मिला।
टुन टुन का पहला गीत फिल्म 'दर्द' में 'अफसाना लिख रही हूं' था। ये गाना सुपरहिट हुआ और टुन टुन की किस्मत चमक गई। टुन टुन का ये गाना एक पाकिस्तानी अख्तर अब्बास काजी को इतना पसंद आया कि वो अपना मुल्क छोड़कर भारत आ गए और टुन टुन से शादी कर ली। अख्तर टुन टुन के पुराने जानने वाले थे।
इसके बाद तो टुन टुन ने लगातार करीब 45 गाने गाए। लेकिन प्रेग्नेंट होने और कुछ घरेलू जिम्मेदारियों के चलते उन्हें फिल्मों से ब्रेक लेना पड़ा। टुन टुन के पति अख्तर नौकरी करते थे लेकिन परिवार बढ़ने के साथ सैलरी कम पड़ने लगी। इसलिए टुन टुन ने फिर काम करने की सोची। बच्चे होने के बाद टुन टुन का वजन लगातार बढ़ता जा रहा था। लेकिन नौशाद ने उनकी अभिनय प्रतिभा को पहचाना और फिल्म 'बाबुल' में काम करने का मौका दिया।
टुन टुन का किरदार लोगों को बेहद पसंद आया और देखते ही देखते वो एक कॉमेडी एक्ट्रेस बन गईं। अपने पांच दशक के करियर में टुनटुन ने करीब 200 फिल्मों में काम किया। 90 के दशक में पति की मौत के बाद उन्होंने फिल्मों से खुद को अलग कर लिया। उनकी मशहूर फिल्मों में 'आरपार', 'प्यासा', 'मिस्टर ऐंड मिसेज फिफ़्टी फाइव' और 'मोम की गुड़िया' शामिल हैं।