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'सुई धागा' के दो साल पूरे होने पर बोले निर्देशक शरत कटारिया, ‘आत्मनिर्भर सिलाई वाला ही मेरा सुपरहीरो’

Mon, 28 Sep 2020 04:51 PM IST
अपूर्वा राय अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई Published by: अपूर्वा राय Updated Mon, 28 Sep 2020 04:51 PM IST
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two years of sui dhaga Anushka Sharma Bobby Deol Sharat Katariya Interview
शरत कटारिया - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

आत्मनिर्भर भारत अभियान से पहले ही आत्मनिर्भरता की बात करने वाली फिल्म ‘सुई-धागा’ ने दो साल पहले ही इस मुद्दे पर बात शुरू की। और, इसके निर्देशक शरत कटारिया ने इसके जरिए उस तरह के सिनेमा को आगे बढ़ाने में अपना जोर लगाया, जिसकी शुरूआत उन्होंने फिल्म ‘दम लगा के हइशा’ से की थी। निर्देशक शरत कटारिया से एक बातचीत।

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शरत कटारिया - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

आपकी फिल्मों के किरदार दर्शकों को अपने पड़ोस के ही लगते हैं, ऐसे किरदारों का चुनाव कैसे करते हैं आप?

दिल्ली का रहने वाला हूं और दिल्ली वालें चीजों को देखकर बड़ी जल्दी समझ जाते हैं। मेरी परवरिश जिस माहौल में हुई और जिस माहौल में मुझे जिंदगी जीने का मौका मिला, मेरी सोच इन किरदारों को लेकर वैसी ही शुरू से विकसित होती रही है। प्रेम हो, संध्या हो या फिर मौजी और ममता। इनके रिश्तेदारों के चरित्र भी मैं अपने रिश्तेदारों या जानने वालों में ही तलाश लेता रहा हूं। मेरे सिनेमा में मेरी दिल्ली झलकती है।

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सुई धागा - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

सिनेमा वही लंबे समय तक जिंदा रहता है, जिसमें व्यक्ति की बजाय समाज की बात हो, आपका क्या मानना है?

मैं जब लिख रहा होता हूं तो सिनेमा लिख रहा होता हूं। हां, जैसा कि मैंने बताया कि मेरी सोच पर मेरे आसपास का असर बहुत रहता है। तो बात मेरी स्क्रिप्ट में अपने आप झलकती है। मेरी फिल्म की स्क्रिप्ट सामाजिक संदेश देने से शुरू नहीं होती। स्क्रिप्ट घटना या किसी ऐसी चीज से ही शुरू होती है, जिससे आप प्रोत्साहित या प्रभावित हों। यहीं से कहानी की शुरुआत होती है।  

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दम लगा के हईशा - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

इसे थोड़ा विस्तार से समझाइए...

जैसे फिल्म ‘दम लगा के हईशा’ की कहानी एक ऐसे नौजवान की कहानी है जो अपनी पत्नी को चैंपियनशिप जिताना चाहता है। मैं इसे लिखते समय इसके सामाजिक संदेश या इसकी सामयिकता की बात सोच ही नहीं रहा था। मैं एक कहानी  सोच रहा था। एक महिला है जिसका वजन ज्यादा है और उसका पति दुबला-पतला है और यह एक ऐसी शादी है, जिसमें सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है। इन हालात का सामाजिक संघर्ष, ताने-उलाहने सब कहानी में अपने आप ही आ जाते हैं।

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सुई-धागा - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

और सुई धागा..? 

मैंने एक आदमी को पेड़ के नीचे सिलाई मशीन लिए बैठे देखा। उसे जमाने से लेना देना नहीं। उसकी आत्मनिर्भरता प्रेरक है। मेरे लिए वह एक सुपरहीरो है। केवल हवा में उड़ने वाला ही सुपरहीरो नहीं होता। सुपरहीरो वह भी होते हैं, जो काफी मुश्किल हालात में अपनी रोजी-रोटी चलाने के लिए संघर्ष करते हैं। इस तरह से इन किरदारों का जन्म हुआ और यह समाज को प्रेरणा और प्रोत्साहन देने वाले बन गए। ऐसी कहानियां अपने आप दूसरों को प्रेरित करती हैं, किसी को कहना नहीं होता कि इससे सीखो, लोग कहानियां देखकर अपने आप समझने सीखने लगते हैं।

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