बॉलीवुड के इतिहास में अगर किसी डायरेक्टर को याद किया जाएगा तो उसमें के. आसिफ का नाम सबसे पहले होगा। के. आसिफ ऐसे निर्देशक रहे जो सिर्फ अपनी एक फिल्म के लिए जाने जाते हैं लेकिन उस एक फिल्म ने जो कुछ हासिल किया वो न उस दौर में संभव था न ही इस दौर में संभव है। हमेशा चुटकी से सिगरेट या सिगार की राख झाड़ने वाले के. आसिफ मुंबई आए तो थे दर्जी बनने, लेकिन बन गए अव्वल दर्जे के निर्देशक।
असली मोतियों के लिए के. आसिफ ने रुकवा दी थी 'मुगल-ए-आजम' की शूटिंग, पढ़ें ये रोचक किस्सा
के. आसिफ ने अपने जीवन में सिर्फ दो फिल्मों का निर्देशन किया 1944 में आई 'फूल' और फिर 'मुगल-ए-आजम।' जिसने इतिहास में अपना नाम दर्ज करवाया। आसिफ साहब ने इस फिल्म को जिस पागलपन से बनाया उसे बता पाना शायद संभव न हो। इस फिल्म को बनाने में 14 साल लगे। फिल्म के गानों पर पानी की तरह पैसा बहाया गया ताकि सब असली लग सके। खतीजा अकबर अपनी किताब 'द स्टोरी ऑफ मधुबाला' में लिखती हैं, "शीश महल का सेट बनने में पूरे दो साल लग गए।''
इसी का एक किस्सा फिल्म समीक्षक इकबाल रिजवी बताते हैं- फिल्म का एक सीन था जिसमें सलीम को मोतियों पर चलकर महल में दाखिल होना था। इस सीन के लिए नकली मोती मंगवाए गए थे लेकिन के. आसिफ के दिमाग में कुछ और ही चल रहा था।
उन्होंने फिल्म के फाइनेंसर शाहपुरजी मिस्त्री से 1 लाख रुपये की डिमांड कर डाली। जब उन्होंने पूछा कि तुम्हे ये पैसे क्यों चाहिए तब के. आसिफ का जवाब था- मैं इस सीन के लिए असली मोती मंगवाना चाहता हूं। शाहपुरजी मिस्त्री गुस्से में बोले- तुम पागल हो गए हो क्या? तुम बनावटी मोती का इस्तेमाल भी तो कर सकते हो... इससे क्या फर्क पड़ेगा?
तब के. आसिफ ने उनसे कहा- फर्क पड़ेगा...क्योंकि सच्चे मोती पर अगर कोई चलेगा तो उसके चेहरे के भाव नकली नहीं लगेंगे...मुझे फिल्म में भी कुछ ऐसा ही चाहिए। जब किसी को पता होगा कि ये नकली मोती है तो वो उसपर आराम से चलता चला जाएगा और मैं वो नहीं दिखा पाऊंगा जो दिखाना चाहता हूं।
शाहपुरजी मिस्त्री चले गए। फिल्म की शूटिंग रूक गई। करीब 20 दिन के बाद ईद थी। शाहपुरजी मिस्त्री ने जब मुगल-ए-आजम के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया फिल्म की शूटिंग रुकी हुई है, अगर आप मोतियों का बंदोबस्त कर लें तो दोबारा फिल्म की शूटिंग शुरू हो जाएगी। इस बीच शाहपुरजी ये तक सोचने लगे थे कि इस फिल्म को के. आसिफ से लेकर सोहराब मोदी से निर्देशित करवाया जाए।
शाहपुरजी मिस्त्री को के. आसिफ की ये ईमानदारी बहुत पसंद आई। हालांकि इस फिल्म पर पहले से ही बहुत खर्च किया जा चुका था लेकिन के. आसिफ की जिद के आगे उन्हें झुकना पड़ा और उन्होंने के. आसिफ को ईदी के तौर पर 1 लाख रुपये दिए। जिसका इस्तेमाल उन्होंने फिल्म के लिए असली मोती खरीदने में किया। दरअसल आसिफ साहब पानी की तरह पैसा बहाते थे, क्योंकि उन्हे क्वॉलिटी चाहिए थी।
पूरी फिल्म की शूटिंग के दौरान के. आसिफ और शाहपुरजी के बीच नोकझोक चलती रही। लेकिन शाहपुरजी को ये बात पता थी कि ये आदमी बहुत ईमानदार है। इसने इस फिल्म में डेढ़ करोड़ रुपए खर्च कर दिए हैं, लेकिन उसने अपनी जेब में एक फूटी कौड़ी भी नहीं डाली है। मुगल-ए-आजम अपने जमाने की सबसे मंहगी और सफल फिल्म थी, लेकिन इसके निर्देशक के. आसिफ ताउम्र एक किराए के घर में रहे और टैक्सी पर चले। 9 मार्च 1971 को ऐसे महान डायरेक्टर का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया।