फिल्म अभिनेत्री विद्या बालन ने अपनी हालिया कई फिल्मों के जरिये समाज में महिला सशक्तिकरण की बात समझाई है। उनकी शीर्षक भूमिकाओं वाली फिल्मों ने दर्शकों के बीच वाहवाही भी खूब लूटी है। वह कहती हैं, 'मेरे लिए महिला सशक्तिकरण वह है, जब एक गांव की महिला पहली बार अपना घूंघट उठाकर चलती है। आज हमें सबसे जरूरी यह तय करना है कि मैं कौन हूं? एक गांव की एक महिला के लिए जो जीवन भर पर्दा या घूंघट में रही है, पहली बार जब वह घूंघट उठा कर चलती है, तो वह सशक्तिकरण है। आज भी हम एक ऐसे समय से गुजर रहे हैं जब हम इस पर बहुत ही संकीर्ण दृष्टिकोण रखते हैं।
Vidya Balan: घूंघट पर विद्या बालन का बयान, बोलीं, सशक्तिकरण वही जब गांव की महिला पहली बार बिना घूंघट निकले
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विद्या बालन ने ये बात बीते दिनों यहां मुंबई में एक किताब 'द मिलेनियल वुमन इन बॉलीवुड- ए न्यू' ब्रांड' के विमोचन पर कही। किताब हिंदी सिनेमा में अभिनेत्रियों के बढ़ते प्रभाव के बारे में है कि किस तरह से पिछले कुछ वर्षों में हिंदी सिनेमा में बदलाव हुआ है और महिला प्रधान फिल्में बननी शुरू हुई हैं। कहीं ना कहीं इन फिल्मों के जरिए महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा मिला है।
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'द मिलेनियल वुमन इन बॉलीवुड-ए न्यू ब्रांड' की लॉन्चिंग के दौरान इस बात की भी चर्चा हुई कि किस तरह से 'चांदनी बार', 'पेज 3', 'कहानी', 'क्वीन' और 'मैरी कॉम' जैसी हिट फिल्मों की महिला नायकों ने पारंपरिक ढांचे को तोड़ा। इन फिल्मों के जरिए अभिनेत्रियों ने पितृसत्ता समाज का मुकाबला किया। किताब की लेखक मैथिली राव कहती हैं, 'समकालीन सिनेमा ने इस बदलाव को पहचाना और चुपचाप अपनी नायिकाओं में शक्ति का संचार किया। साथ ही उन फार्मूलाबद्ध कहानियों को भी बनाए रखा जो दर्शकों को पसंद आईं।'
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विद्या बालन ने अपनी हालिया रिलीज फिल्मों ‘शकुंतला देवी’, 'शेरनी' और 'जलसा' से महिला दर्शकों के बीच महिला सशक्तिकरण की बात को बहुत ही मजबूती से स्थापित किया है। हालांकि, महिला विषयक फिल्मों को इन दिनों सिनेमाघरों में रिलीज के लिए तमाम चुनौतियों का सामना करना पड़ता है लेकिन ओटीटी के आने के बाद से समाज में एक अलग तरह की अंतर्धारा का विकास हुआ है। मैथिली राव कहती हैं, 'दर्शक इस तरह की चुनौतीपूर्ण कहानियों को स्वीकार कर रहे हैं। ये इस बात का द्योतक है कि दर्शक अब किसी किरदार को एक महिला या एक पुरुष के रूप में नहीं बल्कि सबसे पहले एक इंसान के रूप में देख रहे हैं।'
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बातचीत के दौरान विद्या बालन ने बताया, 'मेरे लिए नारीवाद बहुत अलग है, मेरे लिए यह अपने अधिकारों को जानना और अपनी शर्तों पर जीवन जीना है। यही चीज जब दर्शक सिनेमा में देखते है तो उसे आत्मसात करते हैं।' मैथिली राव की किताब 'द मिलेनियल वुमन इन बॉलीवुड-ए न्यू ब्रांड' इस बारे में बताती है कि कैसे समकालीन सिनेमा ने इस बदलाव को पहचाना और चुपचाप अपनी नायिकाओं में शक्ति का संचार किया, जबकि उन फार्मूला बद्ध कहानियों को बनाए रखा जो दर्शकों को पसंद आईं।
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