ये 1982 का समय था विनोद खन्ना ने जब मुंबई के होटल सेंटूर में प्रेस कांफ्रेंस बुलाई तो मीडिया के लिए ये हैरानी की बात थी, क्योंकि तब आज की तरह बॉलीवुड स्टार शायद ही कभी प्रेस कांफ्रेंस बुलाते थे। विनोद खन्ना महरून रंग का चोला और ओशो की तस्वीर वाली मनकों की माला पहनकर आए।
जब फिल्में और ग्लैमर छोड़ संन्यासी बन गया था ये हीरो, वापसी करते ही कहलाए 'वांटेड'
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
साथ में थीं उनकी पहली पत्नी गीतांजलि और दोनों बेटे अक्षय और राहुल। अंदाज सबको था कि विनोद क्या कहने वाले हैं, क्योंकि तब बॉलीवुड में नंबर दो स्टार विनोद खन्ना ने नई फिल्में लेनी बंद कर दी थीं। फिल्म निर्माताओं का साइनिंग अमाउंट लौटाना शुरू कर दिया था। हालांकि उसी साल उनकी दो फिल्में द बर्निंग ट्रेन और कुरबानी सुपरहिट रही थीं। फिल्म सर्किल में लोग कहने लगे थे कि विनोद करियर को लेकर सीरियस हो जाएं तो अमिताभ बच्चन का स्टारडम हिला देंगे।
विनोद अपनी नई दुनिया बनाने में लगे थे। फिल्मों से उनकी दिलचस्पी खत्म हो रही थी। विनोद वर्ष 70 के दशक में आचार्य रजनीश से प्रभावित होने लगे थे। 1975 के ठीक आखिरी दिन वह रजनीश आश्रम में संन्यासी बन गए। इससे पहले उन्होंने घंटों रजनीश के वीडियो देखे। उनके साथ समय बिताया 70 के दशक के आखिरी सालों में वह सोमवार से लेकर शुक्रवार तक बॉलीवुड में काम करते। फिर उनकी मर्सीडिज कार पुणे की ओर भागती नजर आती। सप्ताहांत के दो दिन पुणे के ओशो आश्रम में गुजरते जहां पहले तो वह होटल में रुकते थे।
फिर आश्रम में ही ठहरने लगे। आश्रम में जैसे ही वह अंदर पैर रखते उनका स्टार का चोला उतर जाता वह रजनीश के दूसरे शिष्यों की तरह हो जाते उन दो दिनों में ध्यान और अन्य आश्रम कार्यक्रम के बाद उन्हें बगीचों की सफाई के काम में तल्लीन देखा जाता। आश्रम के बाहर उनका ड्राइवर कार के साथ खड़ा होता। वह अंदर जमीन पर गिरे सूखे पत्ते उठाकर कूड़ेदान में डालते देखे जाते। आश्रमवासियों के बीच वह स्वामी विनोद भारती थे उन्हीं सबकी तरह। सबसे मुस्कुराकर आत्मीयता से मिलने वाले। बॉलीवुड के पुराने फिल्म पत्रकार याद करते हैं कि किस तरह विनोद शूटिंग पर भी रजनीशी चोले में पहुंचते थे।
इसे तभी उतारते जब सेट शॉट के लिए पूरी तरह तैयार हो जाता। मिलने वालों से यही कहतेए रजनीश धरती पर इकलौते जीवित भगवान हैं। 80 के दशक की शुरुआत में पुणे के रजनीश आश्रम में दिक्कतों की खबरों आने लगी थीं स्थानीय प्रशासन का रुख कड़ा था। रातों.रात रजनीश के अमेरिका के ओरेगान जाने की खबर आई। वह प्रिय शिष्यों को वहां साथ रखना चाहते थे। विनोद खन्ना से भी चलने को कहा। वे अपना परिवार भारत में छोड़कर चले गए। ओरेगान में स्वामी विनोद भारती को माली का काम मिला। वह सुबह जल्दी उठते। पौधों को पानी देते। कांटते.छांटते। गार्डन की देखरेख करते।