कुछ फिल्मों का अपना ही नसीब होता है। जैसे कुछ कहानियों का नसीब होता है कि उन पर देर सबेर फिल्म बन ही जाती है। वैसे ही कुछ फिल्मों का नसीब ये होता है कि हीरो बदलता रहे, वक्त बदलता रहे, लेकिन फिल्म बन ही जाती है। जानकर आपको शायद हैरानी हो कि अमेजन प्राइम वीडियो पर शुक्रवार तड़के रिलीज हुई फिल्म ‘विदआउट रिमोर्स’ पहले पहल साल 1995 में बननी शुरू हुई थी। उस समय के लिहाज से इसकी कहानी थी भी बिल्कुल ठीक। लेकिन, तब से दुनिया के सियासी समीकरण बदल चुके हैं। लोगों की फिल्म की पसंद बदल चुकी है और फिल्म ‘विदआउट रिमोर्स’ की कहानी जैसी न जाने कितनी फिल्में सिनेमाघरों से लेकर ओटीटी पर ढेर हो चुकी हैं।
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विदआउट रिमोर्स
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
यश चोपड़ा निर्देशित फिल्म ‘दीवार’ अगर आपको याद हो तो वहां अनीता (परवीन बाबी) का कत्ल होने के बाद विजय वर्मा के सिर पर खून सवार हो जाता है। ये तो तय है कि फिल्म ‘विदआउट रिमोर्स’ इसी नाम के जिस उपन्यास पर आधारित है, उसके रचतिया टॉम क्लैन्सी ने ये फिल्म सौ फीसदी नहीं देखी होगी। लेकिन, अमिताभ बच्चन की फिल्म का जिक्र यहां इसलिए कि टॉम क्लैन्सी की कहानियों की सियासत भी 80 के दशक के किस्से ही ज्यादा सुनाती है। उनकी कहानियों के चलन में आने के बाद उन पर फिल्में ज्यादातर बनी 10-12 साल बाद। लेकिन, फिल्म ‘विदआउट रिमोर्स’ के कियानू रीव्स से होकर टॉम हार्डी और माइकल बी जॉर्डन तक आते आते दुनिया का नक्शा और सिनेमा का तापमान दोनों बदल चुका है।
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विदआउट रिमोर्स
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
रूस अब सिर्फ रूस बचा है। वह यूएसएसआर नहीं है। इसीलिए उपन्यास में जो घटना वियतनाम में होती है, वह फिल्म में सीरिया में घट रही है। हालात बदतर हैं। लेकिन, हीरो बनने के लिए हालात ऐसे ही होने चाहिए। जॉन की अगुआई में ये मिशन पूरा होता है। तीन महीने बाद इस टीम के एक एक सदस्य को चुन चुनकर मारा जा रहा है। बाकी मारे जाते हैं। हीरो बच जाता है। हीरो बचेगा तो करेगा क्या? तो उसकी गर्भवती बीवी भी मारी जाती है। वह सारे हमलावर मार देता है। एक बच जाता है। समीकरण संतुलन में आता है और इस संतुलन को बनाने के चक्कर में ही एक अच्छी खासी फिल्म मारी जाती है।
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विदआउट रिमोर्स
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
माइकल बी जॉर्डन को मरणासन्न हालत में देखने की दर्शकों को आदत हो चुकी है। सीन शुरू होते ही दर्शक समझ जाते हैं कि देह में नलियां कितनी भी पड़ी हों, बंदा अभी आंखें खोल ही देगा। इस बार भी यही होता है। सब कुछ बिल्कुल तयशुदा फॉर्मूले पर। आपने उपन्यास पहले से पढ़ा हो या ना पढ़ा हो कोई फर्क नहीं पड़ता। बीते 10-15 साल में रिलीज हुई उपद्रवी खुफिया एजेंटों में आधे से ज्यादा की कहानी यही है। हां, यहां माइकल बी जॉर्डन का अपना अलग आकर्षण है। उनका अभिनय भी लाजवाब है और भारत जैसे देश में भी अगर लोग ये फिल्म देख रहे हैं तो ये उनकी ही वजह से है बस समझ ये नहीं आता कि सीधे ओटीटी पर रिलीज हुई फिल्म ‘विदआउट रिमोर्स’ की मेकिंग भी इतनी सीधे ओटीटी पर आ रही हिंदी फिल्मों जैसी कैसे हो सकती है?
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विदआउट रिमोर्स
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म ‘विदआउट रिमोर्स’ एक्शन फिल्म है। टाइम भी 109 मिनट का ही इसके निर्देशकों ने रखा है। लेकिन, ये फिल्म बहुत कुछ रूसो ब्रदर्स की ‘एक्सट्रैक्शन’ जैसे ग्राफ पर चलती है। मतलब कि फिल्म बस चले जा रही है। दर्शक कहानी से जुड़ पा रहा है कि नहीं जुड़ पा रहा है, निर्देशक को कोई लेना देना नहीं। इटली के निर्देशक स्टेफानो सॉल्लिमा का नाम ‘जीरो जीरो जीरो’ और ‘सिकारियो: डे ऑफ द सोल्डाडो’ की वजह से खूब हुआ है लेकिन यहां फिल्म ‘विदआउट रिमोर्स’ में वह किसी भी किरदार को ठहराव नहीं देते हैं। दर्शक जब तक नायक के दर्द में बराबर का हिस्सेदार नहीं हो पाता, वह उसके बदले के साथ भी भावनात्मक रूप से जुड़ नहीं पाता है। फिल्म ‘विदआउट रिमोर्स’ बस यहीं मात खा जाती है।
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