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2.0 Movie Review: अक्षय को रजनीकांत के मुक्के से ऐतराज नहीं, आप भी झेलने को तैयार रहें
मुंबई डेस्क, अमर उजाला
Updated Fri, 30 Nov 2018 12:12 PM IST
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- फोटो : file photo
रजनीकांत भारतीय सिनेमा में एक कलाकार ही नहीं बल्कि एक ऐसे मिथ का नाम है जिसके सामने साइंस का हर लॉजिक गुजरे ज़माने की बात लगती है। वह स्क्रीन पर लिखकर आने वाले इकलौते सुपरस्टार हैं। उनके फैन्स सिर्फ सिनेमाघरों में ही हंगामा नहीं मचाते वह फेसबुक, ट्विटर और डिजिटल दुनिया के हर कोने में मौजूद हैं। वह सिर्फ रजनीकांत की पूजा करना जानते हैं। कहानी के तर्क, सिनेमा की समझ और अच्छी फिल्म के लिए ज़रूरी सार्थक मनोरंजन जैसी बातें उनके लिए ऐसे बाउंसर्स हैं, जिन्हें वे खेलना भी नहीं चाहते।
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तो ऐसे भक्तिमयी माहौल में रजनीकांत की टू प्वाइंट ज़ीरो देखना भी किसी चुनौती से कम नहीं होता। फिल्म का निष्पक्ष मूल्यांकन करने से पहले आपको भक्तों की भीड़ से बचकर निकलना है और ये भी देखना है कि फिल्म के प्रचार में जो कुछ भी रजनीकांत, अक्षय कुमार और इसके डायरेक्टर शंकरन ने कहा, क्या उस कसौटी पर ये फिल्म सौ फीसदी खरी उतरती है?
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पैसे लेकर किए जाने वाले ट्वीट्स से आगे भी फिल्म का रिव्यू बनता है। रिव्यू इस बात का कि अगर कोई रजनीकांत का फैन ब्वॉय नहीं है या कोई अगर अक्षय कुमार का नाम सुनकर ही लहालोट नहीं हो जाता है तो उसके लिए ये फिल्म कैसी है? मामला इमोशनल और कमर्शियल से आगे लॉजिकल भी होता है। साइंटिस्ट वशीकरण हैं। उनका प्यारा रोबोट चिट्टी है और है पक्षीराज। फिल्म शुरू होती है मोबाइल्स के एक साथ गायब होने से है।
वैज्ञानिकों में हड़कंप है। ज़माने में अफरातफरी। वशीकरण चिट्टी को वापस लाना चाहता है। तमाम बहस और बतकही के बाद वह आ भी जाता है, लेकिन तकनीक आगे निकल चुकी है और अब वशीकरण को उसका अपग्रेडेड वर्जन बनाना है। साइंस से बनी चीजें ही साइंस के लॉजिक को गांव की तलैया में डुबो आती हैं। लेकिन, रजनीकांत के भक्तों को सब भाता है।
वैज्ञानिकों में हड़कंप है। ज़माने में अफरातफरी। वशीकरण चिट्टी को वापस लाना चाहता है। तमाम बहस और बतकही के बाद वह आ भी जाता है, लेकिन तकनीक आगे निकल चुकी है और अब वशीकरण को उसका अपग्रेडेड वर्जन बनाना है। साइंस से बनी चीजें ही साइंस के लॉजिक को गांव की तलैया में डुबो आती हैं। लेकिन, रजनीकांत के भक्तों को सब भाता है।
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ऐक्टिंग की तरफ ध्यान जाता है तो समझ आता है कि यहां ऐक्टिंग कर ही कौन रहा है। किसी का चेहरा या उसके एक्सप्रेशन्स असली नहीं है। सब पर विजुअल ग्राफिक इफेक्ट्स का पर्दा है। वशीकरण के रोल में रजनीकांत चुस्त दुरुस्त दिखने की कोशिश में रहते हैं और चिट्टी के चोले मे तो किसी को खड़ा कर दो क्या फर्क पड़ता है।
फर्क इस बात का भी नहीं पड़ता कि पक्षीराज का लबादा किस पर पहनाया गया है। अक्षय कुमार ने अपने करियर की चोटी पर ऐसी फिल्म क्यों की उनके प्रशंसकों को आखिर तक समझ नहीं आएगा। खुद अक्षय कुमार कह चुके हैं कि रजनीकांत से मुक्का खाना भी उनके लिए सम्मान की बात है। दर्शकों की समझ का सम्मान करने की किसी को पड़ी नहीं है।
फर्क इस बात का भी नहीं पड़ता कि पक्षीराज का लबादा किस पर पहनाया गया है। अक्षय कुमार ने अपने करियर की चोटी पर ऐसी फिल्म क्यों की उनके प्रशंसकों को आखिर तक समझ नहीं आएगा। खुद अक्षय कुमार कह चुके हैं कि रजनीकांत से मुक्का खाना भी उनके लिए सम्मान की बात है। दर्शकों की समझ का सम्मान करने की किसी को पड़ी नहीं है।
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शंकरन डायरेक्टर अच्छे हैं। कहानी का ताना बाना भी ठीक ठाक बुनते हैं। पर उनके सिनेमा का दायरा साउथ के सेट फॉर्मूले से आगे निकलने की कोशिश नहीं करता। हॉलीवुड फिल्मों के आगे की फिल्म बताई जा रही फिल्म हॉलीवुड फिल्मों की तो दूर वेबसीरीज लॉस्ट इन स्पेस के आगे भी नहीं ठहरती। ये अलग बात है कि रजनीकांत के भक्तों को नेटफ्लिक्स का अभी एन भी नहीं पता। फिल्म के विजुअल इफेक्ट्स बचकाने हैं और किसी वीडियो गेम से आगे के नहीं लगते। थ्रीडी में ये फिल्म देखना अपने आप में चुनौती है। ए आर रहमान का म्यूजिक वैसा ही है जैसा वो साउथ की फिल्मों में देते आए हैं। उनका बेस्ट बस मणिरत्नम जैसे डायरेक्टर ही निकलवा सकते हैं। अगर आप रजनीकांत के फैन नहीं है या अक्षय कुमार के नाम से ही आपकी बत्तीसी बाहर नहीं आ जाती है तो फिल्म अपने रिस्क पर देखें। हां, फिल्म देखने की उत्सुकता में ही अगर फिल्म देखनी है तो ये ठीक-ठाक टाइम पास है। अमर उजाला डॉट कॉम के रिव्यू में फिल्म टू प्वाइंट ज़ीरो को मिलते हैं तीन स्टार।
