डिजिटल सिनेमा के इस दौर में जब फिल्में सैटेलाइट तकनीक से डाउनलोड होकर सिनेमाघरों में दिखाई जा रही है, पता नहीं ये मुमकिन हो पाएगा कि नहीं लेकिन एक दौर वह भी था जब दर्शकों की बेहद मांग पर फिल्मों के हिट गाने थिएटर में दोबारा चलाए जाते थे। सन 77 की ऐसी ही एक फिल्म रही है ‘दुल्हन वही जो पिया मन भाए’। फिल्म में हेमलता का गाया एक गाना है, ‘ले तो आए हो हमें सपनों की छांव में..’, ये गाना सिनेमाघरों में अनगिनत बार दोबारा दिखाया गया। फिल्म ने सिनेमाघरों में गोल्डन जुबली मनाई। इस फिल्म के निर्देशक ने इससे ठीक 10 साल पहले एक और कमाल की फिल्म बनाई जिसकी धमक ऑस्कर अवार्ड्स तक में सुनाई दी। साल 1966 में रिलीज हुई ये फिल्म थी ‘आम्रपाली’ जिसमें वैजयंती माला और सुनील दत्त ने करिश्माई काम किया था। फिल्म को भारत की तरफ से आधिकारिक ऑस्कर एंट्री के तौर पर भेजा गया। इन दोनों फिल्मों के निर्देशक थे लेख टंडन। लेख टंडन का नाम इन दोनों फिल्मों के साथ बताया न जाए तो बहुत मुमकिन है कि आपको पता भी न चले। सिर्फ अपने काम से काम रखने वाले लेख टंडन ने हिंदी सिनेमा में ‘प्रोफेसर’, ‘झुक गया आसमान’, ‘प्रिंस’ से लेकर ‘दूसरी दुल्हन’ और ‘अगर तुम न होते’ जैसी चर्चित फिल्में निर्देशित की हैं। इन्हीं लेख टंडन की 3 सितंबर 1980 को रिलीज हुई फिल्म ‘एक बार कहो’ हमारी आज के बाइस्कोप की फिल्म है।
बाइस्कोप: जब ‘रंगबाज’ अनिल कपूर ने बदली शबाना आजमी की पहली धारणा, ‘एक बार कहो’ के पूरे हुए 40 साल
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कपूर परिवार का शुरुआती साथ
लेख टंडन का फिल्मों में आना भी दिलचस्प किस्सा है। उनके पिता फकीर चंद टंडन और पृथ्वीराज कपूर लायलपुर पंजाब में सहपाठी रहे। बंटवारे के बाद कपूर खानदान बंबई आ बसा तो उनके साथ फकीर चंद का बड़ा बेटा भी चला आया। फिर सीनियर कपूर ने लेख टंडन को भी अपने साथ बुला लिया। लेख टंडन ने राज कपूर के साथ कई फिल्मों में बतौर सहायक काम किया। और, बाद में निर्देशक बने तो शम्मी कपूर के साथ भी सुपरहिट फिल्में बनाईं। शाहरुख खान को खोजने का श्रेय भी लेख टंडन को दिया जाता है। शाहरुख के धारावाहिक ‘दिल दरिया’ के निर्देशक लेख टंडन ही थे। शाहरुख ने भी अपने इस ‘गुरु’ को हमेशा याद रखा। अपने सुपरस्टाडम के दिनों में शाहरुख ने लेख टंडन को फिल्म ‘स्वदेस’, ‘पहेली’ और ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ में बतौर अभिनेता अपने साथ जोड़े रखा। जी हां, फिल्म ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ में राहुल के बाबा बने बिशंभर मिठाईवाला ये लेख टंडन ही हैं। आमिर खान की फिल्म ‘रंग दे बसंती’ में भी लेख टंडन ने अभिनय किया है।
अनिल कपूर की बदली किस्मत
और, इन्हीं लेख टंडन के आगे पीछे कभी डोलते थे बड़े बड़े सितारे। अनिल कपूर तो खैर उन दिनों अपना नाम किसी तरह फिल्म के क्रेडिट्स में देखने को पागल हुआ करते थे। कम लोगों को ही पता होगा कि शबाना आजमी को नई प्रतिभाओं पर नजर रखने और उनकी काबिल निर्देशकों, लेखकों से सिफारिश करने का शुरू से शौक रहा है। पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट से निकलते ही पहली फिल्म जो मिथुन चक्रवर्ती को जो मिली थी, वह शबाना आजमी की सिफारिश से ही मिली थी। फिल्म ‘एक बार कहो’ में पहली बार शबाना आजमी के साथ काम करने वाले अनिल कपूर को अपने करियर की अहम फिल्म सुभाष घई के निर्देशन में बनी ‘मेरी जंग’ भी शबाना आजमी की सिफारिश पर ही मिली। शबाना ‘एक बार कहो’ के सेट पर अनिल कपूर के समर्पण से बहुत प्रभावित हुईं, ये और बात है जब पहली बार शबाना ने अनिल कपूर को बंबई में देखा तो उन्हें अनिल कपूर पसंद नहीं आए। यहां एक बात और नोट करने लायक है और वो ये कि फिल्म ‘मेरी जंग’ पहले ‘शतरंज’ के नाम से रमेश सिप्पी बनाने वाले थी जिसमें लीड रोल करना था अमिताभ बच्चन को और अनिल कपूर को मिला था इसमें विलेन का रोल। बाद में अमिताभ बच्चन ने ये फिल्म छोड़ी तो अनिल कपूर बन गए हीरो और अनिल कपूर को जो रोल पहले मिला था उसे किया जावेद जाफरी ने। जावेद जाफरी के पिता जगदीप ने भी फिल्म ‘एक बार कहो’ में एक अहम किरदार निभाया है और अनिल कपूर तब से उनसे प्रभावित रहे।
एक अनोखी प्रेम कहानी
फिल्म ‘एक बार कहो’ के लीड कलाकार हैं नवीन निश्चल और शबाना आजमी। फिल्म की कहानी का स्रोत तमाम हॉलीवुड फिल्मों को बताया जाता है और इसका क्लाइमेक्स फिल्म ‘एन अफेयर टू रिमेंबर’ से मिलता जुलता है भी। फिल्म की कहानी खुद को शापित मानने वाले रवि की कहानी है। रवि को लगता है वह जिससे ज्यादा प्यार करता है, उसे ही खो देता है। बचपन में उसने मां-बाप को खोया। पत्नी से प्रेम हुआ तो वह भी चली गई। वह खुद को पूरी तरह काम में डुबो देता है लेकिन इससे उसकी मनोदशा बिगड़ने लगती है। फैमिली डॉक्टर उसे कुछ दिनों की छुट्टियां मनाने की सलाह देता है। इसी बीच उसकी मुलाकात आरती से होती है और दोनों एक दूसरे की तरफ आकर्षित भी होते हैं। रवि अपना प्यार चाहकर भी कह नहीं पाता है। उसे लगता है कि अगर वह आरती के प्रति अपना प्यार जाहिर कर देगा तो उसे खो देगा। होता भी कुछ कुछ यही है कि आरती उससे मिलने का वादा तो करती है लेकिन फिर वह आती नहीं है। रवि को लगता है कि उसने आरती को भी खो दिया है। दो साल बाद रवि उसे खोज पाता है और उसे लगता है कि आरती को उससे प्रेम था ही नहीं। फिर ट्रेन में चढ़ते समय रवि को एहसास होता है कि आरती तो अपना पैर खो चुकी है। आरती बताती है कि भला ऐसी सूरत में रवि उससे शादी करता भी क्यों? लेकिन, रवि उसके इस ख्याल को उसके मन से निकाल देता है। दोनों शादी कर लेते हैं।
शबाना के करियर का मील का पत्थर
फिल्म ‘एक बार कहो’ का महीने भर लंबा शेड्यूल दार्जिलिंग में चला। शूटिंग पर निकलने से पहले सारे कलाकार हॉलीडे इन में मिलने के लिए इकट्ठे हुए। शबाना आजमी उस दिन की याद करते हुए कहती हैं, ‘जब ये हॉलीडे इन की लॉबी से काली पैंट, लाल टी शर्ट, बटनें खोले हुए, कॉलर खड़ी करके निकला तो मुझे पहली ही नजर में बहुत अजीब सा लगा। ऐसा लग रहा था कि किसी रईस परिवार को कोई लड़का आकर्षण पाना चाह रहा है। सरनेम वैसे ही कपूर। मुझे ये जानकर डर सा भी लगा कि इस लड़के के साथ मुझे महीने भर दार्जिलिंग में शूटिंग भी करनी होगी। मैंने पहले दिन से ही इसे लड़के को गज भर की दूरी पर रखने का फैसला किया था। लेकिन, जब काम शुरू हुआ तो अनिल ने मेरी सारी भ्रांतियों को तोड़ दिया। वह सीखने को बेताब रहने वाला युवक निकला जिसे सेट पर कुछ भी कोई भी काम करने में दिक्कत नहीं होती थी। लेख टंडन को तब एक गाने के लिए इम्प्रेस करने की अनिल ने बहुत कोशिश की थी।’ लेख टंडन के साथ शबाना आजमी ने एक और फिल्म की थी ‘दूसरी दुल्हन’। किराए की कोख (सरोगेसी) वाली कहानी कहती इस फिल्म में भी शबाना आजमी ने अपने किरदार को पूरी तरह आत्मसात कर लिया था। समय से पहले की कहानी कहती ये दोनों फिल्में लेख टंडन के साथ साथ शबानी आजमी के करियर के भी अहम मील के पत्थर हैं।