कभी मुन्ना, कभी लखन तो कभी मिस्टर इंडिया बनकर पिछले 40 साल से देश दुनिया में बसे हिंदी सिनेमा के कद्रदानों का मनोरंजन करते आ रहे अभिनेता अनिल कपूर ने अपनी बिटिया सोनम को लेकर ‘फन्ने खां’, ‘वीरे दी वेडिंग’, ‘खूबसूरत’ और ‘आयशा’ नाम की चार फिल्में बनाई हैं, अब तक नौ फिल्मों के वह प्रोड्यूसर रहे। अनिल ने बतौर फिल्म निर्माता पहली फिल्म बनाई थी अपने पुराने दोस्त सतीश कौशिक के साथ मिलकर, ‘बधाई हो बधाई’। फिल्म कंपनी के नाम में दोनों दोस्तों का नाम था। लेकिन फिर अनिल कपूर ने सिर्फ अपने ही नाम से अनिल कपूर फिल्म कंपनी बनाई और राम गोपाल वर्मा के साथ मिलकर बनाई, ‘माई वाइफ्स मर्डर’।
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बीते हफ्ते ही ओटीटी पर रिलीज हुई फिल्म ‘शकुंतला देवी’ में सबने देखा कि कैसे किसी इंसान का सपना उसे हकीकत के रिश्तों से दूर कर देता है। ये वो इंसान है जो किसी बड़े काम का सपना देखते हैं और फिर उसी की धुन में दिन रात जुट जाते हैं। कसमें, वादे, प्यार और वफा सब उन्हें बातें लगती हैं, और बातों का क्या? शकुंतला देवी ने करोड़ो रुपये कमाए पर अपनी बेटी का सुख नहीं खरीद सकीं। मोहनदास करमचंद गांधी ने पूरा देश कमा लिया लेकिन अपने बेटे के दिल में अपने लिए प्यार नहीं कमा पाए, क्यों भला? और, यहां तक कि उसे मुसलमान बनने से भी नहीं रोक पाए। महात्मा गांधी का इस फिल्म में संवाद है, ‘जानते हो मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी हार क्या है? दो ऐसे इंसान जिन्हें मैं जिंदगी भर अपनी बात नहीं समझा पाया। एक मेरा काठियावाड़ी दोस्त मोहम्मद अली जिन्ना और दूसरा मेरा अपना बेटा हरी लाल। हरी लाल गांधी।’
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छोटे शहरों व गांवों के स्कूलों में 2 अक्टूबर के दिन आज भी बजने वाले गाने ‘दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल’ वाली फिल्म ‘जागृति’ साल 1954 में बनी, उसके बाद बरसों तक महात्मा गांधी के नाम पर हिंदी सिनेमा में कुछ बड़ा कम ही सुनने को मिला। फिर एक विदेशी फिल्मकार रिचर्ड एटनबरो ने हमें बताया कि सिनेमा में भी ‘गांधी’ का कोई सानी नहीं है। उन्होंने ये फिल्म बनाई और देश दुनिया में मशहूर हुए। फिल्म को ऑस्कर की 11 कैटेगरी में नॉमीनेशन मिला और इसने बेस्ट पिक्टर, बेस्ट डायरेक्टर और बेस्ट एक्टर समेत आठ अवॉर्ड जीते भी। एक अवॉर्ड इसमें कॉस्ट्यूम डिजाइनिंग का भारतीय वेशभूषा विशेषज्ञ भानु अथैया को भी मिला। भानु ने इस फिल्म में स्टार वॉर्स सीरीज के मशहूर कॉस्ट्यूम डिजाइन जॉन मोलो के साथ काम किया और पुरस्कार भी दोनों ने साथ ही जीता।
इस फिल्म के बाद श्याम बेनेगल की फिल्म ‘मेकिंग ऑफ महात्मा’ को छोड़ दें तो किसी दूसरी फिल्म में महात्मा गांधी को कथानक की मूल धारा के रूप में कम ही देखा सुना गया। ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’ में एक टपोरी का महात्मा गांधी से काल्पनिक संवाद लोगों को खूब पसंद आया और इसी के साथ महात्मा गांधी फिर से सिनेमा के फलक पर भी लौट आए। ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’ का महात्मा गांधी के जीवन से वैसे कोई लेना देना नहीं है लेकिन फिल्म में एक रूपक के तौर पर जिस तरह गांधी को दिखाया गया, वह हिंदी सिनेमा का एक नायाब प्रयोग माना जाता है।
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भारतीय रंगमंच के लिए पिछली सदी का आखिरी दशक काफी प्रयोगधर्मी रहा। ये वो दशक है जब पृथ्वी थिएटर में ‘तुम्हारी अमृता’ और ‘सेल्समैन रामलाल’ जैसे नाटकों ने धूम मचा रखी थी। इन नाटकों के निर्देशक थे फिरोज अब्बास खान जो पिछले कुछ सालों से अपने संगीतमय नाटकों ‘मुगल ए आजम’ के अलावा ‘रौनक और जस्सी’ के जरिए खूब चर्चा में हैं। फिल्म ‘गांधी माई फादर’ फिरोज अब्बास खान ने ही निर्देशित की है। रंगमंच के एक काबिल निर्देशक और हिंदी सिनेमा के एक बड़े सितारे का ये एक ऐसा मेल रहा जिसने अनिल कपूर की इज्जत रातों रात हिंदी सिनेमा के सुधी दर्शकों के दिलों में बहुत ज्यादा बढ़ा दी। यूं लगा कि हिंदी सिनेमा को कोई ऐसा राह दिखाने वाला मिल गया है जिसके बनाए रास्ते पर हिंदी सिनेमा कुछ प्रयोगधर्मी सिनेमा बनते और देखेगा। लेकिन, अच्छी फिल्में न बनने की दिन रात चर्चा करने वाले वे तमाम दर्शक ही इस फिल्म ‘गांधी माई फादर’ के बॉक्स ऑफिस पर न चल पाने के जिम्मेदार रहे, जो ये फिल्म देखने सिनेमाघर ही नहीं गए।
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फिल्म ‘गांधी माई फादर’ के समय कोई बड़ा शोर शराबा फिल्म का रिलीज से पहले हुआ नहीं था। हिंदी पट्टी के तो आधे दर्शकों को पता भी नहीं चला कि ये फिल्म कब आई और कब सिनेमाघरों से उतर भी गई। लेकिन, जिसने भी ये फिल्म देखी, उसने इसकी तारीफ की। फिल्म की रिलीज के वक्त एक बातचीत में तब अनिल कपूर ने कहा था, “मैंने इस फिल्म का निर्माता बनना सिर्फ इसलिए स्वीकार किया क्योंकि इसकी कहानी महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता के रूप में नहीं दिखाती बल्कि ये कहानी उनको अपने बेटे हरीलाल के पिता के रूप में सामने लाती है। निर्माता के रूप में मेरा इरादा अपनी प्रोडक्शन कंपनी के लिए अंतर्राष्ट्रीय मानक तय करना है।”
लेकिन, करीब आठ करोड़ की लागत से बनकर सिनेमाघरों तक पहुंच फिल्म ‘गांधी माई फादर’ जब अपनी लागत भी बॉक्स ऑफिस पर नहीं कमा सकी तो अनिल कपूर ने विश्व सिनेमा को प्रभावित करने का अपना ये विचार फिलहाल के लिए मुल्तवी किया और फिर से लग गए दूसरों की फिल्मों में एक्टिंग करने। फिल्म का घाटा पूरा करने के लिए उन दिनों जो फिल्म सामने आईं सब कर लीं। और, बतौर प्रोड्यूसर भी जो अगली फिल्म बनाई उसमें हीरो लिया अरशद वारसी और अक्षय खन्ना को, नाम था, ‘शॉर्टकट - कॉन इज ऑन।’
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