जैकी श्रॉफ और डिंपल कपाड़िया स्टारर फिल्म ‘काश’ अपने आप में एक अलग ही फिल्म है। महेश भट्ट की कोई दर्जन भर फिल्में ऐसी हैं जो तराजू के एक पलड़े पर रख दी जाएं तो भी ‘काश’ से हल्की ही रहेंगी। कहा तो यही जाता है कि असल जिंदगियों की कहानियों को परदे पर उतारने के शौकीन रहे महेश भट्ट ने इस कहानी का आइडिया सुपरस्टार राजेश खन्ना की जिंदगी से उड़ाया था। और, उनके अवसान के दिनों पर ही वह यह फिल्म भी बनाना चाह रहे थे लेकिन इस फिल्म में आपको हॉलीवुड फिल्म ‘क्रेमर वर्सेज क्रेमर’ का छौंका भी दिख जाएगा जिसपर बाद में मंसूर खान ने फिल्म ‘अकेले हम अकेले तुम’ बनाई। करियर की शुरुआत में ही विनोद खन्ना को लेकर फिल्म ‘लहू के दो रंग’ बना चुके महेश भट्ट फिल्म ‘काश’ में भी विनोद खन्ना को ही लीड किरदार के तौर पर लेना चाहते थे लेकिन विनोद खन्ना ने जब ये कहानी सुनी और फिल्म के नायक व नायिका के बीच प्रस्तावित कुछ सीन्स सुने तो राजेश खन्ना के सम्मान में उन्होंने ये फिल्म नहीं की। 4 सितंबर 1987 को रिलीज हुई फिल्म ‘काश’ हमारे आज के बाइस्कोप की फिल्म है, जिसका किशोर कुमार का गाया गाना ‘बाद मुद्दत के हम तुम मिले, मुड़के देखा तो थे फासले...’ उस साल का सबसे हिट गाना बना और फिल्म ‘काश’ के रिलीज होने के अगले ही महीने किशोर कुमार चल बसे। यादें, वादे, आवाजें, देते न काश..!
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मृत्यु से पहले के जीवन पर बनी फिल्म
हिंदी सिनेमा में फिल्मों के तमाम फॉर्मूले रहे हैं। वैसे ही जैसे कहानियां लिखने वाले मानते हैं कि पूरी दुनिया की सारी कहानियों का वर्गीकरण कुछ तय खांचों में किया जा सकता है। बात में कुछ कुछ दम भी लगता है जैसे कि इनमें से एक फॉर्मूला है तयशुदा मृत्यु से पहले का जीवन उल्लास के साथ जीना। देखने में ये एक विरोधाभासी अलंकार है, मृत्यु और उल्लास। आमतौर पर तो मृत्यु का तो शोक मनाया जाता है और पता चल जाए कि किसी व्यक्ति की मृत्यु आसन्न है तो फिर तो पूरा गली मोहल्ला पहले से शोक मनाने लगता है। लेकिन, ऋषिकेश मुखर्जी के ‘आनंद’ ने कहानी का ये क्षेपक बदल दिया। इस फिल्म ने हिंदी सिनेमा का एक ऐसा नायक दिया जिसे अपनी निश्चित मृत्यु के बारे में पता है लेकिन वह जितने दिन भी जीना चाहता है, खुलकर खिलखिलाकर जीना चाहता है और कहता है, ‘बाबूमोशाय! जिंदगी लंबी नहीं बड़ी होनी चाहिए..!’ यहां फिल्म ‘काश’ में मृत्यु दो जीवनों के बीच सेतु का काम करती है। जो परिवार में सबसे छोटा है, उसे सबसे पहले जाना है, ये तय होने के बाद जो कुछ फिल्म में होता है, वही इसका असली मर्म है। जैकी श्रॉफ और डिंपल का सादगी भरा बेहतरीन अभिनय है और इन दोनों के बेटे बने मास्टर मकरंद का चेहरा देखकर कलेजा अपने आप मुंह को आने लगता है।
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जब प्रीतीश नंदी ने तबीयत से धोया भट्ट को
फिल्म ‘काश’ जब रिलीज हुई तो तब अंग्रेजी पत्रिका ‘इलस्ट्रेटेड वीकली’ के संपादक प्रीतीश नंदी ने इस पर ‘एडीटर्स च्वाइस’ नाम के अपने कॉलम में महेश भट्ट को तबीयत से लपेटा। इस कॉलम की एक श्वेत श्याम कॉपी यहां दी गई फोटो की शक्ल में। मैं आपके लिए इसे तलाश लाया हूं। इस आलेख में प्रीतीश नंदी बताते हैं कि फिल्म तो बहुत अच्छी नहीं है लेकिन फिर भी वह फिल्म देखने की सिफारिश करते हैं सिर्फ जैकी श्रॉफ और डिंपल के अभिनय के नाम पर। प्रीतीश नंदी ने अपने इस कॉलम में महेश भट्ट को इतनी तबीयत से धोया है जितना फिल्म ‘सड़क 2’ के रिलीज होने के बाद भी वह नहीं धोए गए हैं। प्रीतीश नंदी ने छोड़ा इसमें अनुपम खेर को भी नहीं है। वह लिखते हैं, ‘अनुपम इस तरह के किरदार करके हाराकिरी कर रहे हैं और अगर ऐसा उन्होंने किसी और के कहने पर किया है तो फिर तो ये मर्डर है।’ गुस्सा ये फिल्म देखने के बाद अनुपम खेर को भी बहुत आया और उन्होंने इसे प्रकट भी किया। वह ये मानकर चल रहे थे कि फिल्म ‘काश’ में वह समानांतर नायक की भूमिका में हैं लेकिन महेश भट्ट ने जब फिल्म एडिट की तो अपनी ही इस खोज को फिल्म में हाशिये पर पहुंचा दिया। ऐन मौके पर अपने करीबियों को इस तरह के दिल की धड़कनें बढ़ा देने वाले ‘सरप्राइज’ देने की महेश भट्ट की बहुत पुरानी आदत रही है।
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‘आशिकी’ के पहले का महेश भट्ट
जैसा कि मैंने पहले भी लिखा कि फिल्म ‘काश’ मृत्यु से पहले के उल्लास की कहानियां कहने वाले सिनेमा की एक कड़ी है। लेकिन, ऐसी फिल्मों में अक्सर फिल्म के निर्देशक या फिर इसके लेखक पूरे मामले को ‘कल हो ना हो’ जैसा फिल्मी बना देते हैं। हिंदी सिनेमा में ऐसी फिल्में गिनती की है जिनमें मृत्यु जैसे विषय ने संवेदनशीलता के साथ विस्तार पाया हो। जब भी ऐसी उम्दा फिल्मों की गिनती होती है तो गिनती ऋषिकेश मुखर्जी की ‘आनंद’ से शुरू होकर ‘मिली’ और ‘दर्द का रिश्ता’ तक आकर ही रुक जाती है। लेकिन, इस सूची से पहले की एक फिल्म असित सेन निर्देशित ‘सफर’ और इस सूची के बाद की एक फिल्म यानी महेश भट्ट निर्देशित ‘काश’ की भी इनमें चर्चा जरूरी है। महेश भट्ट के खाते में ऐसी कुछ चुनिंदा फिल्में दर्ज हैं जिन्हें देखकर देश के एक महत्वपूर्ण कालखंड के कौतुहल को करीब से समझा जा सकता है। उनकी फिल्मों ‘अर्थ’, ‘सारांश’ और ‘नाम’ की अगली कड़ी है ‘काश’। इसके बाद उन्होंने ‘ठिकाना’, ‘कब्ज़ा’ और ‘आवारगी’ जैसी फिल्मों में उस वक्त के उभरते सुपरस्टार्स को बिल्कुल अलग तेवरों के साथ पेश करने में भी कामयाबी पाई। और, उसके बाद 1990 में आ गई ‘आशिकी’ जिसे महेश भट्ट ने इसके गानों को सुनने के बाद गुलशन कुमार से अपने लिए मांगा था। महेश भट्ट के सिनेमा पर जब भी कोई किताब लिखी जाएगी तो वह दो हिस्सों में बंटी होगी, एक ‘आशिकी’ से पहले का महेश भट्ट और दूसरा ‘आशिकी’ के बाद का महेश भट्ट।
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कहानी चमक खोते सुपरस्टार की
फिल्म ‘काश’ की कहानी एक लोकप्रिय फिल्मस्टार रीतेश की कहानी है। अपनी पत्नी पूजा और सात साल के बेटे रोमी के साथ वह रईसों की जिंदगी जी रहा है। रीतेश का करियर फ्लॉप फिल्मों की वजह से डगमगाता है और खुद की बनाई फिल्मों भी फ्लॉप हो जाने के चलते उसके कर्ज चुकाने के लिए अपनी संपत्ति बेचनी होती है। सदमा बर्दाश्त न कर पाने के चलते रीतेश शराब खूब पीने लगता है और उसकी पत्नी पूजा घर संभालने के लिए नौकरी करने लगती है। रीतेश से ये बर्दाश्त नहीं होता। रोमी को कुछ समझ नहीं आता कि वह करे तो क्या करे। एक दिन पूजा के साथ बदतमीजी होती है और आलोक उसे बचा लेता है। आलोक चाहता है कि पूजा उसके साथ काम करे। वह उसे छोड़ने घर तक आता है तो रीतेश से ये देखा नहीं जाता वह घर या नौकरी में से किसी एक को चुनने की बात करता है। पूजा घर छोड़ देती है। दोनों के बीच रोमी को लेकर विवाद होता है और तभी पता चलता है कि रोमी के पास ज्यादा दिन नहीं बचे हैं। फिल्म की कहानी यहां से एक ऐसा मोड़ लेती है कि इसके बाद की फिल्म देखने के लिए आप चुपचाप कुर्सी पर बैठे पर्दा ही निहारते रहते हैं।
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