अगर फार्मूला फिल्में आपका मनोरंजन करती हैं तो निर्देशक अभिषेक कपूर की केदारनाथ को नमन कर सकते हैं। 1980 और 90 के दशक में किसी लव स्टोरी में जितने फार्मूले हुआ करते थे, उन्हें कपूर ने फिर सजा-संवार कर यहां पेश किया है।
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Movie Review: बाढ़ में उभरती कमजोर प्रेम कहानी है 'केदारनाथ', रिव्यू पढ़कर ही देखने जाएं
रवि बुले
Updated Fri, 07 Dec 2018 02:15 PM IST
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-निर्माताः रॉनी स्क्रूवाला
अगर फार्मूला फिल्में आपका मनोरंजन करती हैं तो निर्देशक अभिषेक कपूर की केदारनाथ को नमन कर सकते हैं। 1980 और 90 के दशक में किसी लव स्टोरी में जितने फार्मूले हुआ करते थे, उन्हें कपूर ने फिर सजा-संवार कर यहां पेश किया है।
अगर फार्मूला फिल्में आपका मनोरंजन करती हैं तो निर्देशक अभिषेक कपूर की केदारनाथ को नमन कर सकते हैं। 1980 और 90 के दशक में किसी लव स्टोरी में जितने फार्मूले हुआ करते थे, उन्हें कपूर ने फिर सजा-संवार कर यहां पेश किया है।
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गरीब लड़का, अमीर लड़की। एक मुसलमान, एक हिंदू। लड़की के पिता का रिश्ते के सख्त खिलाफ होना और रातों-रात लड़की के हाथ पीले करने के वास्ते देखते-देखते लड़का तय कर देना। लाचार नजरों से बेटी की बेबसी देखते रहने वाली मां। हीरोइन के पिता द्वारा ढूंढे गए विलेननुमा वर द्वारा प्रेमी की कुटाई और गड़गड़ाहट के साथ बादलों का फटना, बिजली गिरना, नदियों में बाढ़ आ जाना। जब प्रकृति प्रेमियों के साथ होगी तो उनको मिलने से कौन रोक सकेगा? केदारनाथ को निर्देशक ने प्यार का नया तीर्थ बताया है और उनकी फिल्म बासी फार्मूलों की तीर्थराज जैसी मालूम पड़ती है क्योंकि इसे लिखने वालों ने कुछ नया सोचने की जरूरत नहीं समझी।
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ज्यादातर फिल्मों की तरह लेखन ही केदारनाथ की कमजोर कड़ी है। फार्मूला घटनाक्रमों के साथ हीरो-हीरोइन के रोमांस में भी कुछ नया नहीं दिख पाता। ये वादियां-ये हवाएं, इधर-उधर देखते हुए नजरों का मिलना, दिल में प्यार की धड़कन पैदा हो जाना। आपको लगता नहीं गुजरते हुए 2018 का रोमांस है। इतना जरूर है कि फिल्म में तीर्थस्थलों पर होने वाली वास्तविक मुश्किलों और सरकार-प्रशासन द्वारा उन्हें उपेक्षित किए जाने की कुछेक बातें हैं, जिन्हें छू भर दिया गया है।
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कपूर पूरी तरह फार्मूलों पर फोकस रहे। प्रेम के बाद उन्होंने दूसरी नजर रखी पहाड़ों के बीच आई बाढ़ पर। कंप्यूटर पर गढ़े-चमकाए दृश्यों पर उन्होंने खूब ध्यान दिया और उसमें उन्हें सफलता भी मिली कि कहीं-कहीं वे दर्शक को छू जाते हैं। मगर केदारनाथ मूलतः इस विभिषिका की कहानी नहीं है।फिल्म को इस बात के लिए याद रखा जाएगा कि सैफ अली खान-अमृता सिंह की बेटी सारा इससे इंडस्ट्री में कदम रख रही हैं। इसमें संदेह नहीं कि वह खूबसूरत लगी हैं और अपने हिस्से के दृश्यों को उन्होंने आत्मविश्वास से किया है। इसके बावजूद उनके बारे में अंतिम राय बनाना जल्दबाजी होगी। अगली दो-तीन फिल्में बता सकेंगी कि वह कितनी लंबी रेस में शामिल होंगी।
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टीवी से आए सुशांत सिंह राजपूत को अपनी पारी की उम्र बढ़ाने के लिए गंभीरता से सोचना होगा कि कैसे रोल चुनें। उनकी पिछली सुपरफ्लॉप राब्ता को लोग भुला नहीं पाए हैं और केदारनाथ में कोई वजह नहीं कि उन्हें याद रखा जाए। अभिषेक कपूर के लिए भी आगे की राह कठिन है। फितूर और रॉक ऑन 2 के बाद वह इस फिल्म में दर्शकों से काय पो चे वाला कनेक्ट नहीं पैदा कर पाते। केदारनाथ का संगीत निराश करता है लेकिन सिनेमैटोग्राफी जरूर बांधती है। संपादन कसा हुआ है। ऐसे में अगर कहानी में फार्मूलों से इतर नया सोचा जाता तो केदारनाथ के लिए बेहतर होता।
